जीवन में आने वाली रुकावटें अक्सर किसी बड़े मकसद की शुरुआत साबित होती हैं. जब इंसान अपने तय किए रास्ते पर आगे बढ़ने से रोक दिया जाता है, तब वह दूसरों के लिए नया रास्ता तैयार करने का साहस जुटा सकता है. राजस्थान के करौली जिले के रहने वाले भल्लू सिंह गुर्जर का सफरनामा इसी जज्बे को बयां करता है. बचपन से देश की हिफाजत के लिए सैन्य वर्दी पहनने का ख्वाब देखने वाले भल्लू सिंह जब खुद सेना का हिस्सा नहीं बन सके, तो उन्होंने क्षेत्र के अन्य युवाओं के सपनों को हकीकत में बदलने का बीड़ा उठा लिया.
एनसीसी में उत्कृष्ट प्रदर्शन और सीनियर अंडर ऑफिसर का मुकाम
भल्लू सिंह के भीतर बचपन से ही भारतीय सेना में शामिल होकर सरहद पर देश की सेवा करने की तीव्र इच्छा थी. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से कदम बढ़ाए और वर्ष 2014 में एनसीसी में प्रवेश लिया. उन्होंने दिन-रात पसीना बहाया और अपनी अनुशासित कार्यशैली के दम पर एनसीसी में सीनियर अंडर ऑफिसर का प्रतिष्ठित ओहदा प्राप्त किया. इसके साथ ही उन्होंने कड़े परीक्षणों को पास करते हुए एनसीसी का महत्वपूर्ण सी सर्टिफिकेट भी अपने नाम किया, जिससे भर्ती प्रक्रिया में अतिरिक्त मदद मिल सके.
तीन भर्तियों में शारीरिक दक्षता पास, लेकिन कलर विजन बना बाधा
वर्ष 2015 से भल्लू सिंह ने भारतीय सेना की खुली भर्तियों में ताल ठोकना शुरू किया. शारीरिक रूप से बेहद मजबूत होने के कारण उन्होंने लगातार तीन अलग-अलग सेना भर्तियों में हिस्सा लिया और हर बार फिजिकल टेस्ट को शानदार तरीके से पास किया. दौड़, बाधा दौड़ और अन्य शारीरिक मापदंडों में वे अव्वल रहे. हालांकि, असली रुकावट मेडिकल जांच के दौरान सामने आई, जहां डॉक्टरों ने उनकी आंखों में कलर विजन की समस्या की पहचान की.
सेना की चिकित्सा प्रक्रिया बेहद सख्त और व्यवस्थित होती है, जिसमें दृष्टि की गहन जांच के तहत कलर विजन टेस्ट अनिवार्य रूप से लिया जाता है. इस टेस्ट में उम्मीदवार को विभिन्न रंगों के जटिल मिश्रण के बीच छिपी आकृतियों और संख्याओं की पहचान करनी होती है. रंगों के इस भेद को स्पष्ट न पहचान पाने की वजह से भल्लू सिंह तीनों ही प्रयासों में मेडिकल बोर्ड द्वारा अनफिट घोषित कर दिए गए. एनसीसी सी सर्टिफिकेट और बेहतरीन शारीरिक दक्षता के बावजूद वे मेडिकल बाधा पार नहीं कर पाए. धीरे-धीरे भर्ती के लिए निर्धारित अधिकतम आयु सीमा समाप्त हो गई और उनका खुद फौजी बनने का सपना अधूरा रह गया.
निराशा को बनाया ताकत, कोरोना काल से पहले रखी एकेडमी की नींव
उम्र निकल जाने के बाद किसी भी युवा का हौसला टूट सकता था, मगर भल्लू सिंह ने अपनी इस विफलता को जीवन का विराम नहीं बनने दिया. उन्होंने तय किया कि जिस तरह की परेशानियों और मार्गदर्शन की कमी से उन्हें गुजरना पड़ा, उनके इलाके का कोई दूसरा होनहार नौजवान उस दर्द से न जूझे. इसी संकल्प के साथ उन्होंने करौली में चेतन डिफेंस एकेडमी की शुरुआत की. यह संस्थान कोरोना महामारी का दौर शुरू होने से पहले स्थापित किया गया था.
चेतन डिफेंस एकेडमी में उन्होंने ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों से आने वाले अभ्यर्थियों को सेना भर्ती की बहुआयामी तैयारियों से जोड़ना शुरू किया. यहां युवाओं को केवल मैदान पर दौड़ने तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि फिजिकल टेस्ट के साथ-साथ लिखित परीक्षा के पाठ्यक्रम पर भी गंभीरता से काम कराया जाने लगा. सुबह-शाम के सख्त शारीरिक अभ्यास के साथ कक्षा में पढ़ाई का ऐसा माहौल बनाया गया जिससे अभ्यर्थी हर स्तर पर तैयार हो सकें.
सैकड़ों युवाओं को दिलाई वर्दी, सफलता का मंत्र बताया
करीब छह साल पहले शुरू किए गए इस प्रयास ने शानदार परिणाम दिए हैं. भल्लू सिंह के अनुसार, उनकी एकेडमी से प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले 100 से अधिक युवा सेना में चयनित होकर देश सेवा के लिए जा चुके हैं, जबकि कुल मिलाकर पिछले 6 वर्षों में यहां से प्रशिक्षित 200 से ज्यादा अभ्यर्थी भारतीय सेना में अपनी जगह पक्की कर चुके हैं. उनके लिए यह संख्या केवल एक आंकड़ा भर नहीं, बल्कि अपने अधूरे सपने की मुकम्मल जीत है.
सेना भर्ती की आकांक्षा रखने वाले नए अभ्यर्थियों को भल्लू सिंह स्पष्ट सलाह देते हैं कि इस राह में सफलता का कोई शॉर्टकट मौजूद नहीं है. उनके मुताबिक नियमित अभ्यास, कड़ा अनुशासन और अटूट मेहनत ही सफलता की कुंजी है. युवाओं को हर रोज शारीरिक व्यायाम और दौड़ के साथ-साथ लिखित परीक्षा के अध्ययन पर भी समान समय देना चाहिए, क्योंकि आधुनिक भर्ती प्रणाली में दोनों का संतुलन ही वर्दी तक पहुंचा सकता है.



















