पश्चिम एशिया के समुद्री रास्तों पर मंडराते सैन्य संकट ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि दुनिया भर में ऊर्जा आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और आर्थिक विकास की रफ्तार को सीधे प्रभावित कर रहा है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य जैसे दुनिया के सबसे अहम समुद्री गलियारे में जहाजों की आवाजाही बाधित होने से कच्चे तेल की कीमतों में अचानक जोरदार तेजी दर्ज की गई है। इस उथल-पुथल ने विभिन्न देशों में माल ढुलाई के खर्च, उत्पादन लागत और खुदरा महंगाई पर नया दबाव बना दिया है। दुनिया भर के अर्थशास्त्री इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं, और हालांकि वे अभी किसी पूर्णकालिक आर्थिक मंदी की तत्काल आशंका नहीं देख रहे हैं, फिर भी महंगे तेल के कारण पैदा होने वाली महंगाई एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। कुछ विशेषज्ञों को उम्मीद है कि वर्ष 2027 तक युद्ध के इन वैश्विक समीकरणों में स्थिरता आ सकती है, लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, महंगे तेल के झटके से निपटना सभी के लिए टेढ़ी खीर बना हुआ है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य बना वैश्विक आपूर्ति संकट का केंद्र बिंदु
इस पूरे ऊर्जा संकट की जड़ में हॉर्मुज जलडमरूमध्य की रणनीतिक स्थिति है। मौजूदा संघर्ष के गहराने से पहले इस बेहद संकरे जलमार्ग से प्रतिदिन लगभग 20.9 मिलियन बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम तरल पदार्थ गुजरते थे। यह विशाल मात्रा पूरी दुनिया में दैनिक पेट्रोलियम खपत के लगभग पांचवें हिस्से के बराबर बैठती है। इतना ही नहीं, इस जलडमरूमध्य से गुजरने वाले कच्चे तेल और कंडेनसेट का करीब 89 प्रतिशत हिस्सा एशियाई बाजारों की तरफ भेजा जाता था। इसी वजह से चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे भारी ऊर्जा खपत वाले देश इस समुद्री मार्ग पर किसी भी रुकावट से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में शामिल हैं। समुद्री परिवहन के हालिया आंकड़े बताते हैं कि संकट किस कदर गहरा चुका है। जहां इस साल फरवरी में संघर्ष तेज होने से पहले रोजाना औसतन लगभग 125 बड़े व्यापारिक जहाज इस जलमार्ग से सुरक्षित गुजरते थे, वहीं 21 सितंबर को केवल 2 कमोडिटी जहाज ही हॉर्मुज जलडमरूमध्य को पार कर पाए। इसके पिछले दिन यानी 20 सितंबर को भी केवल 10 जहाजों ने ही यह रास्ता तय किया था। जहाजों की यह अचानक थमी रफ्तार सीधे तौर पर ऊर्जा व्यापार की कमर तोड़ रही है।
वैकल्पिक पाइपलाइनों की सीमित क्षमता और लॉजिस्टिक्स की अड़चनें
जब किसी प्रमुख समुद्री रास्ते पर जहाजों का आना-जाना रुकता है, तो बाजार दूसरे रास्तों की तलाश करते हैं, लेकिन हॉर्मुज के मामले में कोई भी विकल्प इसकी भरपाई करने में सक्षम नहीं है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के पास कुछ ऐसी पाइपलाइनें जरूर हैं जो जलडमरूमध्य के एक हिस्से को बाईपास कर सकती हैं, लेकिन इन दोनों देशों की कुल पाइपलाइन क्षमता उस विशाल मात्रा की तुलना में बहुत कम है जो सामान्य दिनों में जहाजों के जरिए हॉर्मुज से होकर निकलती थी। नतीजतन, तेल के बैरलों को गंतव्य तक पहुंचाना बेहद खर्चीला और जोखिम भरा हो गया है। जहाजों को होने वाली देरी, बढ़े हुए समुद्री बीमा प्रीमियम और माल ढुलाई के महंगे किरायों ने मिलकर ऊर्जा आपूर्ति की पूरी श्रृंखला को हिला दिया है। यही कारण है कि यह संकट अब केवल क्षेत्रीय भू-राजनीति तक सीमित न रहकर एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक और वित्तीय संकट में तब्दील हो चुका है, जहां चालू खाता घाटा, विनिमय दरें और बॉन्ड यील्ड सीधे तौर पर तेल की उपलब्धता से जुड़ गए हैं।
भारत के आयात बिल पर बड़ा झटका और आर्थिक वृद्धि का गणित
एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में भारत महंगे कच्चे तेल के जोखिम के सामने सबसे आगे खड़ा है, क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करता है। कुछ पैमानों पर भारत की आयात निर्भरता 88 प्रतिशत से भी ऊपर आंकी जाती है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से अगस्त 2026 के पांच महीनों के दौरान भारत का कच्चा तेल आयात बिल सालाना आधार पर 48.4 प्रतिशत की भारी छलांग लगाकर 74.8 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया। इस अवधि में गौर करने वाली बात यह रही कि आयात की मात्रा में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया; देश ने 100.7 मिलियन मीट्रिक टन तेल आयात किया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले केवल 0.4 प्रतिशत कम था। इसका सीधा मतलब यह है कि आयात बिल में आया यह करीब 75 अरब डॉलर का उछाल पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की ऊंची कीमतों की देन है।
इन वित्तीय दबावों के बावजूद, देश की आर्थिक बुनियाद को लेकर रेटिंग एजेंसियों का भरोसा बना हुआ है। एसएंडपी, फिच और मूडीज जैसी प्रमुख वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने वित्त वर्ष 2027 के लिए भारत की जीडीपी विकास दर के अनुमानों में बढ़ोतरी की है। इन आकलनों के अनुसार, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र अगले वित्त वर्ष में भी दुनिया की सबसे तेज रफ्तार से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा। हालांकि, अर्थव्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अगर महंगे तेल के कारण खुदरा मुद्रास्फीति लगातार बढ़ती रही, तो भारतीय रिजर्व बैंक को अपनी रेपो दर में बढ़ोतरी का कदम उठाना पड़ सकता है। जब केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को बढ़ाता है, तो कर्ज महंगे हो जाते हैं, जिसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति और मांग पर पड़ता है। फिलहाल देश में त्योहारी सीजन की शुरुआत हो चुकी है, जिससे कारोबारी गतिविधियों और खपत में तेजी आने की पूरी उम्मीद है, भले ही अल नीनो के प्रभाव के चलते मानसूनी बारिश में कमी दर्ज की गई हो।
डीजल की महंगाई और भारतीय उद्योगों के सामने संतुलन की चुनौती
कच्चा तेल केवल वाहनों के ईंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ट्रांसपोर्ट, मैन्युफैक्चरिंग, विमानन, रसायन, प्लास्टिक और कई उपभोक्ता उद्योगों के लिए एक बुनियादी कच्चा माल है। जब ईंधन के भाव चढ़ते हैं, तो उनकी यह तेजी पूरी आपूर्ति श्रृंखला में फैल जाती है और अंततः रोजमर्रा के सामानों व सेवाओं की कीमतों को बढ़ा देती है। भारत के संदर्भ में डीजल की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश का अधिकांश सड़क माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क डीजल से चलने वाले ट्रकों पर ही निर्भर करता है। यदि डीजल की कीमतों में लंबे समय तक तेजी बनी रहती है, तो इससे अनाज, सब्जियां, औद्योगिक कलपुर्जे और अन्य उपभोक्ता उत्पादों को एक शहर से दूसरे शहर ले जाने की लागत बढ़ जाती है। ऐसी परिस्थिति में सरकार और तेल विपणन कंपनियों के सामने एक जटिल दुविधा खड़ी हो जाती है। उन्हें एक तरफ आम जनता को ईंधन के भारी झटके से बचाना होता है, तो दूसरी तरफ अपने राजकोषीय घाटे और तेल कंपनियों की वित्तीय सेहत को भी नियंत्रण में रखना पड़ता है।
चीन, जापान और दक्षिण कोरिया पर ऊर्जा झटके की मार
भारत के अलावा अन्य प्रमुख एशियाई देश भी हॉर्मुज के इस संकट से सीधे जूझ रहे हैं। चीन दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है और उसकी कुल कच्चा तेल आपूर्ति का एक-तिहाई से अधिक हिस्सा आमतौर पर इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। यह सही है कि चीन के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का एक बड़ा कुशन है और उसके पास कई अन्य देशों से तेल की आपूर्ति के विकल्प भी मौजूद हैं, जिससे उसे शुरुआती झटके सहने में मदद मिलती है। फिर भी, चीन का एक विशाल विनिर्माण आधार है, और ऊर्जा व परिवहन लागत में होने वाली कोई भी वृद्धि उसके औद्योगिक उत्पादन, वैश्विक निर्यात और घरेलू उपभोक्ता कीमतों पर नकारात्मक असर डालती है।
दूसरी ओर, जापान लगभग पूरी तरह से आयातित ऊर्जा पर टिका हुआ देश है। प्राकृतिक संसाधनों की कमी के कारण अंतरराष्ट्रीय तेल और गैस की कीमतों में आने वाले किसी भी तेज उछाल से बचने के लिए जापान के पास बहुत कम सुरक्षा कवच हैं। ईंधन की बढ़ी हुई कीमतें जापानी परिवारों के घरेलू बजट को बिगाड़ रही हैं और वहां की एयरलाइनों, ट्रांसपोर्ट ऑपरेटरों और विनिर्माण कारखानों की लागत में तेज इजाफा कर रही हैं। ठीक ऐसी ही गंभीर स्थिति दक्षिण कोरिया के सामने भी है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी आयात पर निर्भर है। चूंकि हॉर्मुज से निकलने वाला तेल मुख्य रूप से एशिया की ओर बहता है, इसलिए इस पूरे क्षेत्र को आपूर्ति संकट का सबसे तेज और सीधा नुकसान उठाना पड़ रहा है।
यूरोपीय विनिर्माण क्षेत्र और अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ता असर
इस ऊर्जा झटके का असर केवल एशिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यूरोपीय देश भी ऊर्जा की बढ़ती कीमतों से हलकान हैं। जर्मनी, जो यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, एक भारी ऊर्जा खपत वाले औद्योगिक आधार पर निर्भर करता है। तेल और गैस के बढ़े हुए दाम वहां के कारखानों और ट्रांसपोर्ट कंपनियों की उत्पादन लागत को काफी बढ़ा रहे हैं। ब्रिटेन भी पेट्रोल, डीजल, माल ढुलाई और घरेलू बिजली-गैस के बढ़े हुए बिलों के चलते ऐसे ही आर्थिक दबाव का सामना कर रहा है। यूरोपीय कारोबारियों के लिए संकट सिर्फ कच्चे तेल तक सीमित नहीं है; शिपिंग रास्तों के बाधित होने से जहाजों को लंबे चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, जिससे माल ढुलाई का भाड़ा बढ़ गया है और सामान की डिलीवरी में अत्यधिक समय लग रहा है। इसने पहले से ही उलझी हुई वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को और अधिक तनाव में डाल दिया है।
दूसरी तरफ, संयुक्त राज्य अमेरिका कच्चे तेल के लिए मध्य पूर्व पर एशियाई देशों जितना निर्भर नहीं है, क्योंकि अमेरिका खुद दुनिया के सबसे बड़े तेल और गैस उत्पादकों में गिना जाता है। वर्ष 2025 की पहली छमाही के आंकड़ों के अनुसार, हॉर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए फारस की खाड़ी के देशों से अमेरिका को होने वाला कच्चा तेल और कंडेनसेट आयात औसतन लगभग 0.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन था, जो उसके कुल कच्चे तेल और कंडेनसेट आयात का मात्र 7 प्रतिशत बैठता है। इसके बावजूद, वैश्विक तेल बाजार पूरी तरह आपस में जुड़े होने के कारण अमेरिकी उपभोक्ता भी अंतरराष्ट्रीय कीमतों के उतार-चढ़ाव से अछूते नहीं रह सकते। 21 सितंबर को अमेरिका में नियमित गैसोलीन की राष्ट्रीय औसत खुदरा कीमत लगभग 4.47 से 4.48 डॉलर प्रति गैलन दर्ज की गई। ईंधन के इस ऊंचे स्तर ने अमेरिकी परिवारों के आवागमन खर्च को बढ़ा दिया है और व्यापारिक प्रतिष्ठानों की परिचालन लागत में इजाफा कर दिया है।
मुद्रास्फीति बनाम विकास: वैश्विक अर्थव्यवस्था का आगे का रास्ता
अमेरिका, यूरोप और एशिया में इस संकट के पहुंचने के रास्ते भले ही अलग-अलग हों, लेकिन सभी अर्थव्यवस्थाओं के लिए साझा दबाव बिंदु एक ही है, और वह है ऊर्जा की बेतहाशा लागत। वर्तमान में पूरी दुनिया की आर्थिक नीतियां विकास को बचाए रखने और बेलगाम होती महंगाई को थामने के बीच एक बेहद नाजुक संतुलन साधने की कोशिश कर रही हैं। फिलहाल मुख्यधारा के अर्थशास्त्रियों का यह मानना नहीं है कि पूरी दुनिया तुरंत गहरी मंदी की चपेट में आ जाएगी, लेकिन यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊपरी स्तरों पर टिकी रहीं, तो केंद्रीय बैंकों को दरों में कटौती के बजाय सख्त मौद्रिक नीतियां अपनाने पर मजबूर होना पड़ेगा। आने वाले समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा काफी हद तक इस बात पर तय होगी कि अमेरिका और ईरान का यह सैन्य टकराव कितने लंबे समय तक खिंचता है और क्या हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों का सामान्य आवागमन आने वाले महीनों में दोबारा बहाल हो पाता है या नहीं।



















