भारत में डिजिटल लेनदेन की व्यवस्था एक बड़े बदलाव की दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है, जहां पेमेंट इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए नए वित्तीय नियमों पर विचार किया जा रहा है। केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में टैक्सेशन एंड अदर लॉ (संशोधित) बिल, 2026 पेश किए जाने के बाद डिजिटल भुगतानों पर लगने वाले शुल्क को लेकर चर्चा तेज हो गई है। सरकार इस नए विधेयक के माध्यम से यह स्पष्ट करने जा रही है कि किस प्रकार के डिजिटल लेनदेन को भविष्य में भी पूरी तरह मुफ्त रखा जाएगा और किन श्रेणियों पर सेवा शुल्क या लेवी लगाई जाएगी। इस नीतिगत बदलाव का मुख्य केंद्र बिंदु यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस यानी यूपीआई के माध्यम से होने वाले 2,000 रुपये से अधिक के बड़े भुगतान हैं। हालांकि, 2,000 रुपये से ऊपर के लेनदेन पर शुल्क की तैयारी तो पक्की मानी जा रही है, लेकिन मुख्य सवाल यह बना हुआ है कि इस लागत का वित्तीय बोझ आखिर कौन उठाएगा।
संसद में पेश विधेयक और आरबीआई का रुख
भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के बाद बुधवार को मीडिया को संबोधित करते हुए आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने डिजिटल भुगतान प्रणाली से जुड़े वित्तीय पहलुओं पर स्थिति स्पष्ट की। जब उनसे पूछा गया कि क्या 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर लगने वाला चार्ज सीधे आम उपभोक्ताओं से वसूला जाएगा, तो उन्होंने कहा कि इस लागत के बंटवारे पर अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। प्रेस वार्ता के दौरान आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा, "यह कहना अभी जल्दबाजी होगा कि यूपीआई से भुगतान पर लगने वाले चार्ज को कौन वहन करेगा।"
डिजिटल नेटवर्क के मौजूदा ढांचे को समझाते हुए आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि उपभोक्ता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पहले से ही कई माध्यमों के जरिए पेमेंट इन्फ्रास्ट्रक्चर के संचालन में योगदान दे रहे हैं, भले ही वह राशि अलग से ट्रांजेक्शन फीस के रूप में नजर न आती हो। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि इस लागत को या तो सरकार सब्सिडी के जरिए खुद वहन कर सकती है, या फिर बड़े डिजिटल लेनदेन स्वीकार करने वाले कारोबारियों पर इसका खर्च डाला जा सकता है। गवर्नर ने स्पष्ट किया कि केंद्रीय बैंक की मुख्य प्राथमिकता देश के पेमेंट इन्फ्रास्ट्रक्चर को सुरक्षित, टिकाऊ और मजबूत बनाना है, जिसके लिए फंडिंग का स्थाई मॉडल खोजना आवश्यक है।
2,000 रुपये की सीमा और मुफ्त लेनदेन की गारंटी
टैक्सेशन एंड अदर लॉ (संशोधित) बिल, 2026 की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें छोटे और दैनिक भुगतानों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। प्रस्तावित विधेयक में यह साफ तौर पर प्रावधान किया गया है कि 2,000 रुपये या उससे कम मूल्य के सभी यूपीआई भुगतान पूरी तरह निशुल्क रहेंगे और उन पर कोई चार्ज नहीं लगाया जाएगा। सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, देश भर में यूपीआई के माध्यम से होने वाले कुल भुगतान मूल्य में से लगभग 65 फीसदी हिस्सेदारी 2,000 रुपये से कम वाले भुगतानों की है।
वहीं अगर लेनदेन की संख्या के आधार पर देखा जाए, तो सरकारी अनुमानों के मुताबिक लगभग 95 फीसदी यूपीआई ट्रांजेक्शन 2,000 रुपये की इस सीमा से नीचे आते हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि आम नागरिकों द्वारा अपनी दैनिक जरूरतों, राशन, किराना सामान और रोजमर्रा की सेवाओं के लिए किए जाने वाले छोटे डिजिटल भुगतान इस नए नियम से पूरी तरह बाहर रहेंगे। इससे देश में डिजिटल लेनदेन के प्रति आम जनता की सुविधा और भरोसे पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ेगा।
प्रस्तावित शुल्क दरें और मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR)
2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेनदेन के लिए सरकार ने विधेयक में 0.25 प्रतिशत से लेकर 0.40 प्रतिशत तक लेवी लगाने का प्रस्ताव रखा है। यह शुल्क ढांचा मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर की तर्ज पर तैयार किया जा रहा है, जो वर्तमान में क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने पर व्यापारियों से बैंकों द्वारा वसूला जाता है। हालांकि क्रेडिट कार्ड के विपरीत, यूपीआई भुगतान के मामले में यह अभी तय नहीं किया गया है कि 2,000 रुपये से अधिक के ट्रांजेक्शन पर लगने वाला शुल्क मर्चेंट देगा या ग्राहक।
इसके अलावा, नीति निर्माता कारोबारियों के सालाना टर्नओवर से जुड़ी एक अन्य शुल्क व्यवस्था पर भी विचार कर रहे हैं। इस वैकल्पिक प्रस्ताव के तहत जिन व्यापारियों या संस्थानों का सालाना टर्नओवर 1.5 करोड़ रुपये से अधिक है, उनसे 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर 0.3 प्रतिशत से लेकर 0.5 प्रतिशत तक लेवी ली जा सकती है। इस प्रकार टर्नओवर से शुल्क को जोड़कर सरकार की मंशा यह है कि छोटे दुकानदारों और सूक्ष्म उद्यमों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव न पड़े, जबकि बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठान डिजिटल नेटवर्क की लागत में अपना योगदान दे सकें।
डिजिटल भुगतान के आंकड़े और इन्फ्रास्ट्रक्चर की फंडिंग
भारत में यूपीआई नेटवर्क का दायरा अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच चुका है, जिसके संचालन के लिए लगातार सर्वर क्षमता, साइबर सुरक्षा और बैंकिंग कनेक्टिविटी बढ़ाने की आवश्यकता होती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, केवल जुलाई महीने में ही यूपीआई के माध्यम से 23.7 अरब लेनदेन दर्ज किए गए, जिनका कुल मूल्य 29.9 लाख करोड़ रुपये था। इतने विशाल स्तर पर बिना किसी बाधा के लेनदेन संपन्न कराने के लिए मजबूत और निर्बाध डिजिटल बुनियादी ढांचे की जरूरत होती है।
जैसे-जैसे डिजिटल ट्रांजेक्शन का दायरा बढ़ रहा है, वित्तीय अधिकारियों का मानना है कि सभी स्तरों पर शून्य-शुल्क मॉडल बनाए रखना बैंकों और पेमेंट सेवा प्रदाताओं के लिए लंबे समय तक व्यावहारिक नहीं हो सकता। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा लाए गए इस विधेयक और आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा के बयानों से संकेत मिलता है कि सरकार बड़े भुगतानों के लिए एक व्यवस्थित फंडिंग व्यवस्था बनाना चाहती है। 95 फीसदी छोटे भुगतानों को मुफ्त रखते हुए बड़े ट्रांजेक्शन से मिलने वाले राजस्व का उपयोग देश के पेमेंट इन्फ्रास्ट्रक्चर को अधिक सुरक्षित और आधुनिक बनाने में किया जाएगा।



















