अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में बुधवार को एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान स्विस फ्रैंक में कमजोरी दर्ज की गई, जबकि अमेरिकी डॉलर अपनी बढ़त को लगातार तीसरे दिन मजबूत करने में सफल रहा। मुद्रा विनिमय बाजार में यूएसडी/सीएचएफ की दर 0.8330 के आसपास कारोबार करती देखी गई। निवेशक बुधवार को ही बाद में आने वाले स्विट्जरलैंड के सितंबर महीने के विदेशी मुद्रा भंडार के आधिकारिक आंकड़ों का इंतजार कर रहे हैं। इस आंकड़े के सामने आने से पहले बाजार सहभागियों ने सतर्क रुख अपनाया है। वहीं स्विट्जरलैंड की मौसमी रूप से समायोजित बेरोजगारी दर सितंबर में 3.1% पर स्थिर बनी रही, जो लगातार पांचवां ऐसा महीना है जब इस दर में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
कच्चे तेल की कीमतें और अमेरिकी ब्याज दरों का परिदृश्य
अमेरिकी डॉलर को हाल के सत्रों में ऊर्जा बाजार से अतिरिक्त सहारा मिला है। कच्चे तेल के बढ़ते भाव और मध्य पूर्व से होने वाली आपूर्ति से जुड़े जोखिमों के चलते फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावनाओं को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सीएमई फेडवॉच टूल के आकलन के मुताबिक, वित्तीय बाजार अक्टूबर में होने वाली फेडरल रिजर्व की आगामी बैठक में ब्याज दर में बढ़ोतरी की लगभग 20% संभावना मानकर चल रहे हैं। हालांकि अमेरिकी डॉलर की यह तेजी असीमित नहीं मानी जा रही है, क्योंकि हाल ही में आए अमेरिका के कमजोर श्रम बाजार और पेरोल आंकड़ों ने लंबे समय तक मौद्रिक सख्ती जारी रहने की उम्मीदों को कुछ हद तक सीमित किया है।
यूरोपीय कर्ज का संकट और सुरक्षित निवेश का आकर्षण
डीबीएस के रणनीतिकारों ने इस बात को रेखांकित किया है कि अमेरिका में नरम मुद्रास्फीति और रोजगार आंकड़ों के दौर के बीच ही फ्रांस के सॉवरेन डेट यानी सरकारी कर्ज से जुड़ी चिंताएं भी उभरी हैं। इन परिस्थितियों ने पारंपरिक रूप से एक सुरक्षित मुद्रा मानी जाने वाली स्विस फ्रैंक की मांग को सहारा दिया। रणनीतिकारों के अनुसार, ईयूआर/सीएचएफ की दर में लगातार तीसरे सप्ताह गिरावट दर्ज की गई, क्योंकि फ्रांस के ओएटी और जर्मनी के बंड के बीच बढ़ता यील्ड स्प्रेड स्विस नेशनल बैंक के उस फैसले पर भारी पड़ गया, जिसमें उसने वैश्विक मौद्रिक सख्ती के चक्र से अलग हटते हुए नीति अपनाई थी और स्विस फ्रैंक के हस्तक्षेप वाले बयानों को नरम किया था। यह स्थिति दर्शाती है कि फ्रांस की राजनीतिक और राजकोषीय चिंताएं स्विस नेशनल बैंक के अपेक्षाकृत नरम रुख के बावजूद मुद्रा की चाल पर हावी रही हैं।
स्विस फ्रैंक का वैश्विक दर्जा और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
स्विस फ्रैंक यानी सीएचएफ स्विट्जरलैंड की आधिकारिक मुद्रा है। यह दुनिया भर में सबसे अधिक कारोबार की जाने वाली शीर्ष दस मुद्राओं में गिनी जाती है, और इसका वैश्विक कारोबारी आकार स्विट्जरलैंड की अपनी अर्थव्यवस्था के कुल आकार से कहीं अधिक है। स्विस फ्रैंक का मूल्य व्यापक बाजार धारणा, देश की आर्थिक सेहत और स्विस नेशनल बैंक द्वारा उठाए गए कदमों जैसे कई कारकों से तय होता है। वर्ष 2011 से 2015 के दौरान स्विस फ्रैंक को यूरो के साथ एक निश्चित दर पर पेग यानी बांध कर रखा गया था। इस पेग को अचानक हटा दिया गया था, जिसके बाद फ्रैंक के मूल्य में 20% से अधिक की तीव्र वृद्धि हुई थी और दुनिया भर के वित्तीय बाजारों में भारी उथल-पुथल मच गई थी। हालांकि अब यह व्यवस्था लागू नहीं है, फिर भी पड़ोसी यूरोज़ोन पर स्विट्जरलैंड की भारी निर्भरता के कारण स्विस फ्रैंक की चाल यूरो के साथ काफी हद तक जुड़ी रहती है।
सुरक्षित संपत्ति के रूप में निवेशकों की पसंद
वैश्विक वित्तीय जगत में स्विस फ्रैंक को एक सुरक्षित ठिकाना या सेफ हेवन मुद्रा माना जाता है, जिसे निवेशक बाजार में तनाव या अनिश्चितता के दौर में खरीदना पसंद करते हैं। स्विट्जरलैंड की दुनिया भर में मजबूत साख इसके पीछे का मुख्य कारण है। देश की स्थिर अर्थव्यवस्था, मजबूत निर्यात क्षेत्र, केंद्रीय बैंक के विशाल भंडार और वैश्विक संघर्षों में लंबे समय से चली आ रही तटस्थता की राजनीतिक नीति इसे जोखिम से बचने वाले निवेशकों के लिए एक स्वाभाविक विकल्प बनाती है। अस्थिर और अशांत दौर में स्विस फ्रैंक उन अन्य मुद्राओं की तुलना में मजबूत होने लगता है जिन्हें अधिक जोखिम भरा माना जाता है।
स्विस नेशनल बैंक की मौद्रिक नीति का ढांचा
स्विट्जरलैंड का केंद्रीय बैंक, जिसे स्विस नेशनल बैंक कहा जाता है, मौद्रिक नीति पर निर्णय लेने के लिए साल में चार बार यानी हर तिमाही में एक बार बैठक करता है। यह अन्य प्रमुख वैश्विक केंद्रीय बैंकों की तुलना में कम बैठकों का अंतराल है। बैंक सालाना मुद्रास्फीति दर को 2% से नीचे रखने का लक्ष्य लेकर चलता है। जब महंगाई दर इस तय लक्ष्य से ऊपर निकल जाती है या निकट भविष्य में ऊपर जाने का अनुमान होता है, तो बैंक कीमतों की वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए अपनी नीतिगत दर में बढ़ोतरी करता है। उच्च ब्याज दरें आमतौर पर स्विस फ्रैंक के लिए सकारात्मक मानी जाती हैं क्योंकि वे निवेशकों को बेहतर यील्ड देती हैं और देश को पूंजी लगाने के लिए आकर्षक बनाती हैं। इसके विपरीत, ब्याज दरों में कमी आने पर फ्रैंक में कमजोरी देखने को मिलती है।
आर्थिक आंकड़ों का प्रभाव और यूरोज़ोन से संबंध
स्विट्जरलैंड में जारी होने वाले व्यापक आर्थिक आंकड़े अर्थव्यवस्था की सेहत का सटीक आकलन करने और मुद्रा के मूल्यांकन को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्विट्जरलैंड की अर्थव्यवस्था मोटे तौर पर स्थिर रहती है, लेकिन आर्थिक वृद्धि, मुद्रास्फीति, चालू खाता या केंद्रीय बैंक के विदेशी मुद्रा भंडार में अचानक आने वाले किसी भी बड़े बदलाव में स्विस फ्रैंक की दिशा बदलने की क्षमता होती है। सामान्य तौर पर तेज आर्थिक वृद्धि, कम बेरोजगारी और ऊंचा कारोबारी भरोसा फ्रैंक के लिए अनुकूल होते हैं, जबकि कमजोर पड़ते आर्थिक संकेतकों से इसमें मूल्यह्रास हो सकता है। एक छोटी और खुली अर्थव्यवस्था होने के नाते स्विट्जरलैंड पूरी तरह से यूरोज़ोन की आर्थिक सेहत पर निर्भर है। यूरोपीय संघ स्विट्जरलैंड का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और प्रमुख सहयोगी है, जिससे यूरोज़ोन की स्थिरता स्विस फ्रैंक के लिए अत्यंत आवश्यक बन जाती है। कई वित्तीय मॉडलों के अनुसार यूरो और स्विस फ्रैंक की चाल के बीच का सह-संबंध 90% से अधिक या लगभग पूर्ण देखा गया है।
अन्य वैश्विक मुद्राओं और जिंस बाजारों की हलचल
वैश्विक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार के व्यापक दायरे में अन्य प्रमुख संपत्तियों में भी उतार-चढ़ाव देखा गया। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और अमेरिकी डॉलर का युग्म अपनी पिछली रिकवरी को बरकरार रखने के लिए संघर्ष करता दिखा और बुधवार के एशियाई सत्र में 0.7000 के स्तर से नीचे दबाव में रहा। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में नई तेजी के बाद अमेरिकी डॉलर में खरीदारी लौटी, जिससे रिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया के सख्त रुख की उम्मीदों के बावजूद यह युग्म दबाव में बना रहा। इसके साथ ही यूएसडी/जेपीवाई 158.50 के पास डेढ़ सप्ताह के उच्चतम स्तर के करीब टिका रहा, जहां जापानी केंद्रीय बैंक की नरम टिप्पणियों के बीच व्यापारी 200 दिवसीय एसएमए बाधा के पार जाने का इंतजार कर रहे हैं। इन सभी घटनाक्रमों के बीच सभी की निगाहें एफओएमसी कार्यवृत्त यानी मिनट्स पर टिकी हुई हैं।
सोने और एशियाई केंद्रीय बैंकों की नीतियां
जिंस बाजार में सोना अपनी पिछली तेजी गंवाता हुआ दिखा और एशियाई सत्र में 4,150 डॉलर के करीब संघर्ष करता नजर आया, जहां अमेरिकी डॉलर, कच्चे तेल और ट्रेजरी यील्ड की उछाल ने पीली धातु पर दबाव डाला। तकनीकी दृष्टिकोण से इसे उछाल पर बिकवाली वाला सौदा माना जा रहा है। दूसरी ओर, भारतीय रिज़र्व बैंक के नीतिगत फैसले के बाद भारतीय रुपये ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कोई बड़ा उतार-चढ़ाव नहीं दिखाया। भारतीय केंद्रीय बैंक ने अपनी प्रमुख रेपो दर को 25 आधार अंक बढ़ाकर 5.5% कर दिया है और अपने नीतिगत रुख को तटस्थ से बदलकर कैलिब्रेटेड टाइटनिंग कर दिया है। वहीं यूरोपीय केंद्रीय बैंक के सामने अलग चुनौती है, जहां मुद्रास्फीति उसके लक्ष्य से लगभग दोगुनी चल रही है और बॉन्ड बाजार द्वारा पहले से की जा रही सख्ती के कारण उसे ब्याज दरों को लेकर एक कठिन असमंजस का सामना करना पड़ रहा है।





















