असम के मानस नेशनल पार्क एवं टाइगर रिजर्व में काम करने वाले दो पारंपरिक हाथी महावतों ने वैश्विक संरक्षण पटल पर एक बड़ी उपलब्धि अपने नाम की है। लंबे समय से बंदी हाथियों और उनके बच्चों की देखभाल में जुटे रामानुज बरला और मोहम्मद आलम अली को आधिकारिक तौर पर 'मास्टर महावत' के रूप में अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्रदान की गई है। इस खास उपलब्धि के बाद अब दोनों महावत विदेशी धरती पर जाकर अन्य देशों के हाथी देखरेख करने वालों के साथ अपने पारंपरिक और वैज्ञानिक कौशल को साझा करेंगे।
ऑस्ट्रेलियाई संस्था से मिला विशेष प्रमाणन और बैज
रामानुज बरला और मोहम्मद आलम अली ने कैप्टिव-बॉर्न यानी मानव देखरेख में जन्मे हाथी के बच्चों को संभालने से जुड़ा एक कड़ा और विशिष्ट प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया। यह प्रशिक्षण एनिमल कॉग्निशन यानी वन्यजीव की समझ और पॉजिटिव रीइन्फोर्समेंट तकनीकों पर केंद्रित था। इसे ऑस्ट्रेलिया स्थित ह्यूमन एलिफेंट लर्निंग प्रोग्राम्स, एडवांसिंग एलिफेंट वेलफेयर फाउंडेशन यानी H-ELP फाउंडेशन के तहत संचालित किया गया था। इस कार्यक्रम के पूरा होने पर दोनों कर्मियों को आधिकारिक बैज और सर्टिफिकेट प्रदान किए गए हैं।
थाईलैंड के संरक्षण केंद्र में देंगे ट्रेनिंग
बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल यानी BTC के वन विभाग की काउंसिल हेड ऑफ डिपार्टमेंट और एडिशनल प्रिंसिपल चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स सोनाली घोष ने इस उपलब्धि की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि रामानुज बरला और मोहम्मद आलम अली आगामी 29 अक्टूबर से 2 नवंबर तक थाईलैंड स्थित चियांग माई एलिफेंट कंजर्वेशन सेंटर में आयोजित होने वाले एक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लेने जाएंगे। वहां वे अन्य अंतरराष्ट्रीय हाथी केयरटेकर्स को हाथियों के बेहतर प्रबंधन और मानवीय व्यवहार से जुड़े व्यावहारिक गुर सिखाएंगे।
असम वन विभाग और महावत समुदाय के लिए गर्व का पल
सोनाली घोष, जो मानस टाइगर रिजर्व की फील्ड डायरेक्टर भी हैं, ने कहा कि दोनों महावतों को मिला यह अंतरराष्ट्रीय सम्मान असम वन विभाग, समूचे टाइगर रिजर्व और वन्यजीव संरक्षण में अग्रिम मोर्चे पर डटे महावतों व खासियों के पूरे समुदाय के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बरला और अली का वर्षों का मैदानी व जमीनी अनुभव वैश्विक स्तर पर हाथियों के संरक्षण, उनकी सुरक्षा और गरिमापूर्ण प्रबंधन के प्रयासों में बेहद मददगार साबित होगा। बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल के वन एवं वन्यजीव मामलों के एग्जीक्यूटिव मेंबर जेम्स बसुमतारी ने भी दोनों महावतों की इस उपलब्धि को पूरे असम और राज्य वन विभाग के लिए गौरवपूर्ण क्षण बताया।
बांसबाड़ी में संपन्न हुआ सात दिवसीय व्यापक प्रशिक्षण शिविर
इस अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि की आधिकारिक घोषणा मानस टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टरेट द्वारा वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया অর্থাৎ WTI के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय सघन कार्यशाला के समापन अवसर पर की गई। यह प्रशिक्षण शिविर 24 सितंबर को मानस के बांसबाड़ी रेंज में आरंभ हुआ था और बुधवार को सफलतापूर्वक समाप्त हुआ। सोनाली घोष के अनुसार, बंदी हाथियों की वैज्ञानिक देखभाल और व्यवहार को लेकर मानस के इतिहास में आयोजित अपनी तरह की यह पहली व्यापक पहल थी।
इस सघन कार्यशाला का संचालन पद्मश्री से सम्मानित पारबती बरुआ, सेवानिवृत्त डिविजनल कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स भूपेंद्र नाथ तालुकदार और वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी भास्कर चौधरी ने किया। शिविर के दौरान बंदी हाथियों के स्वास्थ्य, प्राथमिक चिकित्सा, उनके सुरक्षित प्रबंधन, सकारात्मक प्रशिक्षण और भोजन व्यवस्था से जुड़े सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक दोनों पहलुओं पर बारीकी से काम किया गया। इस पूरे सत्र में कुल 27 वन्यकर्मियों ने भाग लिया, जिनमें मानस टाइगर रिजर्व के कर्मचारियों के साथ-साथ ओडिशा राज्य से आए 3 प्रतिभागी भी शामिल थे।
विश्वास और विज्ञान पर टिकी है हाथियों की सुरक्षा
वन विभाग ने वन्यजीवों की सुरक्षा में महावतों और खासियों के अद्वितीय योगदान को रेखांकित किया। अधिकारियों ने इस बात पर जोर दिया कि विशालकाय हाथियों को सुरक्षित और जिम्मेदारी के साथ संभालने के लिए निरंतर व्यावहारिक प्रशिक्षण और संवेदनशीलता अनिवार्य है। फील्ड डायरेक्टर के अनुसार, प्रभावी हाथी प्रबंधन के लिए सिर्फ पारंपरिक ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए आधुनिक वैज्ञानिक समझ, निरंतर सार्थक संवाद और देखरेख करने वाले तथा हाथी के बीच आपसी विश्वास का मजबूत रिश्ता होना जरूरी है।
जैव विविधता का अनूठा केंद्र है मानस टाइगर रिजर्व
पूर्वी हिमालय की तलहटी में भूटान सीमा से सटा मानस अपनी अनुपम जैव विविधता के लिए पूरे विश्व में विख्यात है। वर्ष 1973 में पूर्वोत्तर भारत के पहले टाइगर रिजर्व के तौर पर स्थापित इस संरक्षित क्षेत्र को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल, बायोस्फीयर रिजर्व, एलीफेंट रिजर्व, महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र और प्रमुख जैव विविधता क्षेत्र का दर्जा प्राप्त है। यह राष्ट्रीय उद्यान बाघ, जंगली हाथी, एक सींग वाले गैंडे, जंगली भैंसों, दुर्लभ गोल्डन लंगूर, पिग्मी हॉग, हिस्पिड हेयर और बंगाल फ्लोरिकन जैसी अति-संवेदनशील प्रजातियों का सुरक्षित प्राकृतिक वास है। इसके साथ ही यह अभयारण्य पक्षियों की 550 से अधिक प्रजातियों को भी जीवन प्रदान करता है।
























