लोकप्रिय फ्रेंच शो के प्रशंसकों के लिए कॉल माय एजेंट! द मूवी रिव्यू यह स्पष्ट करता है कि पर्दे के पीछे के अहंकार और सिनेमाई दुनिया की अफ़रातफ़री पर बना यह सीक्वल अपनी पुरानी धार बरकरार रखने में पूरी तरह सफल रहा है। टेलीविज़न और फ़िल्म उद्योग के जटिल व्यक्तित्वों पर आधारित एक लोकप्रिय धारावाहिक को जब फ़ीचर फ़िल्म का रूप दिया जाता है, तो अक्सर कहानी के अपने ही व्यंग्य में उलझ जाने का ख़तरा बना रहता है। जॉर्ज क्लूनी और ईवा लोंगोरिया जैसे वैश्विक सितारों की अपनी ही पहचान में मौज़ूदगी कागज़ पर इसे किसी आत्ममुग्धता भरे प्रोजेक्ट जैसा दिखा सकती थी, लेकिन तमाम आशंकाओं के विपरीत यह सीक्वल बेहद आकर्षक और ताज़ा अनुभव कराता है।
निर्देशन की नई ज़िम्मेदारी और गहराता संकट
इस नई कहानी के केंद्र में आंद्रेया हैं, जो अब एक निर्देशक के रूप में अपनी पहली फ़ीचर फ़िल्म का काम संभाल रही हैं। उन्हें जल्द ही यह कड़वा सच समझ आ जाता है कि सिर्फ़ फ़ोन पर आवाज़ ऊंची करके हर किसी को अपनी शर्तों पर चलाना सेट पर मुमकिन नहीं होता। जब फ़िल्म का मुख्य अभिनेता बीच में ही काम छोड़कर चला जाता है, तब पूरा प्रोजेक्ट गहरे संकट में घिर जाता है। इस बदहाली से उबरने के लिए वह अपनी पुरानी सहायक नोएमी को शामिल करती हैं, जो अब रियलिटी टीवी निर्माण के क्षेत्र में काम कर रही हैं। इसके साथ ही मिलनसार स्वभाव वाले एजेंट गेब्रियल और एएसके एजेंसी के बाकी साथी भी धीरे-धीरे इस बेकाबू होते ड्रामे का हिस्सा बनते चले जाते हैं।
बदलते समीकरण और पुरानी तल्ख़ियाँ
निर्देशक एमिली नोब्लेट ने सीरीज़ की निर्माता फैनी हेरेरो के साथ मिलकर लिखी गई इस पटकथा में किरदारों के पुराने शक्ति संतुलन को बड़े दिलचस्प ढंग से उलट दिया है। जो आंद्रेया कभी नखरेबाज़ निर्देशकों को साधने में जुटी रहती थीं, आज वह ख़ुद उसी स्थिति में खड़ी हैं और वैसी ही अड़ियल फ़िल्ममेकर बन चुकी हैं। अपने डूबते प्रोजेक्ट को बचाने की उनकी बेताब जद्दोजहद कहानी को एक बेहद संतोषजनक कर्म फल जैसा मोड़ देती है। एजेंसी के पुराने साथियों का यह पुनर्मिलन किसी भावुक या दोस्ताना माहौल के बजाय अनसुलझी खटास और पुरानी शिकायतों से भरा रहता है। हालांकि फ़ीचर फ़िल्म का लंबा ढाँचा एपिसोडिक प्रारूप की उस तेज़ गति को कुछ हद तक धीमा कर देता है, लेकिन शोबिज़ की फ़िज़ूलखर्ची को ज़रूरत से ज़्यादा गंभीरता से न लेने का अंदाज़ इस कहानी को भटकाव से सुरक्षित रखता है।
अभिनय की ताक़त और कहानी की धार
कैमिली कॉटिन एक बार फिर आंद्रेया के किरदार में पूरी तरह छा जाती हैं। उनके अभिनय का जादू ऐसा है कि मदद माँगने का एक सीधा सा संवाद भी सामने वाले के लिए किसी छिपी हुई चेतावनी जैसा लगने लगता है। माँ बनने के अनुभव ने उनके स्वभाव को थोड़ा नरम ज़रूर किया है, लेकिन उनके भीतर का तेवर और दबदबा बिल्कुल भी कम नहीं हुआ है। एक पूरी तरह नियंत्रण चाहने वाली शख़्सियत को जब यह अहसास होता है कि किसी फ़िल्म का निर्देशन करने के लिए बुनियादी कूटनीति की सख़्त ज़रूरत होती है, तो वहीं से इस फ़िल्म का सबसे तीखा हास्य जन्म लेता है। नामचीन सितारों की संक्षिप्त मौजूदगी कहानी को हॉलीवुड के आत्ममुग्ध दायरे में ढकेलने के बजाय केवल हल्के-फुल्के क्षणों तक सीमित रहती है। यह फ़िल्म अपनी लंबाई के कारण थोड़ी विलासिता भरी लग सकती है, लेकिन इसके व्यंग्य किसी भी तरह के पाखंड और दिखावे की धज्जियाँ उड़ाने के लिए काफ़ी तेज़ हैं।



















