बीसवीं सदी की शुरुआत में पश्चिमी एशिया और फारस की खाड़ी का एक बड़ा भूभाग नई दिल्ली स्थित प्रशासनिक मुख्यालय से संचालित होता था। आज जिसे दुनिया के सबसे समृद्ध और भव्य व्यापारिक केंद्र के रूप में जाना जाता है, वह दुबई और उसके आसपास के कई खाड़ी देश लगभग आठ दशक पहले तक ब्रिटिश भारत के प्रत्यक्ष राजनीतिक और प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र के अधीन थे। ओमान, कुवैत, बहरीन, कतर, संयुक्त अरब अमीरात के प्रमुख शहर दुबई और अबू धाबी तथा यमन जैसे क्षेत्रों की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था नई दिल्ली के फैसलों पर निर्भर करती थी। लेकिन वर्ष 1947 में देश की आजादी से मात्र कुछ महीने पहले लिए गए एक प्रशासनिक फैसले ने इस पूरे ऐतिहासिक समीकरण को बदल दिया। यदि यह प्रशासनिक अलगाव न हुआ होता तो मध्य पूर्व के विशाल तेल भंडार और रणनीतिक समुद्री मार्ग आज भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास और वैश्विक प्रभाव को एक बिल्कुल अलग दिशा दे रहे होते।
दिल्ली का प्रशासनिक ढांचा और फारस की खाड़ी का नियंत्रण
बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में अरब प्रायद्वीप का लगभग एक-तिहाई भूभाग प्रशासनिक रूप से ब्रिटिश भारत से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ था। उस दौर में खाड़ी के इन तमाम राज्यों की आंतरिक सुरक्षा, रणनीतिक फैसलों और सीमा प्रबंधन की जिम्मेदारी भारत में तैनात प्रशासनिक और सैन्य तंत्र के कंधों पर थी। मशहूर इतिहासकार और शोधकर्ता सैम डेलरिंपल के दस्तावेजों और अध्ययन के अनुसार, खाड़ी के इन इलाकों का पूरा शासन व्यवस्था ढांचा इंडियन पॉलिटिकल सर्विस (IPS) के अधिकारियों द्वारा संचालित किया जाता था। IPS के ये अधिकारी नई दिल्ली से मिलने वाले निर्देशों के आधार पर ही वहां का कामकाज देखते थे।
खाड़ी क्षेत्र में तैनात ब्रिटिश रेजिडेंट्स का करियर सीधे तौर पर भारतीय प्रशासनिक सेवा के ढांचे से बंधा हुआ था। अरब शेखों और सुल्तानों के प्रशासनिक मामलों, भूमि विवादों तथा राजनीतिक वार्ताओं से जुड़ी अंतिम फाइलें अंतिम स्वीकृति के लिए नई दिल्ली में भारत के वायसराय के दफ्तर में भेजी जाती थीं। इसके अतिरिक्त, पूरे मध्य पूर्व के समुद्री मार्गों और क्षेत्रीय सीमाओं की सुरक्षा का जिम्मा भारतीय सैनिकों पर था। भारतीय सेना की टुकड़ियां वहां शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात रहती थीं, जिससे नई दिल्ली का प्रभाव इन अरब रियासतों पर गहराई से कायम था।
भारतीय रुपया और व्यापारिक प्रभुत्व
खाड़ी के राज्यों पर नई दिल्ली का नियंत्रण केवल राजनीतिक और सैन्य मामलों तक सीमित नहीं था, बल्कि वहां की अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा के व्यापार का आधार भी भारतीय मुद्रा ही थी। आज भले ही दुबई में दिरहम, कुवैत में दीनार और कतर में रियाल का इस्तेमाल होता हो, लेकिन बीसवीं सदी के शुरुआती दौर में दुबई, अबू धाबी, कतर और कुवैत के बाजारों में दैनिक सौदों से लेकर बड़े व्यापारिक लेनदेन तक केवल भारतीय रुपया ही अधिकारिक मुद्रा के रूप में स्वीकार किया जाता था।
समुद्री व्यापार और माल ढुलाई के संचालन में ब्रिटिश इंडिया लाइन की जहाजरानी सेवा सबसे मुख्य माध्यम थी। इस जहाजरानी कंपनी के माध्यम से ही भारत और फारस की खाड़ी के बंदरगाहों के बीच माल और यात्रियों की आवाजाही होती थी। खाड़ी क्षेत्र की लगभग 30 छोटे-बड़े अरब रियासतों में तैनात ब्रिटिश रेजिडेंट्स सीधे नई दिल्ली के निर्देशों पर काम करते थे। प्रशासनिक तंत्र, कानूनी प्रक्रिया, व्यापारिक नियम और दैनिक व्यवस्था में भारत की यह मौजूदगी इतनी सघन थी कि उस दौर में खाड़ी क्षेत्र को नई दिल्ली के प्रशासनिक प्रभाव का ही एक विस्तृत हिस्सा माना जाता था।
एडन से ओमान: प्रशासनिक और सांस्कृतिक जुड़ाव
भारत और फारस की खाड़ी के राज्यों के बीच यह प्रशासनिक संबंध किस हद तक गहरा था, इसका प्रमाण यमन के ऐतिहासिक बंदरगाह शहर एडन और ओमान की रियासत से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों से मिलता है। यमन का प्रसिद्ध शहर एडन उस समय प्रशासनिक रूप से बॉम्बे प्रेसीडेंसी का ही एक आधिकारिक हिस्सा था। भारत से एडन की यात्रा करने वाले नागरिकों के लिए भारतीय प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा ही यात्रा दस्तावेज और पासपोर्ट जारी किए जाते थे।
सांस्कृतिक और शैक्षणिक स्तर पर भी यह संबंध बेहद अनोखा था। ओमान के तत्कालीन सुल्तान ने भारत के राजस्थान राज्य में अपनी शिक्षा प्राप्त की थी। राजस्थान में पढ़ाई करने के कारण उन्हें अरबी भाषा की तुलना में उर्दू भाषा पर अधिक सहज पकड़ हासिल थी। प्रशासनिक पत्राचार और संवाद में भी भारतीय भाषाओं और व्यवस्था की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी। यह सब इस बात का गवाह था कि फारस की खाड़ी का यह पूरा इलाका भारत की प्रशासनिक और सामाजिक व्यवस्था में गहराई से घुला-मिला था।
30 अप्रैल 1947 की गोपनीय चिट्ठी और प्रशासनिक अलगाव
यह ऐतिहासिक सवाल अक्सर उठता है कि जब फारस की खाड़ी का इतना विशाल भूभाग नई दिल्ली के प्रशासन से अटूट रूप से जुड़ा हुआ था, तो यह नाता अचानक कैसे समाप्त हो गया? इस राज से पर्दा कतर नेशनल लाइब्रेरी में सुरक्षित रखी गई एक सीक्रेट फाइल और दस्तावेजों से उठता है। आजादी की घोषणा से ठीक पहले ब्रिटिश सरकार और भारत के तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारियों के बीच यह गंभीर चर्चा छिड़ गई थी कि आजादी के बाद फारस की खाड़ी के राज्यों की राजनीतिक और सैन्य जिम्मेदारी कौन संभालेगा। क्या नया बनने वाला भारत या पाकिस्तान इस विशाल अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र का प्रशासनिक खर्च और सुरक्षा दायित्व उठाने के लिए तैयार होंगे?
इस संशय के बीच 30 अप्रैल 1947 को नई दिल्ली से लंदन स्थित इंडिया ऑफिस को एक गोपनीय चिट्ठी भेजी गई। इस सीक्रेट लेटर में स्पष्ट रूप से दर्ज था कि तत्कालीन गवर्नमेंट ऑफ इंडिया इस प्रस्ताव पर सहमत है कि फारस की खाड़ी के अरब राज्यों का सीधा राजनीतिक और प्रशासनिक नियंत्रण भारत सरकार के तंत्र से निकालकर सीधे ब्रिटेन की होम गवर्नमेंट को सौंप दिया जाए। प्रशासनिक अलगाव के इस ऐतिहासिक फैसले की प्रभावी तिथि 1 अप्रैल 1947 निर्धारित की गई। यानी 15 अगस्त 1947 को भारत को मिलने वाली आजादी से महज चार महीने पहले ही एक गोपनीय प्रशासनिक पत्र के जरिए खाड़ी राज्यों का भारत से प्रशासनिक संबंध हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया।
15 अगस्त 1947 और रियासतों के विलय का ऐतिहासिक मोड़
यदि 1 अप्रैल 1947 को यह गोपनीय प्रशासनिक विभाजन न हुआ होता, तो 15 अगस्त 1947 के समय इतिहास का परिदृश्य पूरी तरह भिन्न हो सकता था। 15 अगस्त 1947 के दौरान जब भारत और पाकिस्तान के बीच 500 से अधिक देशी रियासतों जैसे जयपुर, हैदराबाद और बहावलपुर के विलय की प्रक्रिया चल रही थी, तब दुबई, अबू धाबी, कुवैत और कतर जैसी खाड़ी की रियासतें भी इस प्रशासनिक विलय की चर्चा का हिस्सा बन सकती थीं।
अगर ये क्षेत्र भारत के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में बने रहते, तो आज मध्य पूर्व के विशाल तेल भंडार, प्रमुख वैश्विक व्यापारिक केंद्र और रणनीतिक समुद्री मार्ग भारत के नियंत्रण या घनिष्ठ राजनीतिक प्रभाव में होते। 1947 के उस एक प्रशासनिक फैसले ने न केवल नक्शा बदल दिया, बल्कि 20वीं और 21वीं सदी के वैश्विक पावर बैलेंस, ऊर्जा राजनीति और आर्थिक समीकरणों को हमेशा के लिए एक नया मोड़ दे दिया।



















