भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी ताजा मौद्रिक नीति बैठक में मुख्य नीतिगत रेपो दर में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी का फैसला किया है, जिसके बाद रेपो दर बढ़कर 5.5% हो गई है। यह कदम फरवरी 2023 के बाद से केंद्रीय बैंक द्वारा की गई पहली ब्याज दर वृद्धि का संकेत देता है। इस महत्वपूर्ण फैसले के साथ ही देश के केंद्रीय बैंक ने अपने नीतिगत रुख को भी 'न्यूट्रल' से बदलकर 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' कर दिया है। इस नीतिगत सख्ती के ऐलान के बाद भी विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय रुपये ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कोई बहुत तीव्र या आक्रामक प्रतिक्रिया नहीं दिखाई और यह 96.37 के आसपास काफी हद तक शांत कारोबार करता नजर आया।
बाजार के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 96.53 पर देखा गया, जो पिछले बंद भाव 96.34 से 0.19% ऊपर है। पिछले 52 हफ्तों के दौरान इस मुद्रा जोड़ी का दायरा 85.86 से 97.05 के बीच रहा है, जबकि कारोबारी वॉल्यूम अपने 20 दिवसीय औसत के 1.00 गुना के स्तर पर बना रहा। तकनीकी संकेतकों की बात करें तो 14 दिवसीय आरएसआई 61 पर स्थित है, जबकि एमएसीडी 0.26 पर है जो इसके 0.20 के सिग्नल स्तर से ऊपर 0.06 का सकारात्मक हिस्टोग्राम दर्शाता है। मूविंग एवरेज के मोर्चे पर 20 दिवसीय ईएमए 95.92, 50 दिवसीय ईएमए 95.64 और 200 दिवसीय ईएमए 93.65 पर बना हुआ है, जबकि 50 दिवसीय एसएमए 95.49 और 200 दिवसीय एसएमए 93.98 दर्ज किया गया है। 50 दिवसीय ईएमए का 200 दिवसीय ईएमए से ऊपर रहना एक गोल्डन क्रॉस और दीर्घावधि बढ़त के रुझान को स्पष्ट करता है। बोलिंगर बैंड 95.18 से 96.63 के बीच मध्य रेखा 95.90 के साथ मौजूद है और भाव इन्हीं बैंड्स के भीतर गतिमान है। एडीएक्स 27 पर ट्रेंड की पुष्टि कर रहा है, फास्ट स्टोकेस्टिक 100 और सिग्नल 96 पर है, जबकि 14 दिवसीय एटीआर 0.51 पर देखा गया है। इसके प्रमुख तकनीकी स्तरों में पिवट 96.46, पहला प्रतिरोध आर1 96.60, दूसरा प्रतिरोध आर2 96.67, पहला समर्थन एस1 96.39 और दूसरा समर्थन एस2 96.25 पर स्थित है, जहां 20 दिवसीय समर्थन 94.49 और प्रतिरोध 96.54 के करीब दर्ज हुआ है।
वैश्विक स्तर पर ग्रीनबैक की वापसी और बॉन्ड यील्ड में तेजी
विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में अमेरिकी डॉलर ने पिछले कारोबारी सत्र में आई सुधारात्मक गिरावट के बाद फिर से मजबूती हासिल कर ली है। एशियाई कारोबारी घंटों के दौरान अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (DXY), जो छह प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं के मुकाबले ग्रीनबैक के मूल्य का आकलन करता है, 0.18% की मजबूती के साथ 102.00 के आसपास कारोबार करता नजर आया। अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की यील्ड में नए सिरे से आई तेजी ने निचले स्तरों पर डॉलर के खरीदारों को आकर्षित किया, जिसे वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं से भी सहारा मिला।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजारों में प्रतिभागियों का पूरा ध्यान अब यूएस फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति बैठक के विवरण यानी एफओएमसी मिनट्स पर टिका हुआ है। केंद्रीय बैंकों के रुख और आने वाले ब्याज दर फैसलों को लेकर निवेशक सतर्क हैं, जिसके चलते डॉलर इंडेक्स को निचले स्तरों पर मजबूत तकनीकी आधार मिल रहा है।
अन्य एशियाई और वैश्विक मुद्राओं की स्थिति
एशियाई कारोबारी सत्र में केवल भारतीय रुपया ही नहीं, बल्कि अन्य प्रमुख मुद्रा जोड़ियों में भी डॉलर की मजबूती का सीधा असर देखा गया। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और अमेरिकी डॉलर की जोड़ी (AUD/USD) अपनी हालिया तेजी को बनाए रखने में संघर्ष करती नजर आई और बुधवार के एशियाई सत्र में 0.7000 के स्तर से नीचे नकारात्मक पूर्वाग्रह के साथ फिसल गई। रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया की ओर से ब्याज दरों में सख्ती की उम्मीदों के बावजूद, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी और सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में डॉलर की बढ़ती मांग ने इस जोड़ी पर लगातार दबाव बनाए रखा।
इसी प्रकार, जापानी येन के मुकाबले डॉलर (USD/JPY) बुधवार को एशियाई कारोबार के दौरान 158.50 के स्तर के पास डेढ़ हफ्ते के उच्च स्तर के करीब मंडराता रहा। बैंक ऑफ जापान की ओर से नरम नीतिगत बयानों के बीच निवेशक 200 दिवसीय एसएमए बाधा को पार करने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, ताकि एफओएमसी मिनट्स के जारी होने से पहले आगे की तेजी की स्थिति बनाई जा सके। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में ताजा उछाल और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं ने येन के मुकाबले ग्रीनबैक की मांग को अतिरिक्त समर्थन प्रदान किया है।
कमोडिटी बाजार में सुस्ती और यूरोपीय केंद्रीय बैंक की दुविधा
कीमती धातुओं के बाजार में सोना अपने पिछले सुधार को गंवाता दिखा और एशियाई सत्र में यह लगभग $4,150 प्रति औंस के स्तर पर टिके रहने के लिए जूझता रहा। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड में सुधार के तालमेल के साथ डॉलर की उछाल ने सोने की चमक को सीमित कर दिया है। तकनीकी नजरिए से सोने का यह अल्पकालिक रुख फिलहाल उछाल पर बिकवाली के दबाव को प्रदर्शित कर रहा है, क्योंकि निवेशक ब्याज दरों के परिदृश्य को लेकर सचेत हैं।
उधर यूरोपीय मोर्चे पर, यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ECB) के सामने एक जटिल मौद्रिक दुविधा खड़ी हो गई है। सामान्य परिस्थितियों में जब मुद्रास्फीति केंद्रीय बैंक के तय लक्ष्य से दोगुनी गति से बढ़ रही हो, तो ब्याज दरों में सीधे बढ़ोतरी करना एक मानक समाधान होता है। हालांकि वर्तमान स्थितियां सामान्य नहीं हैं, क्योंकि वहां बॉन्ड बाजार पहले से ही नीतिगत सख्ती का एक बड़ा हिस्सा खुद ही पूरा कर रहा है। इस अनपेक्षित वित्तीय खिंचाव के कारण यूरोपीय केंद्रीय बैंक को दरों और आर्थिक स्थिरता के बीच संतुलन साधने में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।



















