पश्चिम एशिया में कूटनीतिक और सैन्य गतिरोध गहराने से अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों में एक बार फिर तल्खी देखने को मिल रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह सैन्य कार्रवाइयों के विकल्प को बंद नहीं कर रहे हैं। उनका मानना है कि संघर्ष समाप्त होते ही कच्चे तेल की कीमतें तेजी से नीचे आ जाएंगी। हालांकि, उन्होंने यह भी जोर देकर कहा कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना वैश्विक सुरक्षा और परमाणु निरोधक क्षमता के लिए बेहद आवश्यक है। दूसरी ओर, ईरान के पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी ने जलमार्गों का इस्तेमाल करने वाले वाणिज्यिक जहाजों को चेतावनी जारी की है। ईरानी प्राधिकरण ने बिना अनुमति के फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्तों से गुजरने वाले जहाजों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की धमकी दी है।
क्रूड ऑयल बेंचमार्क और $92 के पार WTI की कीमतें
इस क्षेत्रीय तनाव का सीधा असर कमोडिटी बाजारों पर पड़ा है। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड की कीमतें 0.72 प्रतिशत चढ़कर 92.00 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में WTI को एक महत्वपूर्ण बेंचमार्क माना जाता है। यह अमेरिका में उत्पादित होने वाला हल्का और मीठा कच्चा तेल है, जिसमें सल्फर की मात्रा बेहद कम होती है। अपनी उच्च गुणवत्ता के कारण इसे रिफाइन करना बेहद आसान माना जाता है। अमेरिका के ओक्लाहोमा स्थित कुशिंग हब से इसका वितरण होता है, जिसे वैश्विक पाइपलाइन नेटवर्क का सबसे बड़ा चौराहा भी कहा जाता है।
कच्चे तेल का मूल्य मूल रूप से मांग और आपूर्ति के सिद्धांतों पर निर्भर करता है। जब वैश्विक आर्थिक गतिविधियों में तेजी आती है, तो ऊर्जा की मांग बढ़ती है। इसके विपरीत, राजनीतिक अस्थिरता, युद्ध और व्यापारिक प्रतिबंध आपूर्ति श्रृंखला को बाधित करके कीमतों को आसमान पर पहुंचा देते हैं। इसके अलावा, तेल उत्पादक देशों के संगठन OPEC के फैसले भी बाजार को सीधे प्रभावित करते हैं। चूंकि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल का कारोबार अमेरिकी डॉलर में होता है, इसलिए डॉलर की मजबूती या कमजोरी भी तेल के भाव तय करने में अहम भूमिका निभाती है।
OPEC का प्रभाव और साप्ताहिक इन्वेंट्री रिपोर्ट
तेल बाजार में आपूर्ति नियंत्रण का सबसे बड़ा काम OPEC करता है। 12 सदस्य देशों वाला यह समूह साल में दो बार बैठक करके उत्पादन को लेकर कोटा तय करता है। जब यह संगठन आपूर्ति घटाता है, तो कीमतें तेजी से बढ़ती हैं। वहीं उत्पादन बढ़ाने पर कीमतें गिर जाती हैं। रूस जैसे 10 गैर-सदस्यीय देशों को मिलाकर बने व्यापक प्रारूप को OPEC+ कहा जाता है। इसके अलावा, अमेरिकी पेट्रोलियम संस्थान (API) और ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) द्वारा जारी की जाने वाली साप्ताहिक इन्वेंट्री रिपोर्ट भी कीमतों पर गहरा असर डालती हैं। API की रिपोर्ट हर मंगलवार और EIA की रिपोर्ट बुधवार को जारी होती है। सरकारी एजेंसी होने के कारण EIA के आंकड़ों को बाजार में अधिक विश्वसनीय माना जाता है।
मुद्रा बाजार में डॉलर की बढ़त और विदेशी मुद्राओं पर दबाव
ऊर्जा की बढ़ती कीमतों ने मुद्रास्फीति की नई चिंताओं को जन्म दिया है। इसके चलते अमेरिकी केंद्रीय बैंक Fed द्वारा अक्टूबर में ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना बढ़ गई है, जिससे अमेरिकी डॉलर को मजबूत सहारा मिल रहा है। इसका नकारात्मक असर अन्य वैश्विक मुद्राओं पर पड़ा है। AUD/USD की जोड़ी गिरकर 0.7100 के स्तर से नीचे आ गई है, जो 4 अगस्त के बाद का सबसे निचला स्तर है। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर पर यह दबाव रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया (RBA) की आगामी मौद्रिक नीति बैठक से ठीक पहले देखने को मिल रहा है।
दूसरी तरफ, USD/JPY में भी खरीदारी का रुझान देखा जा रहा है। जापानी येन में सरकारी हस्तक्षेप की अटकलों के कारण आई गिरावट के बाद अमेरिकी डॉलर ने फिर से वापसी की है। बैंक ऑफ जापान (BoJ) के नरम रुख के कारण येन की बढ़त सीमित बनी हुई है। पिछले सप्ताह Fed और BoJ दोनों ही केंद्रीय बैंकों ने अपनी ब्याज दरों में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी की थी, और दोनों ने संकेत दिया है कि भविष्य के कदम केवल आने वाले आर्थिक आंकड़ों पर ही निर्भर करेंगे।
सोने की चमक पड़ी फीकी
सुरक्षित निवेश माने जाने वाले सोने पर भी डॉलर की मजबूती और ऊंचे बॉन्ड यील्ड का असर पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना गिरकर लगभग $4,250 प्रति औंस के करीब आ गया है। व्यापारी अब $4,235 के स्तर पर पैनी नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि इससे नीचे जाने पर बिकवाली का दबाव और गहरा सकता है। ब्याज न देने वाली इस पीली धातु के लिए बढ़ती ब्याज दरें और मजबूत डॉलर लगातार चुनौती बने हुए हैं।





















