अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में भारतीय रुपये पर दबाव लगातार गहराता जा रहा है, जहाँ अमेरिकी डॉलर के मुकाबले घरेलू मुद्रा में कमजोरी दर्ज की गई है। कच्चे तेल के दामों में आई हालिया मजबूती और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा मौद्रिक नीति को और अधिक सख्त बनाए जाने के संकेतों ने रुपये की रफ्तार को थाम दिया है। इसके साथ ही अमेरिका के मजबूत आर्थिक आंकड़ों ने डॉलर इंडेक्स को आठ हफ्तों के उच्च स्तर के करीब पहुंचा दिया है, जिससे उभरते बाजारों की मुद्राओं के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
कच्चे तेल में तेजी और एमसीएक्स पर कारोबार
ऊर्जा बाजार में उठापटक का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और रुपये की सेहत पर देखने को मिल रहा है। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज यानी एमसीएक्स पर 19 अक्टूबर को समाप्त होने वाला कच्चा तेल अनुबंध शुरुआती सत्र में 0.45 प्रतिशत की गिरावट के साथ 8,785 रुपये के आसपास कारोबार करता दिखा। हालांकि, बुधवार को इसमें जोरदार रिकवरी दर्ज की गई थी, जब कीमतें 8,496 रुपये के दो सप्ताह के निचले स्तर को छूने के बाद तेजी से पलटी थीं। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के लाइव आंकड़ों के अनुसार, यह 92.07 डॉलर प्रति बैरल के आसपास देखा गया है, जिसका पिछला बंद 92.16 डॉलर था और इसका 52 हफ्तों का दायरा 54.98 डॉलर से 119.48 डॉलर के बीच रहा है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर आयातित कच्चे तेल पर निर्भर रहता है। जब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें चढ़ती हैं, तो देश का आयात बिल बढ़ जाता है, जिससे डॉलर की मांग में भारी इजाफा होता है और इसका सीधा प्रतिकूल असर घरेलू मुद्रा पर पड़ता है।
मजबूत डॉलर इंडेक्स और अमेरिकी अर्थव्यवस्था के संकेत
वैश्विक स्तर पर छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर के मूल्य को मापने वाला अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (DXY) 101.23 के आठ सप्ताह के उच्च स्तर के बेहद करीब मजबूती के साथ डटा हुआ है। वित्तीय बाजारों में इस बात की व्यापक चर्चा है कि फेडरल रिजर्व चालू वर्ष में ब्याज दरों में और बढ़ोतरी कर सकता है, भले ही उसने इस महीने की नीतिगत बैठक में पहले ही दरें बढ़ाई हों।
अमेरिकी एसएंडपी ग्लोबल क्रय प्रबंधक सूचकांक यानी पीएमआई के हालिया आंकड़ों ने आर्थिक गतिविधियों में अप्रत्याशित तेजी दिखाई है। सितंबर के शुरुआती आंकड़ों में दर्ज की गई इस मजबूत वृद्धि ने उन अनुमानों को और पुख्ता कर दिया है कि फेडरल रिजर्व भविष्य में भी आक्रामक ब्याज दर वृद्धि की नीति जारी रख सकता है। मजबूत डॉलर और ऊंची बॉन्ड यील्ड के कारण विदेशी निवेशक सुरक्षित संपत्तियों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे अन्य मुद्राओं में बिकवाली देखी जा रही है।
भू-राजनीतिक खींचतान और ट्रंप-पेजशकियान के बयान
अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर वाशिंगटन और तेहरान के बीच बयानबाजी से भी तनाव बढ़ा हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि वाशिंगटन के पास मुख्य रूप से दो ही विकल्प हैं, या तो ईरान के साथ समझौता किया जाए या फिर उस देश का नामोनिशान मिटा दिया जाए। इसके साथ ही उन्होंने मध्यावधि चुनावों के बाद ही किसी समझौते की उम्मीदों को आगे खिसकाने का संकेत दिया।
इस रुख पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए ईरानी राष्ट्रपति पेजशकियान ने स्पष्ट किया कि दुनिया ने ईरान की ताकत और अडिग रहने की क्षमता को देख लिया है और वे जान चुके हैं कि ईरान को कभी आत्मसमर्पण के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। मध्य पूर्व में तनाव की किसी भी नई चिंगारी से तेल आपूर्ति बाधित होने का जोखिम रहता है, जो सीधे तौर पर कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों को भड़का सकता है।
यूएसडी/आईएनआर का तकनीकी विश्लेषण
दैनिक तकनीकी चार्ट पर नजर डालें तो यूएसडी/आईएनआर 95.90 पर कारोबार कर रहा है। यह जोड़ी 95.5722 के स्तर पर स्थित अपने 20-दिवसीय एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज यानी ईएमए के ऊपर टिकी हुई है। तकनीकी जानकारों के अनुसार, जब तक भाव इस ईएमए से ऊपर बने रहते हैं, तब तक अल्पकालिक दृष्टिकोण तेजी का बना हुआ है। मोमेंटम संकेतक भी इस सकारात्मक रुझान को समर्थन दे रहे हैं, जहां रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स यानी आरएसआई 59.7 पर पहुंच गया है, जो ओवरबॉट स्थिति में पहुंचे बिना मजबूती दर्शाता है।
नीचे की ओर, 95.57 पर स्थित 20-दिवसीय ईएमए एक तात्कालिक सहारा यानी सपोर्ट का काम कर रहा है। ऊपर की ओर, इस जोड़ी के सामने सबसे बड़ी बाधा 17 सितंबर का उच्चतम स्तर 96.10 है। यदि यह जोड़ी 96.10 के स्तर को निर्णायक रूप से पार करने में सफल होती है, तो इसके 97.00 के अपने सर्वकालिक उच्च स्तर की ओर बढ़ने की संभावना काफी प्रबल हो जाएगी।
रुपये पर असर डालने वाले कारक और आरबीआई की भूमिका
भारतीय रुपया वैश्विक परिस्थितियों और बाहरी कारकों के प्रति बेहद संवेदनशील मुद्राओं में गिना जाता है। कच्चे तेल की कीमतें, डॉलर की वैश्विक मजबूती और विदेशी निवेश का प्रवाह ऐसे प्रमुख तत्व हैं जो रुपये की विनिमय दर तय करते हैं। देश का अधिकांश विदेशी व्यापार अमेरिकी डॉलर में निपटाया जाता है, जिससे डॉलर की अंतरराष्ट्रीय मजबूती रुपये को कमजोर बनाती है।
भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में सीधे तौर पर हस्तक्षेप करता है ताकि रुपये की विनिमय दर में अत्यधिक अस्थिरता को रोका जा सके और आयात-निर्यात को सुगम बनाया जा सके। इसके अलावा, केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को समायोजित करके मुद्रास्फीति को 4 प्रतिशत के लक्ष्य पर बनाए रखने का प्रयास करता है। सामान्य तौर पर ऊंची ब्याज दरें रुपये को सहारा देती हैं, क्योंकि इससे वैश्विक कैरी ट्रेड को बढ़ावा मिलता है। विदेशी निवेशक कम ब्याज दर वाले देशों से उधार लेकर भारत जैसे अपेक्षाकृत उच्च ब्याज दर वाले देशों में पूंजी लगाते हैं, जिससे विदेशी मुद्रा का अंतर्वाह बढ़ता है।
मैक्रोइकॉनॉमिक दृष्टिकोण से देखें तो मुद्रास्फीति, आर्थिक विकास दर यानी जीडीपी, व्यापार संतुलन और प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई और एफआईआई) रुपये के लिए निर्णायक साबित होते हैं। यदि देश में महंगाई दर अन्य देशों की तुलना में अधिक होती है, तो यह निर्यात को महंगा बनाती है और मुद्रा का अवमूल्यन करती है। हालांकि, महंगाई से निपटने के लिए जब केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में इजाफा करता है, तो विदेशी पूंजी के आकर्षण से रुपये को दोबारा मजबूती भी मिल सकती है।
अन्य वैश्विक बाजारों और मुद्राओं का रुख
वैश्विक मुद्रा बाजारों में अन्य जोड़ियों में भी उठापटक साफ देखी जा रही है। एशियाई कारोबारी सत्र में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 0.7000 के स्तर की ओर फिसलता नजर आया। ऑस्ट्रेलिया के अगस्त रोजगार आंकड़ों में बेरोजगारी दर अनुमानित 4.5 प्रतिशत के मुकाबले बढ़कर 4.6 प्रतिशत हो गई, हालांकि रोजगार परिवर्तन 39.5 हजार के आंकड़े के साथ अनुमानों से बेहतर रहा। कारोबारी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच होने वाली अहम बैठक को लेकर भी सतर्क बने हुए हैं।
उधर, जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर (यूएसडी/जेपीवाई) तीन सप्ताह के उच्च स्तर से पीछे हटते हुए 158.00 के आसपास देखा गया। जापान के बॉन्ड यील्ड में उछाल और बैंक ऑफ जापान द्वारा संभावित हस्तक्षेप के जोखिमों ने येन को थोड़ी राहत दी। बैंक ऑफ जापान ने अपनी मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने की दिशा में कदम उठाते हुए अल्पकालिक ब्याज दर लक्ष्य को 7-2 के बहुमत से 1.00 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत कर दिया है, जो काफी हद तक बाजार के अनुमानों के अनुरूप था।
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने बताया कि अमेरिका और चीन अपने द्विपक्षीय व्यापार संघर्ष विराम को बढ़ाने पर सहमत हो गए हैं, जो पहले नवंबर में समाप्त होने वाला था और अब इसे 10 जनवरी तक बढ़ा दिया गया है। यह निर्णय स्कॉट बेसेंट और चीन के उप प्रधानमंत्री हे लिफेंग के बीच वाशिंगटन में हुई एक अनिर्धारित बैठक के बाद सामने आया। इस बीच, सोने की कीमतें भी एक सप्ताह के निचले स्तर के आसपास स्थिर होती दिखी हैं, क्योंकि बाजार भागीदार ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच दुर्लभ खनिजों और प्रौद्योगिकी प्रतिबंधों पर होने वाली चर्चाओं के नतीजों का इंतजार कर रहे हैं।
















