अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में यूरो और अमेरिकी डॉलर की विनिमय दर में हाल के हफ्तों के दौरान दर्ज की गई तेज गिरावट अब केवल एक सामान्य तकनीकी सुधार तक सीमित नहीं दिखाई दे रही है। यूरोपीय साझा मुद्रा पर कई अलग-अलग आर्थिक मोर्चों से एक साथ दबाव बन रहा है, जिससे आने वाले दिनों में यूरो के और अधिक कमजोर होने की संभावनाएं मजबूत हो रही हैं। कुछ हफ्ते पहले तक विनिमय दर के 1.1000 के स्तर तक फिसलने का अनुमान काफी आक्रामक माना जा रहा था, लेकिन वर्तमान वृहद आर्थिक परिस्थितियों ने इस स्तर के परीक्षण को पूरी तरह से व्यावहारिक बना दिया है। स्पॉट मार्केट में लगातार जारी कमजोरी के साथ-साथ डेरिवेटिव्स और फ्यूचर्स सेगमेंट में निवेशकों का रुख इस बात की स्पष्ट पुष्टि कर रहा है कि बाजार यूरोपीय परिसंपत्तियों के लिए अतिरिक्त जोखिम प्रीमियम की मांग कर रहा है।
फ्रांस की राजकोषीय चिंताएं और यूरोपीय बॉन्ड बाजार में तनाव
यूरोपीय संघ के भीतर इस नए दबाव का सबसे प्राथमिक और प्रत्यक्ष केंद्र फ्रांस बनकर उभरा है। फ्रांस की सरकारी वित्तीय स्थिति और राजकोषीय घाटे को लेकर निवेशकों के बीच बढ़ती चिंताओं ने वहां के बॉन्ड बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस स्थिति के कारण जर्मनी के बेंचमार्क बॉन्ड के मुकाबले फ्रांसीसी सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाला यील्ड स्प्रेड तेजी से बढ़ा है। यह घटनाक्रम यूरो क्षेत्र के उस पुराने संरचनात्मक संकट की याद दिलाता है जो सॉवरेन ऋण संकट के दौरान देखा गया था, जहां एक समान मौद्रिक नीति होने के बावजूद प्रत्येक सदस्य देश का राजकोषीय जोखिम पूरी तरह अलग-अलग रहता है।
विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार के नजरिए से फ्रांसीसी बॉन्ड स्प्रेड का यह फैलाव सिर्फ फ्रांस की सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। स्प्रेड में लगातार होने वाली यह बढ़ोतरी पूरे यूरोपीय क्षेत्र में परिसंपत्तियों के लिए एक विखंडन प्रीमियम को दोबारा जन्म देती है। इस विखंडन के कारण सरकारी और कॉरपोरेट फंडिंग की लागत बढ़ जाती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का भरोसा डगमगाने लगता है। इस पूरी प्रक्रिया का सबसे गंभीर असर यूरोपीय सेंट्रल बैंक की नीतिगत कार्यप्रणाली पर पड़ता है, क्योंकि जब विभिन्न सदस्य देशों की वित्तीय स्थितियां एक-दूसरे से विपरीत दिशा में जाने लगती हैं, तो साझा केंद्रीय बैंक के लिए मुद्रास्फीति के खिलाफ ठोस कदम उठाना अत्यंत जटिल हो जाता है।
केंद्रीय बैंक के सामने नीतिगत संतुलन की कठिन चुनौती
सामान्य आर्थिक परिस्थितियों में जब मुद्रास्फीति की दर उच्च बनी रहती है, तो यह उम्मीद की जाती है कि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में बढ़ोतरी करेगा। मौद्रिक सख्ती की यह संभावना आमतौर पर घरेलू मुद्रा को समर्थन देती है और उसे मजबूत बनाती है। हालांकि, मौजूदा समय में यूरो क्षेत्र में जो परिस्थितियां बन रही हैं, वे किसी भी तरह से सामान्य नहीं हैं। यदि आर्थिक विकास की गति सुस्त होने के साथ-साथ सॉवरेन डेट मार्केट के जरिए वित्तीय स्थितियां अपने आप सख्त होने लगें, तो केंद्रीय बैंक के लिए ब्याज दरों में अतिरिक्त बढ़ोतरी करने की क्षमता बेहद सीमित हो जाती है।
यही कारण है कि फ्रांस का घरेलू राजकोषीय संकट अब केवल एक स्थानीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह यूरोपीय सेंट्रल बैंक की पूरी मौद्रिक नीति के लिए एक बड़ी बाधा बन चुका है। केंद्रीय बैंक आर्थिक मंदी के जोखिम और सदस्य देशों के बढ़ते बॉन्ड स्प्रेड के दबाव में बंधा हुआ महसूस कर रहा है, जिससे वह महंगाई को रोकने के लिए उतनी आक्रामकता से ब्याज दरें नहीं बढ़ा पा रहा है, जितनी जरूरत विनिमय दर को स्थिर रखने के लिए हो सकती है।
कच्चे तेल और गैस की बढ़ती कीमतों से व्यापार संतुलन पर असर
यूरोपीय अर्थव्यवस्था के लिए दूसरी सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा बाजार से आ रही है। कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में लगातार हो रही वृद्धि ने यूरोप की आर्थिक चिंताओं को और गहरा कर दिया है। अमेरिका की तुलना में यूरोप आयातित ऊर्जा संसाधनों पर कहीं अधिक निर्भर है, जिसके चलते ऊर्जा की कीमतों में तेज उछाल एक साथ दोहरे संकट को जन्म देता है। एक तरफ यह सीधे तौर पर आयातित मुद्रास्फीति का झटका देता है, वहीं दूसरी तरफ यह क्षेत्र के व्यापार संतुलन और व्यापार की शर्तों को भारी नुकसान पहुंचाता है।
आयातित ऊर्जा पर अत्यधिक निर्भरता की यह स्थिति मुद्रा के दृष्टिकोण से काफी प्रतिकूल मानी जाती है। ऊर्जा के बढ़े हुए दाम आम परिवारों की वास्तविक क्रय शक्ति को कम कर देते हैं और कंपनियों के मुनाफे के मार्जिन पर गहरा दबाव डालते हैं। इसके परिणामस्वरूप आंतरिक घरेलू मांग कमजोर पड़ने लगती है, जबकि दूसरी ओर हेडलाइन मुद्रास्फीति उम्मीद के मुताबिक तेजी से नीचे नहीं आ पाती। इस प्रकार की महंगाई मांग से नहीं बल्कि आपूर्ति और आयात लागत से संचालित होती है, जिसे ठीक करने में मौद्रिक सख्ती ज्यादा प्रभावी नहीं होती बल्कि वह केवल आर्थिक गतिविधियों को और धीमा करने का काम करती है। नतीजतन, अंतरराष्ट्रीय निवेशक यूरोपीय परिसंपत्तियों को अपने पास रखने के लिए अतिरिक्त जोखिम प्रीमियम की मांग करने लगते हैं।
अमेरिका का आर्थिक लचीलापन और मौद्रिक नीति का अंतर
अटलांटिक महासागर के दूसरी तरफ संयुक्त राज्य अमेरिका की आर्थिक स्थिति यूरोप से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर रही है। अमेरिका में भी मुद्रास्फीति की दर लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है, लेकिन वहां की व्यापक अर्थव्यवस्था लगातार अपनी मजबूती और लचीलेपन का प्रदर्शन कर रही है। वित्तीय बाजारों में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की इस लगातार बनी रहने वाली मजबूती को एक असाधारण स्थिति के रूप में देखा जा रहा है।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था की इसी मजबूती ने फेडरल रिजर्व को अपनी मौद्रिक नीति को सख्त बनाए रखने का ठोस आधार दिया है। बाजार में निवेशकों को निकट भविष्य में नीतिगत दरों में किसी बड़ी कटौती की उम्मीद करने का कोई वाजिब कारण नजर नहीं आ रहा है। विनिमय दरों के निर्धारण में केवल किसी एक अर्थव्यवस्था की पूर्ण स्थिति नहीं, बल्कि दो अर्थव्यवस्थाओं के बीच की सापेक्ष स्थिति अधिक मायने रखती है। वर्तमान में अमेरिकी आर्थिक मजबूती और यूरोप की नीतिगत लाचारी के बीच का यह अंतर पूरी तरह से अमेरिकी डॉलर के पक्ष में और यूरो के खिलाफ झुका हुआ है।
ऑप्शंस मार्केट में डाउनसाइड प्रोटेक्शन की तेज खरीदारी
मुद्रा बाजार के डेरिवेटिव सेगमेंट से मिलने वाले संकेत इस बात का पुख्ता सबूत दे रहे हैं कि बड़े वित्तीय संस्थान यूरो में और गिरावट की संभावना को पूरी गंभीरता से ले रहे हैं। एक महीने के 25-डेल्टा रिस्क रिवर्सल के आंकड़े -1.239 पर आ गए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि बाजार में यूरो कॉल ऑप्शंस के मुकाबले पुट ऑप्शंस को खरीदने के लिए भारी प्राथमिकता दी जा रही है और निवेशक इसके लिए ज्यादा कीमत चुकाने को तैयार हैं।
यह वर्तमान स्तर अपने पांच साल के वितरण के लगभग 10वें पर्सेंटाइल पर स्थित है, जिसका जेड-स्कोर -1.43 दर्ज किया गया है। स्तर के मंदी की ओर होने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण वह गति है जिससे बाजार इस स्तर तक पहुंचा है। पिछले एक महीने की अवधि में एक महीने के रिस्क रिवर्सल में -1.042 वोलैटिलिटी पॉइंट्स की गिरावट आई है, जो पांच साल के ऐतिहासिक वितरण में 5वें पर्सेंटाइल से भी नीचे है। केवल पिछले एक हफ्ते के दौरान ही इस स्क्यू में -0.487 पॉइंट्स की अतिरिक्त मंदी की गिरावट देखी गई है।
इस एक महीने के दौरान यूरो और डॉलर की स्पॉट जोड़ी में लगभग 3.70% की गिरावट दर्ज की गई। ऐतिहासिक संबंधों के आधार पर स्पॉट में इतनी गिरावट होने पर ऑप्शंस स्क्यू में आमतौर पर लगभग -0.550 पॉइंट्स का बदलाव आना चाहिए था। इसके विपरीत, बाजार में लगभग -0.493 वोलैटिलिटी पॉइंट्स की अतिरिक्त मंदी की रीप्राइसिंग देखी गई है, जो ऐतिहासिक स्तरों से परे है और इसका आउट-ऑफ-सैंपल रेजिड्यूअल 9.1वें पर्सेंटाइल पर दर्ज हुआ है। इसका साफ मतलब है कि ऑप्शंस ट्रेडर्स केवल स्पॉट मार्केट का अनुसरण नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे अतिरिक्त मंदी के जोखिम की संभावना को सक्रिय रूप से मूल्य में शामिल कर रहे हैं।
कमोडिटी फ्यूचर्स ट्रेडिंग कमीशन के आंकड़ों से मंदी की पुष्टि
फ्यूचर्स मार्केट के आंकड़े भी ऑप्शंस बाजार की तरह ही मंदी की दिशा में एक मजबूत संकेत दे रहे हैं। 29 सितंबर को समाप्त हुए सप्ताह के लिए कमोडिटी फ्यूचर्स ट्रेडिंग कमीशन (CFTC) के आंकड़ों के अनुसार, सट्टेबाजी वाली शुद्ध यूरो पोजीशन गिरकर लगभग 63.3 हजार अनुबंधों पर आ गई है, जिसमें उस सप्ताह के दौरान लगभग 11 हजार अनुबंधों की शुद्ध बिकवाली शामिल थी।
चार हफ्तों की छोटी सी अवधि के भीतर शुद्ध पोजीशन में 38.3 हजार से अधिक अनुबंधों की भारी गिरावट दर्ज की गई है। इस तेज बिकवाली ने यूरो की कुल पोजीशनिंग को उसके पांच साल के ऐतिहासिक वितरण के केवल 3.5वें पर्सेंटाइल पर ला खड़ा किया है, जिसका जेड-स्कोर -1.74 है। इसके अलावा, ओपन इंटरेस्ट भी 91.2वें पर्सेंटाइल पर बना हुआ है, जो यह स्पष्ट करता है कि यह गिरावट केवल पुरानी पोजीशन को बंद करने से नहीं आई है, बल्कि बाजार में बड़े पैमाने पर नई मंदी की पोजीशन बनाई गई हैं।
भीड़भाड़ वाली पोजीशनिंग और शॉर्ट-कवरिंग रैलियों का जोखिम
स्पॉट मार्केट, ऑप्शंस मार्केट और फ्यूचर्स मार्केट तीनों का एक ही दिशा में मंदी का संकेत देना इस बात को मजबूती प्रदान करता है कि गिरावट का मौजूदा रुझान वास्तविक है। हालांकि, पांच साल के वितरण के 3.5वें पर्सेंटाइल पर पोजीशनिंग का पहुंचना यह भी दर्शाता है कि यूरो में मंदी का यह ट्रेड अब काफी भीड़भाड़ वाला हो चुका है और सटोरियों के पोर्टफोलियो में पहले से ही भारी बिकवाली की पोजीशन दर्ज हैं।
पोजीशनिंग का अत्यधिक भारी होना 1.1000 के स्तर तक पहुंचने की संभावना को खारिज नहीं करता, लेकिन यह विनिमय दर को तेज और अप्रत्याशित शॉर्ट-कवरिंग रैलियों के प्रति संवेदनशील बना देता है। यदि फ्रांस के राजकोषीय मोर्चे पर कोई सकारात्मक खबर आती है, ऊर्जा की कीमतों में अचानक नरमी देखने को मिलती है या अमेरिकी मुद्रास्फीति के आंकड़े उम्मीद से कमजोर आते हैं, तो मंदी के दांव लगाने वाले ट्रेडर्स तेजी से अपनी पोजीशन बंद करने के लिए खरीदारी कर सकते हैं, जिससे विनिमय दर में अचानक उछाल आ सकता है। फिर भी, जब तक व्यापक वृहद आर्थिक तस्वीर में बुनियादी बदलाव नहीं होता, तब तक ऐसी रैलियों को दीर्घकालिक ट्रेंड का अंत नहीं बल्कि व्यापक मंदी के भीतर बिकवाली के अवसर के रूप में देखा जाना तय है।
वैश्विक बाजारों और अन्य मुद्राओं का हालिया परिदृश्य
मुद्रा बाजार के अन्य प्रमुख जोड़ों में भी वैश्विक घटनाक्रमों का असर देखा जा रहा है। एशियाई कारोबारी सत्र में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और अमेरिकी डॉलर की जोड़ी 0.6950 के स्तर के ठीक ऊपर सीमित दायरे में कारोबार करती नजर आई, जहां ट्रेडर्स मध्य पूर्व के तनाव और अमेरिकी फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) के मिनट्स के बाद बॉन्ड यील्ड में मजबूती का आकलन कर रहे हैं। वहीं, अमेरिकी डॉलर और जापानी येन की जोड़ी 158.00 के नीचे दर्ज की गई, जहां जापानी अधिकारियों द्वारा बाजार में संभावित हस्तक्षेप की अटकलों के बीच डॉलर में मुनाफावसूली का असर देखा गया। इसके साथ ही, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में 10 से 30 साल के सेगमेंट में हल्की नरमी आने से सोने की कीमतों में सुधार हुआ और यह 4,150 डॉलर प्रति औंस के करीब पहुंच गया।


















