लाल सागर के तटीय इलाकों में जारी भीषण संघर्ष और हवाई हमलों के बीच अपनी जान बचाने के लिए यमन के नागरिक खतरनाक समुद्री सफर तय कर अफ्रीकी देश जिबूती पहुंच रहे हैं। यमन के तटीय शहर धुबाब के रहने वाले 50 वर्षीय इब्राहिम इस्सा युद्ध के खौफ से अपने पूरे परिवार को सुरक्षित निकालने वाले ऐसे ही एक नागरिक हैं। धुबाब हूती विद्रोहियों और सऊदी समर्थित सरकार समर्थक बलों के बीच जारी सैन्य टकराव का मुख्य केंद्र बना हुआ है। लगातार गूंजते लड़ाकू विमानों के शोर और चारों तरफ गिरते बमों से दहशत में आए इस्सा अपनी नाव के जरिए समुद्री रास्ता पार कर उत्तरी जिबूती के ओबोक स्थित मरकजी शरणार्थी शिविर पहुंचे हैं।
मरकजी शिविर में शरणार्थियों का दैनिक संघर्ष और हालात
ओबोक के मरकजी शरणार्थी शिविर में एक बड़े खुले गोदाम के नीचे रेतीले फर्श पर बिछी तिरपाल के सहारे इब्राहिम इस्सा का परिवार बैठा है। यह शिविर जिबूती की सरकार और संयुक्त राष्ट्र द्वारा संयुक्त रूप से संचालित किया जा रहा है। यमन से नौकाओं के जरिए लाल सागर के संकरे बाब अल-मंदाब जलडमरूमध्य को पार करने के बाद ये शरणार्थी ट्रकों और पैदल रास्तों से इस केंद्र तक पहुंचे हैं। एक मछुआरे होने के नाते इस्सा के पास अपनी खुद की इतनी बड़ी नौका मौजूद थी जिसमें वे अपने परिवार के सभी सदस्यों को सुरक्षित ला सके। वे अपने साथ कुछ बकरियों को भी ले आए, जो शिविर में खाली पड़े रसोई गैस सिलेंडरों और प्लास्टिक की बोतलों के बीच चारे की तलाश करती नजर आती हैं।
शिविर में पहुंचे कई शरणार्थियों की स्थिति बेहद दर्दनाक है। जहां कुछ परिवार अपने साथ मामूली घरेलू सामान या हुक्का जैसी धातु की पारंपरिक चीजें लाने में सफल रहे, वहीं कई लोग केवल उन्हीं कपड़ों में पहुंचे हैं जो वे घर छोड़ते समय पहने हुए थे। इस्सा ने बताया कि जब लड़ाकू विमानों की भयानक आवाजें शुरू होती थीं, तो बच्चे डर के मारे चीखने और कांपने लगते थे। उन्होंने कहा कि माता-पिता के तौर पर बच्चों की ऐसी हालत देखकर कोई कैसे शांत बैठ सकता है, इसलिए उन्होंने अपने बच्चों की जान बचाने के लिए देश छोड़ने का फैसला किया।
1,20,000 से अधिक लोग विस्थापित, तटीय मोर्चे पर हमलों की झड़ी
संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार, यमन के लाल सागर तट पर अचानक तेज हुई जंग के चलते अब तक 1,20,000 से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं। अकेले पिछले कुछ ही दिनों में 3,000 से ज्यादा शरणार्थी यमन से जिबूती पहुंचे हैं, जिनमें अधिकांश पूरे के पूरे परिवार शामिल हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमन की सरकार के समर्थन में सऊदी अरब ने तटीय मैदानी इलाकों में सैकड़ों हवाई हमले किए हैं, जहां हूती विद्रोही अपनी स्थिति मजबूत कर रहे हैं। इसके जवाब में हूती विद्रोहियों ने भी दक्षिण-पश्चिमी सऊदी अरब के शहरों और बुनियादी ढांचों को निशाना बनाते हुए सैकड़ों ड्रोन और मिसाइलें दागी हैं।
युद्ध के इस चक्रव्यूह में फंसे आम लोगों के लिए दोनों पक्षों की राजनीति बेमानी हो चुकी है। शिविर में अरबी भाषा में अपनी बात रखते हुए विस्थापित लोगों ने स्पष्ट किया कि उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि हमला कौन सा पक्ष कर रहा है। चारों तरफ लगातार गिरते बमों और बारूदी धमाकों के खौफ ने उन्हें अपनी पैतृक जमीन छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया है।
एक सदी जी चुके कासिम की व्यथा और सैन्यीकृत जिबूती का रुख
मरकजी शिविर में रह रहे लोगों में कासिम अब्राहम अब्सी भी शामिल हैं, जिनके पहचान पत्र के अनुसार उनकी उम्र 100 वर्ष हो चुकी है। पूर्व में मछुआरे रहे अब्सी ने अपने तजुर्बे साझा करते हुए कहा कि विमानों के कानफोड़ू धमाकों ने ही उन्हें अपने बच्चों की खातिर वहां से भागने पर विवश किया। उन्होंने बताया कि हूती लड़ाके पहाड़ों और सड़कों पर मौजूद हैं और आने वाले विमान हर जगह बमबारी कर रहे हैं, जिससे यह समझ पाना भी नामुमकिन हो जाता है कि कौन सा विमान किस तरफ से हमला कर रहा है।
यमन के ठीक सामने पानी के दूसरी तरफ स्थित जिबूती एक छोटा पूर्व फ्रांसीसी उपनिवेश है। जिबूती प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि हूती विद्रोहियों और सऊदी समर्थित यमन सरकार के बीच चल रही इस जंग में उसका शामिल होने का कोई इरादा नहीं है। हालांकि रणनीतिक रूप से यह छोटा सा मुल्क अफ्रीका के सबसे अधिक सैन्यीकृत देशों में गिना जाता है। वर्ष 2003 से अमेरिका यहां अपना विशाल बहुराष्ट्रीय सैन्य अड्डा कैंप लेमोनियर संचालित कर रहा है, जो पूर्व में फ्रेंच फॉरेन लीजन का ठिकाना हुआ करता था। इसके अलावा हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराते हुए चीन का भी यहां एक बड़ा नौसैनिक सैन्य अड्डा मौजूद है, जिसे हाल के दिनों में उन्नत किया गया है।
2015 से शिविर में जिंदगी बिता रहे मोहम्मद की आपबीती
संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (यूएनएचसीआर) द्वारा कतारों में लगाए गए तंबुओं के बाहर 37 डिग्री सेल्सियस की चिलचिलाती धूप में अदन के रहने वाले 63 वर्षीय मोहम्मद अब्दुल्लारिम अपने दिन काट रहे हैं। कभी टूर गाइड के रूप में काम कर चुके अब्दुल्लारिम का जन्म उस दौर में हुआ था जब अदन पर ब्रिटिश हुकूमत का नियंत्रण था। नए विस्थापितों के उलट, मोहम्मद वर्ष 2015 से ही इस शिविर में रह रहे हैं, जब हूती विद्रोहियों और पूर्व राष्ट्रपति अब्दरब्बुह मंसूर हादी की सरकार के बीच पहली बार भीषण लड़ाई भड़की थी।
अपने मुल्क की बर्बादी और वहां के हालात पर बात करते हुए मोहम्मद अपने आंसुओं को रोक नहीं पाए। उन्होंने कहा कि तंबुओं के भीतर रहने वाले ज्यादातर शरणार्थी बेहद दयनीय स्थितियों में जीवन यापन कर रहे हैं और वे अपने देशवासियों की पीड़ा देखकर गहरे सदमे में हैं। उन्होंने अपील की कि गैर-सरकारी संगठनों और जिबूती की सरकार तक उनकी आवाज पहुंचे, साथ ही शरण देने के लिए उन्होंने जिबूती प्रशासन के प्रति आभार भी व्यक्त किया।
2022 का संघर्ष विराम टूटा, मानवीय तबाही का स्थायी दर्द
यमन 2014 से ही एक विनाशकारी गृहयुद्ध से जूझ रहा है, जिसमें अब तक दसियों हजार लोग मारे जा चुके हैं और लाखों लोग बेघर हुए हैं। सऊदी अरब और हूतियों के बीच 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से हुआ नाजुक युद्धविराम हाल के महीनों में पूरी तरह टूट गया है, जिसके बाद से दोनों तरफ से मिसाइलों, ड्रोनों और हवाई हमलों का सिलसिला तेज हो गया है। वैश्विक समुदाय के लिए यमन का युद्ध दूर की एक घटना लग सकता है और बाब अल-मंदाब जलडमरूमध्य के जरिए सऊदी अरब के तेल निर्यात में पैदा होने वाली रुकावटें अक्सर सुर्खियों में रहती हैं, लेकिन इस संकट की भारी मानवीय कीमत की ओर दुनिया का ध्यान कम ही जाता है।
शिविर में अपनी पत्नी के पास बैठे बुजुर्ग कासिम अब्सी ने कहा कि जब तक उनके वतन में जंग जारी रहेगी, वे वापस नहीं लौटेंगे क्योंकि जिबूती में कम से कम उन्हें शांति नसीब हो रही है। उनकी पत्नी आयशा अब्दुलकादिर मोहम्मद ने भी उनकी बात का समर्थन करते हुए कहा कि यदि देश में शांति लौटती है तो वे तुरंत वापस जाने को तैयार हैं। उन्होंने कहा कि उनके बच्चों के भविष्य के लिए सबसे पहली जरूरत सुरक्षा है, जिसके बाद ही भोजन, पानी और शिक्षा की बात आती है। आयशा ने कहा कि वे अपने सारे साजो-सामान पीछे छोड़कर सिर्फ पहने हुए कपड़ों में भागकर आई हैं क्योंकि उनके मुल्क में अब शांति का कोई नामोनिशान नहीं बचा है।



















