ग्रामीण क्षेत्रों में कम लागत में स्वावलंबन की राह तलाश रहे लोगों के लिए पारंपरिक उत्पादों का निर्माण एक बेहतरीन जरिया बनकर उभर रहा है। उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले में स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं ने देसी तरीके से हवन सामग्री बनाने का काम शुरू कर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है। यह काम पूरी तरह घर से संचालित होता है और इसके लिए किसी भारी-भरकम मशीनरी या बड़े कारखाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। गांव में सुलभ गाय के गोबर और सामान्य बाजार में मिलने वाली जड़ी-बूटियों के मेल से यह सामग्री तैयार की जाती है। धार्मिक आयोजनों में वर्ष भर मांग रहने और नवरात्र जैसे बड़े त्योहारों पर खपत में भारी उछाल आने के कारण यह घरेलू उपक्रम महिलाओं की नियमित आजीविका का ठोस आधार बन चुका है।
गोबर और 31 प्राकृतिक तत्वों के मेल से तैयार होता है मिश्रण
इस कुटीर उद्योग से जुड़ी लक्ष्मी देवी ने अपनी छोटी-छोटी व्यक्तिगत बचतों को जोड़कर इस काम की नींव रखी थी। स्वयं सहायता समूह के सहयोग से आवश्यक कच्चा माल जुटाकर उन्होंने अपने घर पर ही उत्पादन का काम शुरू किया। लक्ष्मी देवी के अनुसार, उच्च गुणवत्ता वाली पारंपरिक हवन सामग्री तैयार करने के लिए कुल 31 तरह की अलग-अलग सामग्रियों का संतुलित मिश्रण बनाया जाता है। इसमें गाय के गोबर के अलावा लोहबान, सुगंधा, साबुत लौंग, सौंफ और विभिन्न प्रकार की औषधीय जड़ी-बूटियां प्रमुख रूप से शामिल की जाती हैं।
निर्माण प्रक्रिया की शुरुआत में गाय के गोबर को धूप में अच्छी तरह सुखाया जाता है। गोबर के पूरी तरह सूख जाने के बाद उसे बारीक कर बाकी 30 प्राकृतिक सामग्रियों के साथ निर्धारित अनुपात में मिलाया जाता है। पूरी प्रक्रिया को पूरा होने और सामग्री को उपयोग के लिए तैयार करने में लगभग दो से तीन दिन का समय लगता है। लक्ष्मी देवी बताती हैं कि समूह से जुड़ने से पहले उन्हें आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता था और रोजमर्रा के खर्चों के लिए दूसरों का मुंह देखना पड़ता था। अब इस काम से न केवल उनके हाथ में अपनी स्वतंत्र कमाई आने लगी है, बल्कि समाज में उन्हें एक स्वतंत्र पहचान और सम्मान भी मिला है।
11 महिलाओं का साझा प्रयास और हुनर का विस्तार
समूह की एक अन्य सदस्य पिंकी बताती हैं कि वर्तमान में कुल 11 महिलाएं मिलकर इस उत्पादन इकाई को संचालित कर रही हैं। पूर्व में किसी भी आकस्मिक जरूरत या पारिवारिक खर्च के लिए उन्हें बाहरी साहूकारों या अन्य लोगों पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन अब समूह के माध्यम से ही वे आपस में वित्तीय लेनदेन आसानी से निपटा लेती हैं। इस व्यवसाय को पेशेवर ढंग से शुरू करने से पहले इन महिलाओं को चार दिन का विशेष प्रशिक्षण दिया गया था, जिसमें सामग्री के सही अनुपात और पैकेजिंग की बारीकियां सिखाई गईं।
पिंकी के मुताबिक, हवन सामग्री के सफल उत्पादन के बाद अब यह समूह आगे अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार करने की तैयारी में है। महिलाएं जल्द ही झाड़ू बनाने का हुनर भी सीखने जा रही हैं, क्योंकि ग्रामीण और शहरी दोनों ही बाजारों में झाड़ू की दैनिक मांग और बिक्री बहुत अधिक रहती है। इस प्रकार एक उत्पाद से दूसरे उपयोगी उत्पाद की ओर कदम बढ़ाकर समूह अपनी आय को और सुदृढ़ करने की दिशा में बढ़ रहा है।
4 से 5 हजार रुपये की शुरुआती पूंजी और कमाई का गणित
इस कारोबार की सबसे बड़ी विशेषता इसका बेहद कम पूंजी में शुरू हो जाना है। ग्रामीण परिवेश में मुख्य कच्चा माल यानी गाय का गोबर बिना किसी लागत के आसानी से उपलब्ध हो जाता है। शेष जरूरी जड़ी-बूटियां, सुगंधित द्रव्य और पैकिंग सामग्री जुटाने के लिए मात्र 4 से 5 हजार रुपये का शुरुआती खर्च आता है। इन सभी सामग्रियों को विधिपूर्वक मिलाकर आकर्षक पैकेटों में बंद कर दिया जाता है और फिर स्थानीय हाट-बाजारों तथा नजदीकी दुकानों में आपूर्ति की जाती है।
उत्पादन क्षमता की बात करें तो व्यवस्थित ढंग से काम करने पर प्रतिदिन लगभग 50 से 60 किलोग्राम हवन सामग्री तैयार की जा सकती है। थोक और खुदरा स्तर पर यह सामग्री स्थानीय बाजार में 30 से 50 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिकती है। यदि उत्पादन और बिक्री नियमित रहे, तो इस व्यवसाय से प्रतिमाह 25 से 30 हजार रुपये तक की शुद्ध कमाई संभव है। हालांकि, वास्तविक आय बाजार में होने वाले उठाव, उत्पादन की निरंतरता और त्योहारी मांग के स्तर पर भी निर्भर करती है।
एनआरएलएम और संस्थागत मदद से आगे की राह
व्यावसायिक मामलों के जानकार प्रकाश जायसवाल के अनुसार, ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए स्वयं सहायता समूहों, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन यानी एनआरएलएम और संबंधित संस्थानों की ओर से समय-समय पर व्यावहारिक कौशल प्रशिक्षण दिया जाता है। इस प्रशिक्षण का मूल उद्देश्य महिलाओं को उत्पादन तकनीकों, गुणवत्ता नियंत्रण और विपणन की पूरी जानकारी मुहैया कराना है ताकि वे बिना किसी अड़चन के अपना काम जमा सकें।
प्रकाश जायसवाल ने यह भी स्पष्ट किया कि समूह से जुड़कर उद्यम शुरू करने वाली महिलाओं के लिए सरकारी योजनाओं के तहत अनुदान और वित्तीय सहायता की भी सुचारु व्यवस्था है। इस आर्थिक सहायता को प्राप्त करने की प्रक्रिया भी बेहद सरल है। इसके लिए लाभार्थी महिलाओं को अपना आधार कार्ड, पैन कार्ड, बैंक पासबुक की प्रति, पासपोर्ट साइज फोटो और संबंधित स्वयं सहायता समूह का संस्तुति पत्र प्रस्तुत करना होता है। इन दस्तावेजों के सत्यापन के बाद आवश्यकता अनुसार कार्यशील पूंजी और अनुदान स्वीकृत कर दिया जाता है, जिससे महिलाएं अपने काम को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ा सकती हैं।


















