घरेलू स्तर पर छोटे उद्यम शुरू कर आत्मनिर्भर बनने की दिशा में अमेठी की महिलाएं नई मिसाल पेश कर रही हैं। अपनी आजीविका को संवारने के लिए बाहर जाने के बजाय घर की चारदीवारी के भीतर से ही ऐसे काम शुरू किए जा रहे हैं, जिनकी मांग मौसम के उतार-चढ़ाव से बेअसर रहती है। गर्मी, सर्दी या बरसात, हर ऋतु में निरंतर चलने वाले इन पारंपरिक व्यवसायों ने ग्रामीण परिवारों को नियमित वित्तीय सुरक्षा दी है।
पूजा-पाठ की जरूरत बनी मुनाफे का आधार, तैयार हो रही हवन सामग्री
धार्मिक आयोजनों, मंदिरों और घरों में नित्य पूजा के कारण हवन सामग्री की मांग साल के बारहों महीने बनी रहती है। इसी निरंतर खपत को देखते हुए इसे घर पर तैयार करने का काम एक लाभदायक उद्यम साबित हो रहा है। इस मिश्रण को तैयार करने के लिए चंदन की छाल, लवंग, लोहबान, सुगंधा और आम की पिसी लकड़ी समेत कुल 30 से 31 तरह की छोटी-बड़ी कच्ची सामग्रियों की आवश्यकता पड़ती है।
इन सभी सामग्रियों का उपयोग करके केवल दो से तीन दिनों के भीतर लगभग 50 से 60 किलोग्राम हवन सामग्री सरलता से बनाई जा सकती है। इस पूरे निर्माण कार्य में कुल खर्च मात्र दो से तीन हजार रुपये के आसपास बैठता है। बाजार में यह तैयार उत्पाद 30 से 50 रुपये प्रति किलोग्राम की दर पर आसानी से बिक जाता है, जिससे उत्पादक को 25 से 30 हजार रुपये तक की आमदनी हासिल करने में मदद मिलती है।
कम पूंजी में मोमबत्ती और अगरबत्ती निर्माण की राह
हवन सामग्री के अतिरिक्त अगरबत्ती और मोमबत्ती बनाने का काम भी बेहद सुगम और कम लागत वाला विकल्प बनकर उभरा है। मोमबत्ती के निर्माण के लिए बाजार से कच्चा मोम लाया जाता है और उसे उचित सांचों में पिघलाकर आवश्यक आकार में ढाला जाता है। इस काम को शुरू करने में महज एक से दो हजार रुपये का कच्चा माल लगता है। इस मामूली निवेश के सहारे कारीगर 15 से 20 हजार रुपये तक की कमाई अपने घर बैठे जुटा लेते हैं।
समूहों के सहारे दूर हुई उधारी, मिली आर्थिक आजादी
इस कारोबार और स्वयं सहायता समूह से जुड़ी नीता राव का कहना है कि इस कार्यप्रणाली ने उनके जीवन में बड़ा सकारात्मक बदलाव ला दिया है। समूह का हिस्सा बनने से पहले उन्हें कई प्रकार की आर्थिक परेशानियों से जूझना पड़ता था और जरूरी खर्चों के लिए दूसरों के आगे हाथ फैलाकर कर्ज लेना पड़ता था। अब स्थिति बदल चुकी है और महिलाएं अपने स्वयं के समूह के माध्यम से घर पर अपनी सुविधानुसार काम कर पा रही हैं। वे स्थानीय ग्राहकों की सीधी मांग के मुताबिक उत्पाद तैयार करती हैं और बिक्री से होने वाले मुनाफे से अपना जीवन स्तर सुधार रही हैं।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से मिल रहा तकनीकी कौशल
महिलाओं के इस स्वावलंबन को मजबूती देने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) की ओर से समय-समय पर मार्गदर्शन और तकनीकी सहयोग दिया जा रहा है। विभागीय अधिकारी प्रकाश जायसवाल के अनुसार, महिलाओं को उनके इलाके की मांग और व्यावसायिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए निशुल्क प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। इस प्रशिक्षण के बल पर महिलाएं न केवल पूरी तरह आत्मनिर्भर बन रही हैं, बल्कि अपने घरेलू व्यापार को अधिक व्यवस्थित और पेशेवर ढंग से संचालित कर पा रही हैं।



















