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ग्लोबल साउथ क्या है और ब्रिक्स देशों के लिए इसकी मांगें क्यों हैं इतनी अहम?दुनिया
13 सित॰ 2026, 7:42 am (1 घंटे पहले)· 1

ग्लोबल साउथ क्या है और ब्रिक्स देशों के लिए इसकी मांगें क्यों हैं इतनी अहम?

नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स समिट के बीच ग्लोबल साउथ की परिभाषा, इसकी बढ़ती आर्थिक ताकत और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सुधार की मांगें फिर से चर्चा में आ गई हैं।

दुनिया भर के दिग्गज नेता नई दिल्ली में चल रही ब्रिक्स समिट में शिरकत करने के लिए भारत की राजधानी पहुंच चुके हैं। इस वर्ष भारत इस महत्वपूर्ण समूह की अध्यक्षता संभाल रहा है, जिसके चलते वैश्विक निर्णय लेने की प्रणालियों में विकासशील राष्ट्रों की आवाज को बुलंद करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। नई दिल्ली घोषणापत्र के माध्यम से वैश्विक संस्थानों में उभरती अर्थव्यवस्थाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया है, साथ ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और वैश्विक वित्तीय ढांचे में व्यापक सुधार की पुरजोर वकालत की गई है। इस बीच पिछले कुछ समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ग्लोबल साउथ शब्द चर्चा का मुख्य केंद्र बना हुआ है। आइए गहराई से यह जानते हैं कि ग्लोबल साउथ असल में किसे कहा जाता है और वर्तमान समय में इसकी इतनी अधिक प्रासंगिकता क्यों बनी हुई है।

ग्लोबल साउथ का वास्तविक अर्थ

ग्लोबल साउथ एक ऐसा आर्थिक और राजनीतिक संदर्भ है जिसका उपयोग मुख्य रूप से एशिया, अफ्रीका, लातूर अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्र के विकासशील तथा तेजी से उभरते हुए देशों के लिए किया जाता है। हालांकि यह किसी भूगोलीय नक्शे की सख्त सीमा में बंधा हुआ दायरा नहीं है, क्योंकि इसमें शामिल कई देश उत्तरी गोलार्ध में भी स्थित हो सकते हैं। इस शब्दावली का मूल उद्देश्य देशों के मध्य मौजूद संपत्ति, ऐतिहासिक अनुभवों, आर्थिक विकास के स्तर और वैश्विक संस्थाओं में उनके प्रभाव के अंतर को रेखांकित करना है, न कि केवल उनकी भौगोलिक स्थिति को दर्शाना।

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यह भी गौर करने योग्य है कि इस समूह में आने वाले सभी देशों की राजनीतिक व्यवस्थाएं, विदेश नीतियां या आर्थिक हित एक जैसे नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर भारत, चीन, ब्राजील, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, सऊदी अरब और मिस्र जैसी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की प्राथमिकताएं एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं। इसके बावजूद इनमें से कई राष्ट्रों को जो चीज एक मंच पर लाती है, वह वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय प्रशासन की दिशा तय करने वाले फैसलों पर अपनी मजबूत पकड़ बनाने की साझा इच्छा है।

ग्लोबल साउथ की बढ़ती प्रासंगिकता के कारण

हाल के वर्षों में विकासशील देशों की आर्थिक क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है। संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास यानी UNCTAD के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2023 में ग्लोबल साउथ की हिस्सेदारी वैश्विक जीडीपी में 42 प्रतिशत, वस्तुओं के कुल निर्यात में 44 प्रतिशत और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी FDI के आगमन में 65 प्रतिशत तक रही है। इन आंकड़ों से साफ है कि इन देशों का आर्थिक कद तेजी से बढ़ा है, लेकिन इस बढ़ी हुई ताकत का समुचित प्रतिनिधित्व उन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में नहीं झलकता जिनका गठन बहुत पुराने दौर की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया गया था।

ग्लोबल साउथ द्वारा लगातार की जा रही सुधार की मांग के पीछे मुख्य तर्क यह है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का स्वरूप तो पूरी तरह बदल चुका है, लेकिन उसे संचालित करने वाले संगठन और नियम उसी रफ़्तार से खुद को नहीं ढाल पाए हैं। यही वजह है कि यह मांग केवल कूटनीतिक बैठकों में कुछ अधिक सीटें हासिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि विकासशील देश अब वैश्विक नियमों और नीतियों के निर्धारण में भी अपनी सक्रिय और निर्णायक भूमिका सुनिश्चित करना चाहते हैं।

ब्रिक्स मंच और ग्लोबल साउथ का जुड़ाव

ब्रिक्स एक ऐसा प्रभावशाली मंच साबित हो रहा है जिसके माध्यम से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं एकजुट होकर वैश्विक स्तर पर अपना प्रभाव बढ़ा सकती हैं। अपने शुरुआती दौर में ब्राजील, रूस, भारत और चीन जैसे देशों से मिलकर बने इस समूह में बाद में दक्षिण अफ्रीका को भी शामिल कर लिया गया, जिससे इसकी ताकत और बढ़ गई। वर्तमान में इस संगठन में कुल 11 सदस्य देश शामिल हैं, जिसके कारण इसका भौगोलिक और आर्थिक दायरा काफी विस्तृत हो चुका है। रॉयटर्स के अनुसार यह समूह दुनिया की 40 प्रतिशत से अधिक आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लगभग एक-चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है।

इसकी उपयोगिता का एक प्रमुख कारण यह है कि यह ऐसे राष्ट्रों को एक साथ लाता है जिनकी भू-राजनीति को लेकर अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन मौजूदा अंतरराष्ट्रीय आर्थिक तथा राजनीतिक व्यवस्था को लेकर उनकी चिंताएं काफी हद तक समान हैं। इसी वजह से ब्रिक्स का उद्देश्य केवल एक अलग कूटनीतिक गुट तैयार करना नहीं है, बल्कि उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के लिए सामूहिक मोल-भाव की शक्ति को मजबूत करना है।

ग्लोबल साउथ के देशों के मुख्य लक्ष्य और प्राथमिकताएं

नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान कई ऐसे अहम मुद्दे खुलकर सामने आए जिनका प्रभाव दुनिया के तमाम देशों पर पड़ता है। ग्लोबल साउथ के राष्ट्रों की प्राथमिकताओं में कुछ बिंदु सबसे ऊपर हैं। अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग करते हुए ब्रिक्स ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF और विश्व बैंक में बड़े सुधारों पर जोर दिया है। इस दौरान चीन और रूस ने संयुक्त राष्ट्र प्रणाली में भारत और ब्राजील की स्थायी भूमिका का समर्थन भी किया है।

वैश्विक व्यापार में मजबूत आवाज उठाने की बात पर जोर देते हुए नई दिल्ली घोषणापत्र में एकतरफा टैरिफ, संरक्षणवादी नीतियों और आर्थिक दबाव डालने वाले कदमों की कड़ी आलोचना की गई है। इसके पीछे मुख्य विचार यह है कि बड़ी महाशक्तियों के फैसलों का अनावश्यक आर्थिक बोझ विकासशील देशों की जनता और अर्थव्यवस्थाओं पर नहीं पड़ना चाहिए। इसके अतिरिक्त वित्तीय विकल्पों को विस्तार देने की दिशा में ब्रिक्स किसी एक साझी मुद्रा को जल्दबाजी में अपनाने के बजाय स्थानीय मुद्राओं में आपसी व्यापार, पेमेंट सिस्टम की इंटरऑपरएबिलिटी, सीमा पार भुगतान और न्यू डेवलपमेंट बैंक को अधिक सुदृढ़ बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।

इस समिट के दौरान भारत ने डिजिटल पेमेंट सिस्टम को आपस में जोड़ने और सेंट्रल बैंक की डिजिटल करेंसी के बीच आपसी तालमेल की संभावनाओं पर काम करने का प्रस्ताव भी रखा। इसके अलावा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, क्वांटम टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर और अन्य उन्नत तकनीकों तक पहुंच को ब्रिक्स के मुख्य एजेंडे में शामिल किया गया है। भारत ने अपनी अध्यक्षता का पूरा उपयोग करते हुए टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में आपसी सहयोग को ग्लोबल साउथ के हितों के इर्द-गिर्द केंद्रित किया है।

वैश्विक मंच पर भारत की अहम भूमिका

ब्रिक्स सम्मेलन में भारत का दृष्टिकोण बेहद खास रहा है क्योंकि नई दिल्ली ने ग्लोबल साउथ के एजेंडे को किसी मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर नया ढांचा खड़ा करने के प्रयास के रूप में पेश करने के बजाय पुरानी संस्थाओं में सुधार करने और आवश्यकतानुसार नए पूरक तंत्र विकसित करने के रूप में रखा है। भारत की अध्यक्षता के दौरान इन सैद्धांतिक विचारों को जमीन पर उतारने के लिए कई व्यावहारिक पहल भी की गई हैं।

इन ठोस पहलों में ब्रिक्स MSME पोर्टल और स्टार्टअप इनोवेशन फंड की स्थापना से लेकर डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर साझा सहयोग और AI, क्वांटम तथा एडवांस्ड सैटेलाइट टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में 37 भारतीय डीप-टेक आविष्कारों का प्रदर्शन शामिल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात पर बार-बार जोर दिया है कि विकासशील देशों को केवल नियम मानने वाले राष्ट्रों की श्रेणी से निकलकर नियम तय करने वाले राष्ट्रों की भूमिका में आना होगा, और भारत इस ऐतिहासिक बदलाव का नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह तैयार है।

सवाल-जवाब

ग्लोबल साउथ क्या है?
ग्लोबल साउथ एक राजनीतिक और आर्थिक शब्द है जिसका इस्तेमाल एशिया, अफ्रीका, लातिन अमेरिका और कैरिबियन के विकासशील देशों के लिए किया जाता है।
वर्तमान ब्रिक्स समिट की अध्यक्षता कौन सा देश कर रहा है?
इस वर्ष भारत ब्रिक्स समिट की अध्यक्षता कर रहा है और नई दिल्ली में सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है।
2023 में वैश्विक अर्थव्यवस्था में ग्लोबल साउथ की हिस्सेदारी कितनी थी?
UNCTAD के अनुसार 2023 में ग्लोबल साउथ की हिस्सेदारी दुनिया की जीडीपी में 42 प्रतिशत रही थी।
ब्रिक्स समूह में वर्तमान में कुल कितने सदस्य देश हैं?
विस्तार के बाद अब ब्रिक्स समूह में कुल 11 सदस्य देश शामिल हैं।
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