मिनियंस को कोई नहीं रोक सकता। साम्राज्य गिरते हैं, बर्फ पिघलती है, सरकारें बदलती हैं, लेकिन ये छोटे पीले जीव हर बार नए रूप में लौट आते हैं। सिनेमैटिक ग्रूनिवर्स की सातवीं फिल्म मिनियंस एंड मॉन्स्टर्स यही साबित करती है कि यह फ्रैंचाइज़ी अभी थमने वाली नहीं है।
नए मालिक की तलाश में समुद्री सफर
2024 की निराशाजनक डेसपिकेबल मी 4 के बाद इस बार ग्रू को पूरी तरह किनारे कर दिया गया है और कहानी सिर्फ मिनियंस के इर्द-गिर्द बुनी गई है। इन पीले जीवों का एक खास दल खुले समुद्र में निकल पड़ता है क्योंकि उन्हें हर हाल में कोई खलनायक मालिक चाहिए जिसकी वे सेवा कर सकें। रास्ते में उनकी मुलाकात क्रांतिकारी फ्रांस के जालिम शासकों से होती है और एक भयानक साइक्लॉप्स से भी। यह साइक्लॉप्स वाला प्रसंग शायद वह इकलौता धागा है जो इस फिल्म को क्रिस्टोफर नोलन की द ओडिसी से जोड़ता है।
जेम्स और हेनरी की अनोखी ख्वाहिश
इस बार बॉब इस सफर में नहीं है। मोर्चा संभाला है दो नए मिनियन किरदारों जेम्स और हेनरी ने। जहां बाकी मिनियंस का एकमात्र सपना किसी बुरे मालिक की तलाश है, वहीं ये दोनों कुछ बिल्कुल अलग चाहते हैं। उनकी ख्वाहिश है कि वे अपनी कहानियां पूरी दुनिया तक पहुंचाएं। यही वजह है कि इस फिल्म में सारी धमाचौकड़ी और बेहूदगी के बीच कहानीकारी के प्रति एक सच्ची श्रद्धांजलि भी छिपी है, जो देखकर हैरत होती है। हमेशा की तरह सभी मिनियन आवाजें को-डायरेक्टर पियरे ने दी हैं।
आखिरकार जेम्स, हेनरी और उनका दल 1920 के दशक के अमेरिका में जा पहुंचता है, जहां एक वेस्टर्न फिल्म की शूटिंग चल रही होती है। और फिर गलतियों तथा हुड़दंग की एक लंबी लड़ी के बाद ये मिनियंस अनजाने में हॉलीवुड की सबसे चर्चित शख्सियतें बन जाते हैं।
क्लासिक सिनेमा को एक अजब-सा प्रेमपत्र
यह फिल्म अपने अनोखे तरीके से सिनेमा के इतिहास को एक मज़ेदार सलाम है। इसमें पुरानी क्लासिक फिल्मों के प्रति ढेर सारे स्नेहिल संकेत भरे हैं, जैसे चार्ली चैप्लिन की मॉडर्न टाइम्स और हेरोल्ड लॉयड की सेफ्टी लास्ट। बच्चे इन संकेतों को समझेंगे नहीं, यह तय है, लेकिन सिनेमा की अच्छी समझ रखने वाले माता-पिता के लिए यहां असली मज़ा है। सबसे बड़ा आकर्षण है जॉर्ज लुकास की वॉयस कैमियो, जिन्हें किसी तरह रिटायरमेंट से बाहर निकाला गया और उनका छोटा-सा किरदार काफी मनोरंजक है। फिल्म में संभवतः सिनेमा इतिहास का पहला सिटीजन केन पर आधारित फार्ट जोक भी देखने को मिलता है।
मूर्खता का वही पुराना उत्सव
इन सारी सिनेमाई महत्वाकांक्षाओं के बावजूद फिल्म अपनी पुरानी पहचान से नहीं भटकती। पूरा मिज़ाज उतना ही बचकाना और हुड़दंगी है जितना पहले था। पिक्सर की तरह भावनात्मक गहराई तलाशने की कोई कोशिश नहीं है। यह बस एक के बाद एक ऐसे मौकों की माला है जिनमें ये छोटे जीव जमकर तबाही मचाते हैं। दुनिया घूमती रहती है, मिनियंस दौड़ते रहते हैं, और दर्शक देखते रहते हैं।













