अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में बुधवार को लगातार दूसरे कारोबारी सत्र के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में बढ़त का रुझान देखा गया, जिससे अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट एक महीने के निचले स्तर से उबरने में सफल रहा। एशियाई कारोबारी समय के दौरान डब्ल्यूटीआई का भाव 0.30 प्रतिशत की तेजी के साथ 89.50 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा था। हालांकि कीमतों में यह मजबूती देखने को मिली है, लेकिन खरीदारों में बहुत आक्रामक रुख की कमी साफ झलक रही है। लाइव मार्केट डेटा के अनुसार, कच्चे तेल का भाव 90.09 डॉलर पर दर्ज हुआ है, जो पिछले बंद स्तर 89.44 डॉलर की तुलना में 0.73 प्रतिशत की बढ़त दर्शाता है। इसका 52 हफ्तों का दायरा 54.98 डॉलर से 119.48 डॉलर प्रति बैरल के बीच बना हुआ है।
भू-राजनीतिक टकराव और खाड़ी में आपूर्ति संकट
मध्य पूर्व में गहराते भू-राजनीतिक जोखिमों ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की चिंताओं को फिर से बढ़ा दिया है, जिससे कच्चे तेल की कीमतों को बुनियादी सहारा मिल रहा है। यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच सैन्य तनाव नए सिरे से बढ़ गया है। हालिया घटनाक्रम में, सऊदी अरब समर्थित यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकारी सेनाओं ने लाल सागर तट के प्रमुख रणनीतिक ठिकानों पर अपना नियंत्रण स्थापित करने का दावा किया है, जिसमें बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास के इलाके शामिल हैं। इस सैन्य कार्रवाई के जवाब में, हूती गुट ने सऊदी अरब में महत्वपूर्ण ठिकानों पर हमले शुरू कर दिए, जिनमें रियाद स्थित अरामको रिफाइनरी को भी निशाना बनाया गया।
इसके साथ ही ईरान की ओर से होर्मुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक तेल टैंकरों पर हमलों में तेजी आई है, जिससे वैश्विक तेल शिपिंग मार्ग गंभीर खतरे में पड़ गए हैं। दूसरी ओर, अमेरिका की मैक्सिको की खाड़ी में एक उभरते हुए चक्रवाती तूफान ने अमेरिकी ऊर्जा उत्पादन और तेल शोधन के अहम बुनियादी ढांचे के लिए नया जोखिम पैदा कर दिया है। इन संयुक्त परिस्थितियों ने बाजार में आपूर्ति की आसान स्थिति के असर को कम कर दिया है और कच्चे तेल के भाव को ऊपर की ओर सहारा दिया है। फिर भी, बाजार में बहुत बड़े सौदे लगाने से पहले ट्रेडर सतर्कता बरत रहे हैं, क्योंकि स्पष्ट दिशा का अभाव बना हुआ है।
तकनीकी संकेत और प्रमुख स्तरों पर स्थिति
चार्ट पर तकनीकी विश्लेषण के लिहाज से, 4-घंटे के टाइमफ्रेम पर कच्चे तेल की कीमतें 200-अवधि के सिंपल मूविंग एवरेज यानी 200-एसएमए से नीचे बनी हुई हैं। इस बाधा की वजह से कीमतों में किसी भी तेज उछाल की गुंजाइश सीमित हो रही है। हालांकि मोमेंटम में हल्का सुधार देखने को मिला है, जहां मूविंग एवरेज कन्वर्जेंस डाइवर्जेंस यानी एमएसीडी 0.15 पर सकारात्मक होकर ऊपर की ओर बढ़ रहा है, वहीं रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स यानी आरएसआई लगभग 50.55 पर बना हुआ है, जो न्यूट्रल से पॉजिटिव दायरे का संकेत देता है। इसका मतलब है कि किसी भी उछाल पर बिकवाली का दबाव आ सकता है।
ताजा लाइव संकेतकों पर नजर डालें तो दैनिक आधार पर 14-पीरियड आरएसआई 46 पर है और एमएसीडी -0.21 पर है, जबकि इसका सिग्नल 0.91 पर बना हुआ है, जिससे हिस्टोग्राम -1.12 पर मंदी का रुझान दिखाता है। मूविंग एवरेजेस में 20-डे ईएमए 92.27 डॉलर, 50-डे ईएमए 90.14 डॉलर और 200-डे ईएमए 80.98 डॉलर पर है, जबकि 50-डे एसएमए 88.93 डॉलर और 200-डे एसएमए 82.89 डॉलर पर स्थित है। चूंकि 50-डे ईएमए 200-डे ईएमए से ऊपर है, इसलिए इसे गोल्डन क्रॉस के रूप में लंबे समय के अपट्रेंड का संकेत माना जा रहा है। बॉलिंगर बैंड्स 85.01 डॉलर से 105.91 डॉलर के दायरे में हैं, जिनका मध्य स्तर 95.46 डॉलर है। एडीएक्स इंडिकेटर 18 पर है, जो दायरे में सीमित उतार-चढ़ाव को दर्शाता है, जबकि स्टोकेस्टिक की फास्ट लाइन 19 और सिग्नल लाइन 14 पर है। दैनिक अस्थिरता को दर्शाने वाला एटीआर 4.24 पर है, जिसका उपयोग स्टॉप-लॉस बफर के रूप में किया जा सकता है। आगामी ट्रेडिंग के लिए धुरी स्तर 90.11 डॉलर, पहला रेजिस्टेंस 90.59 डॉलर, दूसरा रेजिस्टेंस 91.10 डॉलर, पहला सपोर्ट 89.60 डॉलर और दूसरा सपोर्ट 89.12 डॉलर पर स्थित है।
डब्ल्यूटीआई कच्चा तेल क्या है और इसका महत्व
डब्ल्यूटीआई क्रूड ऑयल अंतरराष्ट्रीय जिंस बाजारों में कारोबार होने वाले प्रमुख कच्चे तेल प्रकारों में से एक है। इसका पूरा नाम वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट है। वैश्विक तेल व्यापार में तीन सबसे प्रमुख बेंचमार्क माने जाते हैं, जिनमें डब्ल्यूटीआई के अलावा ब्रेंट और दुबई क्रूड शामिल हैं। डब्ल्यूटीआई को उद्योग में हल्का और मीठा तेल भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें अपेक्षाकृत कम घनत्व और कम सल्फर की मात्रा होती है। कम सल्फर और हल्के घनत्व के कारण इसे बहुत उच्च गुणवत्ता वाला कच्चा तेल माना जाता है, जिसे गैसोलीन और डीजल जैसे ईंधनों में रिफाइन करना काफी आसान होता है।
इस कच्चे तेल का उत्पादन मुख्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका के विभिन्न तेल क्षेत्रों से होता है। इसके भंडारण और वितरण का मुख्य केंद्र ओक्लाहोमा में स्थित कुशिंग हब है, जिसे दुनिया के पाइपलाइनों का चौराहा कहा जाता है। यह हब तेल परिवहन नेटवर्क का केंद्रीय बिंदु है। इसी कारण से अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में डब्ल्यूटीआई को बेंचमार्क माना जाता है और वित्तीय समाचार माध्यमों में इसके भाव प्रमुखता से उद्धृत किए जाते हैं।
तेल कीमतों को प्रभावित करने वाले बुनियादी कारक
अन्य सभी वित्तीय संपत्तियों की तरह कच्चे तेल की कीमतों के निर्धारण में भी मांग और आपूर्ति का संतुलन सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वैश्विक आर्थिक विकास में तेजी आने पर औद्योगिक गतिविधियों और परिवहन की मांग बढ़ती है, जिससे तेल की खपत बढ़ती है और कीमतें मजबूत होती हैं। इसके विपरीत, यदि दुनिया भर में आर्थिक वृद्धि कमजोर होती है तो ऊर्जा की मांग घटने से कीमतों पर दबाव बनता है। इसके अतिरिक्त, प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्रों में राजनीतिक अस्थिरता, क्षेत्रीय युद्ध और व्यापारिक प्रतिबंध आपूर्ति श्रृंखला को बाधित करते हैं, जिससे आपूर्ति की कमी पैदा होकर दाम तेजी से बढ़ सकते हैं।
अमेरिकी डॉलर के मूल्य में उतार-चढ़ाव भी डब्ल्यूटीआई की कीमतों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। दुनिया भर में कच्चे तेल का अधिकांश व्यापार अमेरिकी डॉलर में तय होता है। जब डॉलर कमजोर होता है, तो अन्य मुद्राओं वाले देशों और खरीदारों के लिए तेल खरीदना सस्ता हो जाता है, जिससे मांग और कीमतें बढ़ती हैं। दूसरी ओर, मजबूत डॉलर विदेशी खरीदारों के लिए तेल को महंगा बना देता है, जिससे मांग में कमी आ सकती है।
ओपेक और ओपेक प्लस की उत्पादन नीतियां
कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय बाजार पर पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन यानी ओपेक का बड़ा प्रभाव रहता है। ओपेक 12 तेल उत्पादक देशों का एक समूह है, जो साल में दो बार होने वाली बैठकों में सदस्य देशों के लिए उत्पादन कोटा सामूहिक रूप से तय करता है। इन बैठकों में लिए गए नीतिगत फैसले डब्ल्यूटीआई के भाव पर गहरा असर डालते हैं। जब ओपेक सदस्य देश अपने उत्पादन कोटा में कटौती करने का फैसला करते हैं, तो बाजार में आपूर्ति घट जाती है और कच्चे तेल के भाव में उछाल आता है। इसके उलट, जब यह समूह उत्पादन बढ़ाने की घोषणा करता है, तो बाजार में आपूर्ति की अधिकता होने से कीमतें गिरने लगती हैं।
इसके अलावा ओपेक प्लस नामक एक विस्तारित मंच भी है, जिसमें ओपेक के 12 सदस्यों के साथ 10 अतिरिक्त गैर-ओपेक तेल उत्पादक देश शामिल हैं। इन सहयोगी देशों में सबसे प्रमुख और प्रभावशाली देश रूस है। ओपेक प्लस की संयुक्त रणनीतियां वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की दिशा तय करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
इन्वेंट्री रिपोर्ट्स का बाजार पर असर
कच्चे तेल के साप्ताहिक भंडार से जुड़े आंकड़े भी कीमतों की दिशा तय करने में बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। अमेरिका में अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट यानी एपीआई और एनर्जी इंफॉर्मेशन एजेंसी यानी ईआईए द्वारा हर हफ्ते इन्वेंट्री रिपोर्ट जारी की जाती हैं। कच्चे तेल के भंडार में होने वाले बदलाव से बाजार में मांग और आपूर्ति के वास्तविक रुझान का पता चलता है। यदि साप्ताहिक आंकड़ों में तेल के भंडार में गिरावट दर्ज की जाती है, तो यह खपत में बढ़ोतरी का संकेत होता है, जिससे कीमतें ऊपर जाती हैं। इसके विपरीत, यदि भंडारों में अप्रत्याशित वृद्धि होती है, तो यह आपूर्ति अधिक होने का संकेत होता है, जिससे कीमतों में नरमी आती है।
एपीआई की साप्ताहिक रिपोर्ट प्रत्येक मंगलवार को जारी की जाती है, जबकि सरकारी संस्था ईआईए अपने आंकड़े अगले दिन यानी बुधवार को सार्वजनिक करती है। आमतौर पर इन दोनों रिपोर्टों के परिणाम लगभग एक जैसे होते हैं और 75 प्रतिशत मौकों पर इनके आंकड़ों में केवल 1 प्रतिशत के भीतर का अंतर देखा जाता है। सरकारी एजेंसी होने के कारण वित्तीय बाजारों में ईआईए के आंकड़ों को अधिक विश्वसनीय और प्रामाणिक माना जाता है।
मुद्रा बाजार और अन्य वैश्विक संपत्तियों की हलचल
बुधवार के कारोबारी सत्र में मुद्रा और कमोडिटी बाजारों में भी महत्वपूर्ण उतार-चढ़ाव देखा गया। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और अमेरिकी डॉलर की जोड़ी 0.7000 के नीचे दबाव में रही और हालिया सुधार को बनाए रखने में असमर्थ रही। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी के बाद भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच अमेरिकी डॉलर को निचली कीमतों पर खरीदारी का समर्थन मिला, जिससे ऑस्ट्रेलियाई रिजर्व बैंक के सख्त नीतिगत रुख के बावजूद यह जोड़ी दबाव में बनी रही। निवेशकों की नजर अब एफओएमसी मिनट्स पर टिकी हुई है।
उधर, अमेरिकी डॉलर और जापानी येन की जोड़ी एशियाई कारोबार में लगभग डेढ़ हफ्ते के उच्चतम स्तर 158.50 के पास बनी रही। खरीदार आगे की बढ़त के लिए 200-दिवसीय एसएमए के स्तर को पार करने का इंतजार कर रहे हैं। बैंक ऑफ जापान के नरम बयानों और अमेरिकी यील्ड में तेजी ने डॉलर को मजबूती दी है। दूसरी तरफ, सोने की कीमतों में पिछली बढ़त का असर फीका पड़ता दिखा और सोना 4,150 डॉलर के करीब संघर्ष करता नजर आया। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड और कच्चे तेल में उछाल के साथ डॉलर के मजबूत होने से अल्पकालिक रूप से सोने में उछाल पर बिकवाली का रुख देखा जा रहा है।
भारतीय रुपया और केंद्रीय बैंकों की नीतियां
भारतीय रिजर्व बैंक के ताजा मौद्रिक नीति निर्णय के बाद भारतीय रुपये में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कोई बड़ा बदलाव नहीं देखा गया। रिजर्व बैंक ने अपनी प्रमुख रेपो दर को 25 आधार अंक बढ़ाकर 5.5 प्रतिशत कर दिया है। इसके साथ ही भारत के केंद्रीय बैंक ने अपनी नीतिगत मुद्रा को तटस्थ रुख से बदलकर कैलिब्रेटेड टाइटनिंग यानी नपी-तुली सख्ती में स्थानांतरित कर दिया है।
वैश्विक स्तर पर यूरोपीय सेंट्रल बैंक भी जटिल स्थिति का सामना कर रहा है। सामान्य परिस्थितियों में जब मुद्रास्फीति तय लक्ष्य से लगभग दोगुनी चल रही हो, तो ब्याज दरें बढ़ाना सीधा उपाय होता है। लेकिन मौजूदा परिस्थितियां सामान्य नहीं हैं, क्योंकि बॉन्ड बाजार पहले ही आंशिक रूप से सख्त रुख अपना चुका है, जिससे ईसीबी के सामने नीतिगत स्तर पर एक गंभीर असमंजस की स्थिति बन गई है।




















