अमेरिका की मध्यस्थता में रोम में दो दिन तक चली बैठकों के बाद इजरायल और लेबनान साउथ लेबनान में तथाकथित 'पायलट जोन' लागू करने की दिशा में एक ठोस कदम की तरफ बढ़ते दिख रहे हैं। इन जोन के लागू होते ही इजराइली सेना वहां से हट जाएगी और इलाके का नियंत्रण लेबनानी आर्मी को सौंप दिया जाएगा। अमेरिकी विदेश विभाग ने बताया कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत सकारात्मक रही और वे पायलट जोन प्रक्रिया के पूरे ढांचे तथा दिशा-निर्देशों पर सहमत हो गए हैं, जिन्हें आने वाले दिनों में अंतिम रूप देकर जमीन पर उतारा जाएगा। हालांकि रोम बातचीत के नतीजों पर इजरायल या लेबनान की सरकार की तरफ से अभी कोई औपचारिक बयान सामने नहीं आया है। दोनों सरकारों के लिए एक लिखित ढांचा और साफ दिशा-निर्देश तय करना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि रोम में हुई इस हफ्ते की बैठकों से पहले जमीन पर इन जोन को बनाने का काम कुछ समय से अटका हुआ था।
पहले कैसे भड़की थी इजरायल-हिज्बुल्लाह की जंग?
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए पीछे जाना जरूरी है। इजरायल और लेबनान के चरमपंथी संगठन हिज्बुल्लाह के बीच हालिया जंग की शुरुआत तब हुई जब हिज्बुल्लाह ने इजरायल पर रॉकेट दागे। यह हमला 28 फरवरी को इजरायल और अमेरिका की तरफ से ईरान पर की गई कार्रवाई के कुछ ही दिनों बाद हुआ था। इसके जवाब में इजरायल ने हिज्बुल्लाह पर पलटवार किया और फिर लेबनान की सीमा में घुसकर दक्षिणी लेबनान के एक बड़े हिस्से पर कब्जा जमा लिया। इस गोलीबारी ने इजरायल और ईरान के बीच पहले से चल रहे बड़े टकराव में एक और मोर्चा जोड़ दिया, क्योंकि यह 28 फरवरी को ईरानी ठिकानों पर हुए हमलों के ठीक बाद हुआ, और इससे लेबनान-इजरायल सीमा एक बार फिर क्षेत्रीय तनाव के केंद्र में आ गई। हिज्बुल्लाह शुरू से ही लेबनान और इजरायल के बीच सीधी बातचीत के सख्त खिलाफ रहा है, लेकिन उसके विरोध का कोई असर बातचीत की प्रक्रिया पर नहीं पड़ा।
जून में बना फ्रेमवर्क समझौता, अब पायलट जोन पर सहमति
26 जून को लेबनान और इजरायल ने एक 'फ्रेमवर्क समझौते' का ऐलान किया था। इस समझौते के तहत तय हुआ कि ईरान समर्थित हिज्बुल्लाह अपने हथियार छोड़ेगा और उसके बदले साउथ लेबनान से इजराइली सेना को पूरी तरह हटा लिया जाएगा। इस पूरी योजना की शुरुआत दो पायलट जोन बनाने से होनी है। इन जोन में इजराइली फौज लेबनानी आर्मी को कब्जे वाला इलाका सौंप देगी, जिसके बाद लेबनानी सेना उस क्षेत्र से हिज्बुल्लाह की मौजूदगी पूरी तरह खत्म करने का जिम्मा उठाएगी। व्यवहारिक तौर पर इसका मतलब यह होगा कि इन जोन में मौजूद इजराइली टुकड़ियां पहले पीछे हटेंगी, और उसके बाद लेबनानी सेना की टुकड़ियां वहां पहुंचकर उस इलाके की सुरक्षा संभालेंगी, जो जंग के बाद से अब तक इजराइली सैन्य नियंत्रण में रहा है। हालांकि इस हफ्ते रोम में हुई बातचीत से पहले ही जमीनी स्तर पर इस योजना को लागू करने का काम ठप पड़ गया था, जिसे अब दोबारा पटरी पर लाने की कोशिश हो रही है।
दो पायलट जोन कहां बनेंगे, तस्वीर अभी साफ नहीं
लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ आउन आगामी 21 जुलाई को अमेरिका जाने वाले हैं। रोम में बातचीत शुरू होने से पहले उन्होंने एक बयान में कहा था कि लेबनानी प्रतिनिधिमंडल को साफ निर्देश दिए गए हैं कि वह किसी भी आगे की चर्चा में बढ़ने से पहले दोनों पायलट जोन से इजराइली सेना की तत्काल वापसी की मांग रखे। हालांकि अभी तक आधिकारिक रूप से यह नहीं बताया गया कि दक्षिणी लेबनान में ये दो पायलट जोन ठीक कहां बनाए जाएंगे। इससे पहले इजरायल और लेबनान के अधिकारियों ने संकेत दिया था कि इनमें घंदौरियेह, जवतार और फ्रौन जैसे शहर शामिल हो सकते हैं।
जोन के आकार और सीमा को लेकर फंसा पेच
जोन के निर्धारण को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच मतभेद सामने आए। दरअसल शुरुआत में जिन ज्यादातर इलाकों को पायलट जोन के लिए चुना गया था, वहां इजराइली सैनिक मौजूद ही नहीं थे। इससे यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि जब सैनिक वहां तैनात ही नहीं हैं तो वापसी किस बात की मानी जाएगी। लेबनानी सेना का मानना रहा है कि पायलट जोन का दायरा बड़ा होना चाहिए और उसमें इजराइली सेना के असल कब्जे वाले ज्यादा इलाकों को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि वापसी सचमुच मायने रखे।
हिज्बुल्लाह अड़ा हथियार न छोड़ने पर, इजरायल भी पीछे हटने को तैयार नहीं
अमेरिकी विदेश विभाग ने कहा है कि पायलट जोन लागू होने के बाद अगला कदम आगे की तकनीकी बातचीत शुरू करना होगा, जिसका मकसद इजरायल और लेबनान के बीच पूर्ण समझौता कराना है। लेकिन हिज्बुल्लाह ने साफ कर दिया है कि वह इस समझौते को नहीं मानेगा और उसका हथियार डालने का कोई इरादा नहीं है। वहीं दूसरी तरफ इजराइली अधिकारियों ने भी सार्वजनिक रूप से यह कहा है कि वे साउथ लेबनान में लंबे समय तक अपनी मौजूदगी बनाए रखने की योजना बना रहे हैं। यानी जमीन पर हालात अब भी उतने आसान नहीं जितने कागजों पर दिख रहे हैं।
ट्रंप का इशारा, असली फोकस ईरान पर होना चाहिए
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले भी कई बार अपनी राय जाहिर कर चुके हैं कि इजरायल को लेबनान और दक्षिणी सीरिया से अपनी सेना हटाकर उसे कहीं और तैनात करना चाहिए। ट्रंप ने इजरायल को यह भी सलाह दी थी कि उसे अपनी ताकत और ऊर्जा बड़ी चुनौतियों पर लगानी चाहिए, और उनके मुताबिक सबसे बड़ी चुनौती ईरान है, न कि लेबनान।
लेबनान में सीरियाई सेना उतारने की ट्रंप की योजना
हाल ही में हुए नाटो समिट और उससे पहले जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान ट्रंप की सीरिया के राष्ट्रपति अहमद अल-शरा से मुलाकात हुई थी। इस मुलाकात में ट्रंप ने एक बार फिर वही प्रस्ताव दोहराया कि हिज्बुल्लाह से निपटने के लिए लेबनान में सीरियाई फौज भेजी जाए। ट्रंप ने यहां तक कह दिया था कि इस काम में अल-शरा, इजरायल के मुकाबले कहीं बेहतर तरीके से काम करेंगे। इससे साफ है कि अमेरिका इस पूरे मसले को सिर्फ इजरायल-लेबनान तक सीमित न रखकर, क्षेत्रीय समीकरणों के जरिए सुलझाने की कोशिश में है।
कुल मिलाकर तस्वीर क्या बनती है?
कुल मिलाकर तस्वीर यह बनती है कि रोम में कूटनीतिक स्तर पर बातचीत आगे बढ़ रही है, लेकिन जमीन पर असली मतभेद अब भी बरकरार हैं, चाहे वह दोनों पायलट जोन की सही जगह को लेकर हो, हिज्बुल्लाह के हथियार छोड़ने को लेकर हो, या फिर इजराइली सेना के साउथ लेबनान में कितने समय तक टिके रहने को लेकर हो। वहीं अमेरिका का रुख सिर्फ इजरायल और लेबनान तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि वह इस पूरे मसले को ईरान और सीरिया के साथ अपने बड़े समीकरणों से भी जोड़कर देख रहा है।





















