पाकिस्तान की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को फौरी तौर पर चलाने के लिए एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखा जा रहा है। वैश्विक वित्तीय संस्थान ने पाकिस्तान के लिए लगभग 1.21 अरब डॉलर के राहत पैकेज का रास्ता साफ किया है। हालांकि, यह रकम सीधे तौर पर इस्लामाबाद के खजाने में तब आएगी जब संस्था के कार्यकारी बोर्ड की अंतिम मुहर लग जाएगी। विदेशी मुद्रा भंडार के संकट से जूझ रहे मुल्क के लिए यह किश्त सांस लेने भर का मौका जरूर देती है, पर इसके एवज में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार के सामने रखी गई आर्थिक शर्तें आम जनता और सरकारी खजाने पर भारी पड़ने वाली हैं।
कर्ज के दलदल में धंसी पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था
आईएमएफ के वित्तीय आंकड़ों पर नजर डालें तो जून 2025 तक पाकिस्तान का कुल सरकारी और सरकारी गारंटी वाला कर्ज करीब 307.5 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच चुका था। यह भारी भरकम आंकड़ा देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का लगभग 76.6 फीसदी बैठता है। जिस राजस्व का इस्तेमाल बुनियादी ढांचे, सड़कों, अस्पतालों, ऊर्जा क्षेत्र और रोजगार सृजन में होना चाहिए था, उसकी सबसे बड़ी हिस्सेदारी पुराने कर्जों की मूल रकम और ब्याज चुकाने में खप रही है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान पाकिस्तान को कुल कर्ज अदायगी के मद में करीब 92.1 अरब डॉलर का प्रबंध करना होगा। ऐसे विशाल वित्तीय अंतर के सामने 1.21 अरब डॉलर का यह ताजा कर्ज एक तात्कालिक सहारा जरूर बनता है, लेकिन दीर्घकालिक तौर पर यह कर्ज का एक और बोझ ही साबित हो रहा है।
सहायता राशि के साथ आईएमएफ की कड़ी शर्तों की सूची
वैश्विक वित्तीय संस्थाओं से मिलने वाली कोई भी वित्तीय मदद बिना बंदिशों के नहीं आती। पाकिस्तान को इस पूंजी के बदले अपने घरेलू कर ढांचे में सख्ती लानी होगी, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष टैक्स बढ़ाने होंगे और सरकारी खर्चों पर कड़ा नियंत्रण लगाना होगा। ऊर्जा और बिजली क्षेत्र में घाटे को पाटने के लिए सब्सिडी घटाने और संरचनात्मक सुधार करने की स्पष्ट बाध्यता भी शामिल है। हालिया समीक्षा पूरी होने के बाद ही फंड जारी करने की रूपरेखा तैयार हुई है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय फंडिंग की अगली किश्तें जारी रखनी हैं, तो उसे अपनी घरेलू नीतियों को संस्था की शर्तों के बिल्कुल अनुकूल ढालना होगा, जिससे आम उपभोक्ताओं पर महंगाई का दबाव बढ़ना तय है।
पुराना कर्ज चुकाने के लिए नया उधार लेने का दुष्चक्र
पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा संकट केवल नया कर्ज हासिल करना नहीं है, बल्कि उस पुराने कर्ज के चक्रव्यूह से निकलना है जिसकी किश्तें लगातार बढ़ रही हैं। वित्तीय वर्ष 2024-25 में पाकिस्तान का कुल कर्ज भुगतान करीब 86.3 अरब डॉलर रहा था। यह देनदारी 2025-26 में और बढ़कर 92.1 अरब डॉलर पर पहुंचने का अनुमान है। स्थिति ऐसी बन चुकी है कि देश को पुराने बकाये की किश्तें चुकाने के लिए ही नए कर्ज की जरूरत पड़ रही है। यह ठीक उसी तरह है जैसे किसी घर के दैनिक खर्चे चलाने और पुराने ऋण की मासिक किश्त भरने के लिए एक नया लोन लिया जाए, जिससे असल समस्या खत्म होने के बजाय और गहरी होती जाती है।
चीन और अन्य लेनदारों का विशाल बकाया
पाकिस्तान की उधारी की फेहरिस्त केवल आईएमएफ तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके लेनदारों में कई द्विपक्षीय भागीदार और वाणिज्यिक बैंक भी शामिल हैं। जून 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, पाकिस्तान के कुल सार्वजनिक और सरकार द्वारा गारंटीशुदा कर्ज में से बाहरी कर्ज का हिस्सा करीब 107 अरब डॉलर था। इस विदेशी कर्ज में चीन की हिस्सेदारी काफी बड़ी है। बीजिंग से जुड़ा द्विपक्षीय कर्ज लगभग 23.5 अरब डॉलर का है, जबकि चीनी कमर्शियल बैंकों की देनदारी करीब 5.7 अरब डॉलर के आसपास दर्ज की गई है। इस तरह पाकिस्तान को एक साथ कई मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय भुगतान संभालने हैं। करीब तीन सौ अरब डॉलर से अधिक के कुल कर्ज के सामने आईएमएफ की 1.21 अरब डॉलर की रकम भले ही संख्या में छोटी लगे, लेकिन देश के विदेशी मुद्रा भंडार को दिवालिया होने से बचाने और आयात बिल के फौरी निपटारे के लिए यह जीवनदान की तरह है।



















