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फ्री ट्रायल के नाम पर बैंक खाते से लग रही चपत, लोकेश आहूजा ने उजागर किया ऑटोपे मैंडेट का खेलमनी
30 जुल॰ 2026, 12:28 am (2 घंटे पहले)· 0

फ्री ट्रायल के नाम पर बैंक खाते से लग रही चपत, लोकेश आहूजा ने उजागर किया ऑटोपे मैंडेट का खेल

फ्री ट्रायल का लालच देकर ऑटोपे मैंडेट एक्टिव करवाने के चलते यूपीआई यूजर्स के बैंक खातों से चुपके से पैसे कट रहे हैं। नायका के एवीपी लोकेश आहूजा ने अपनी मां के फोन का उदाहरण देकर इस डिजिटल खतरे से सावधान किया है।

डिजिटल पेमेंट सेवाओं ने जहां एक तरफ देश में लेनदेन की प्रक्रिया को बेहद आसान और तेज बना दिया है, वहीं दूसरी तरफ इसके साथ वित्तीय सुरक्षा से जुड़ा एक नया जोखिम भी तेजी से उभर रहा है। फ्री ट्रायल के लुभावने ऑफर्स की आड़ में आम यूजर्स से यूपीआई ऑटोपे मैंडेट स्वीकृत करवा लिए जाते हैं और इसके बाद हर महीने चुपके से उनके बैंक खातों से छोटी-छोटी रकमें कटनी शुरू हो जाती हैं। हाल ही में इस पूरे डिजिटल खेल की हकीकत उस वक्त सामने आई, जब नायका में असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट (ब्रांड मैनेजमेंट) के पद पर तैनात और आईआईएम मुंबई के ग्रेजुएट लोकेश आहूजा ने अपनी मां के स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हुए उनके खाते में सक्रिय कई ऑटोपे मैंडेट्स को पकड़ा। लोकेश आहूजा ने कुछ समय पहले ही अपनी मां को डिजिटल भुगतान करने के लिए यूपीआई ऐप चलाना सिखाया था ताकि वे अपनी दैनिक जरूरतों के लिए आसानी से ऑनलाइन भुगतान कर सकें। हालांकि, जब उन्होंने अपनी मां के फोन की जांच की, तो वे यह देखकर हैरान रह गए कि उसमें करीब आधा दर्जन ऑटोपे मैंडेट पहले से ही एक्टिव थे, जिनकी जानकारी खुद उनकी मां को भी नहीं थी।

फ्री ट्रायल के दांव में कैसे फंसते हैं आम डिजिटल यूजर्स?

जब लोकेश आहूजा ने अपनी मां से इन ऑटोपे सेवाओं के बारे में पूछा, तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि उन्होंने किसी भी पेड सर्विस या ऐप का कोई सब्सक्रिप्शन नहीं लिया है। इसके बाद जब आहूजा ने फोन में चल रहे मैंडेट की गहराई से पड़ताल की, तो पता चला कि ये सभी ऑटोपे मैंडेट अलग-अलग ऐप्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स द्वारा दिए जाने वाले फ्री ट्रायल ऑफर्स से जुड़े हुए थे। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लिंक्डइन पर अपना यह अनुभव साझा करते हुए बताया कि कई ऑनलाइन कंपनियां शुरुआत में 'पहले 30 दिनों के लिए ₹0' का आकर्षक ऑफर पेश करती हैं। हालांकि, इस फ्री ट्रायल को शुरू करने की शर्त के रूप में कंपनियां यूजर से हर महीने बैंक खाते से ऑटोमैटिकली पैसे काटने की अनुमति यानी ऑटोपे मैंडेट हासिल कर लेती हैं। जब 30 दिनों की फ्री अवधि पूरी हो जाती है, तो यूजर को बिना कोई नया अलर्ट या रिमाइंडर भेजे उनके खाते से हर महीने तय रकम काटनी शुरू कर दी जाती है।

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₹79 की छोटी रकम और बैंक स्टेटमेंट की अनदेखी

इस पूरे सिस्टम की सबसे चिंताजनक बात यह है कि महीने दर महीने होने वाली ये छोटी कटौतियां आम लोगों की नजरों में आसानी से नहीं आतीं। लोकेश आहूजा के अनुसार, ₹79 या इसी तरह की अन्य छोटी रकमें बैंक अकाउंट के मासिक स्टेटमेंट में दर्जनों अन्य यूपीआई लेन-देनों के बीच पूरी तरह से दब जाती हैं। आम तौर पर लोग दिन भर में चाय, सब्जी या छोटी खरीदारी के लिए कई बार यूपीआई का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में जब ₹79 की कटौती चुपचाप यूपीआई ट्रांजेक्शन की लिस्ट में शामिल होती है, तो अधिकतर यूजर्स का ध्यान इस पर नहीं जाता। नतीजा यह होता है कि लोगों की जेब से महीनों तक लगातार पैसे निकलते रहते हैं और उन्हें इस बात का जरा भी अहसास नहीं होता कि वे बिना इस्तेमाल की जाने वाली सेवाओं के लिए भुगतान कर रहे हैं।

कंपनियों की रणनीति: फ्री ट्रायल नहीं, ऑटोपे मैंडेट है असली प्रॉडक्ट

लोकेश आहूजा ने इस डिजिटल व्यापार मॉडल का विश्लेषण करते हुए बताया कि फ्री ट्रायल असल में एक आकर्षक विज्ञापन से ज्यादा कुछ नहीं है। कंपनियों का मुख्य उद्देश्य यूजर को पहला महीना मुफ्त में सेवा देना नहीं होता, बल्कि उनका असली मकसद यूजर से ऑटोपे मैंडेट बनवाना होता है। उन्होंने साफ कहा कि फ्री ट्रायल के पीछे छिपा यही मैंडेट असली प्रॉडक्ट है। कंपनियां अच्छी तरह जानती हैं कि एक बार ऑटोपे एक्टिव हो जाने के बाद ज्यादातर यूजर्स उसे कैंसल करना भूल जाते हैं। इस तरह फ्री ट्रायल का लालच देकर कंपनियां ग्राहकों को लंबे समय तक अपने पेड सब्सक्रिप्शन नेटवर्क से बांधने में कामयाब हो जाती हैं।

बदलती जिम्मेदारियां और इंटरनेट सुरक्षा का नया दौर

अपनी बात को समाप्त करते हुए लोकेश आहूजा ने डिजिटल दौर में पीढ़ीगत बदलाव पर एक विचारणीय टिप्पणी भी की। उन्होंने लिखा कि यह काफी अजीब स्थिति है कि अतीत में हमारे माता-पिता हमें सड़क पार करते समय सुरक्षित रहने के लिए चिंतित रहते थे, लेकिन आज के समय में स्थिति बिल्कुल उलट चुकी है। अब हम अपने माता-पिता के इंटरनेट इस्तेमाल करने और डिजिटल दुनिया में सुरक्षित रहने को लेकर चिंतित रहते हैं। यह घटना इस बात की ओर इशारा करती है कि डिजिटल साक्षरता के इस दौर में केवल यूपीआई चलाना सीख लेना ही काफी नहीं है, बल्कि ऑटोपे जैसी छिपी हुई सुविधाओं के प्रति सतर्क रहना भी उतना ही आवश्यक है।

सवाल-जवाब

लोकेश आहूजा कौन हैं और उन्होंने ऑटोपे मैंडेट पर क्या जानकारी दी?
लोकेश आहूजा नायका में असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट (ब्रांड मैनेजमेंट) हैं और आईआईएम मुंबई के ग्रेजुएट हैं। उन्होंने लिंक्डइन पर बताया कि अपनी मां के फोन में उन्होंने आधा दर्जन से ज्यादा अनजान ऑटोपे मैंडेट एक्टिव पाए।
फ्री ट्रायल ऑफर्स के जरिए ऑटोपे मैंडेट कैसे चालू हो जाता है?
कंपनियां 30 दिनों का फ्री ट्रायल देते समय यूजर से हर महीने बैंक खाते से पैसे काटने की परमिशन ले लेती हैं। ट्रायल खत्म होने पर बिना किसी नोटिफिकेशन के तय रकम हर महीने कटने लगती है।
₹79 जैसी छोटी कटौतियों पर लोग ध्यान क्यों नहीं दे पाते?
रोजाना होने वाले दर्जनों यूपीआई ट्रांजेक्शन के बीच ₹79 की छोटी कटौती छिप जाती है, जिससे यूजर को महीनों तक पता ही नहीं चलता कि उनके खाते से पैसे कट रहे हैं।
लोकेश आहूजा के अनुसार फ्री ट्रायल में कंपनियों का असली मकसद क्या होता है?
आहूजा के अनुसार फ्री ट्रायल केवल एक लालच है, जबकि कंपनियों का असली मकसद यूजर से स्थायी ऑटोपे मैंडेट हासिल करना होता है।
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