भारतीय सिनेमा में जब भी आम नागरिक के संघर्ष, प्रतियोगी परीक्षाओं की अंधी दौड़ और सामाजिक ताने-बाने से उपजे तनाव को ईमानदारी से दिखाया गया है, दर्शकों का भावनात्मक जुड़ाव गहराई से देखने को मिला है। हालिया वर्षों में '12th फेल' जैसी फिल्मों ने यह साबित किया कि तड़क-भड़क के बिना सादगी से रची गई कहानियां युवाओं के दिलों को सीधे छूती हैं। इसी कड़ी में 7 अगस्त 2026 को सिनेमाघरों में दस्तक दे रही फिल्म 'आर्यभट्ट का जीरो' एक नया परिपेक्ष्य लेकर आती है। निर्देशक कमल चंद्रा के कुशल निर्देशन में तैयार यह फिल्म आज की पीढ़ी के सबसे बड़े मानसिक दबाव यानी असफलता के भय और सफलता की सामाजिक परिभाषा पर तीखे सवाल खड़े करती है। 1 घंटे 54 मिनट के कसे हुए रनटाइम में यह कहानी एक बेरोजगार युवा की लाचारी, पिता-पुत्र के जटिल रिश्ते और आत्म-सम्मान की तलाश को बहुत ही सहज और दिल को छू लेने वाले अंदाज में पेश करती है। इस आर्यभट्ट का जीरो रिव्यू में हम फिल्म के हर पहलू का बारीक विश्लेषण करेंगे।
मुखर्जी नगर के गलियारों से शुरू होती एक अनोखी कहानी
फिल्म की शुरुआत दिल्ली के प्रसिद्ध प्रतियोगी परीक्षा केंद्र मुखर्जी नगर की व्यस्त सड़कों पर बने एक रोमांचक फ्लैशबैक दृश्य से होती है। पुलिस की गाड़ियों की गड़गड़ाहट और भागते हुए एक बदहवास नौजवान के बीच पृष्ठभूमि में एक प्रभावशाली वॉयसओवर गूंजता है कि दुनिया में कुछ लोग हीरो होते हैं, कुछ विलेन होते हैं और बाकी बचे हुए बेकार मान लिए जाते हैं। यह संवाद दर्शकों को सीधे कहानी के मुख्य पात्र ब्रह्मगुप्त श्रीवास्तव उर्फ बग्गू से रूबरू कराता है। हिमांश कोहली द्वारा निभाया गया बग्गू का किरदार उत्तराखंड के एक अत्यंत साधारण निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार का प्रतिनिधित्व करता है। कॉलेज पूरा करने के बाद भी बेरोजगार बैठा बग्गू अपनी जिंदगी में सही दिशा तलाशने के लिए संघर्ष कर रहा है। दूसरी ओर, उसके पिता आर्यभट्ट श्रीवास्तव, जिनका किरदार नीरज सूद ने निभाया है, एक सरकारी विभाग में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी हैं। पिता का सपना है कि उनका बेटा समाज में ऊंचा मुकाम हासिल करे, लेकिन बग्गू की असफलताएं उसके हर रास्ते में रोड़ा बनती हैं।
दिल टूटने से लेकर प्रतियोगी परीक्षा के दबाव तक
कहानी में नाटकीय मोड़ तब आता है जब बग्गू की प्रेमिका रिंकू, जिसे सोनाली सहगल ने निभाया है, एक व्यावहारिक फैसला लेते हुए उसे छोड़ देती है। रिंकू की शादी एक स्थापित SDM अधिकारी से हो जाती है। इस भावनात्मक झटके से आहत बग्गू अपनी काबिलियत साबित करने का फैसला करता है। वह कसम खाता है कि वह रिंकू के पति से भी बड़ा अफसर बनकर दिखाएगा और इसी जिद में वह दिल्ली जाकर UPSC की तैयारी में जुट जाता है। हालांकि, एकाग्रता की कमी और बग्गू की निजी कमजोरियां उसे बार-बार असफलता की ओर धकेलती हैं। लगातार मिल रही हार के कारण रिश्तेदार और पड़ोसी उसका मजाक उड़ाने लगते हैं। समाज में उसके पिता की पहचान को ताना मारते हुए 'आर्यभट्ट का जीरो' कहा जाने लगता है। अपनों का गिरता भरोसा और समाज का उपहास बग्गू को मानसिक रूप से तोड़ देता है, जिससे वह खुद को सचमुच एक व्यर्थ इंसान मानने लगता है। फिल्म का उत्तरार्ध इसी बात की पड़ताल करता है कि क्या कोई व्यक्ति इन तानों से उबरकर अपनी पहचान दोबारा हासिल कर सकता है।
यथार्थवादी निर्देशन और संवादों की ताकत
निर्देशक कमल चंद्रा ने फिल्म में अनावश्यक ड्रामेबाजी या बनावटी विजुअल इफेक्ट्स से परहेज करते हुए वास्तविकता को प्राथमिकता दी है। उन्होंने मध्यमवर्गीय भारतीय परिवारों की जमीनी सच्चाइयों को बहुत ही ईमानदारी से चित्रित किया है। फिल्म का पहला आधा हिस्सा जहां बग्गू की नाकामियों, प्रेम संबंध के टूटने और दिल्ली में उसके संघर्षों को हल्के-फुल्के हास्य के साथ दिखाता है, वहीं दूसरा आधा हिस्सा पूरी तरह से गंभीर और आत्मनिरीक्षण की ओर ले जाता है। पटकथा लेखक तारिक मोहम्मद ने किरदारों की संवाद अदायगी पर गहरा काम किया है। विशेष रूप से पिता और पुत्र के बीच शब्दों से ज्यादा छाई रहने वाली खामोशी और घबराहट बहुत जीवंत लगती है। संवाद न केवल मनोरंजक हैं बल्कि वे लंबे समय तक सोचने पर मजबूर करते हैं। छोटे शहरों का माहौल और पारिवारिक अपेक्षाओं का बोझ निर्देशक की गहरी समझ को दर्शाता है।
कलाकारों का बेहतरीन अभिनय और किरदारों की बुनावट
अभिनय के लिहाज से यह फिल्म हिमांश कोहली के करियर के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकती है। उन्होंने एक टूटे हुए और खुद को बेकार समझने वाले युवा की बेबसी, गुस्सा और मासूमियत अपने चेहरे के हाव-भाव से बखूबी व्यक्त की है। भावुक दृश्यों में उनका अभिनय बहुत प्रभावी नजर आता है। वहीं नीरज सूद ने बग्गू के पिता के रूप में अत्यंत मार्मिक अभिनय प्रस्तुत किया है। समाज के तानों को चुपचाप सहते हुए भी बेटे के लिए फिक्रमंद रहने वाले पिता की भूमिका में वह पूरी तरह रचे-बसे लगते हैं। दोनों के बीच के दृश्य फिल्म की असली ताकत हैं। इसके अलावा रवि किशन अपनी चिरपरिचित देसी शैली में जब भी स्क्रीन पर आते हैं, कथावस्तु में एक नई ऊर्जा भर देते हैं। सोनाली सहगल ने एक व्यावहारिक और सख्त फैसले लेने वाली प्रेमिका की भूमिका को परिपक्वता से निभाया है। दर्शना बानिक अपनी संक्षिप्त उपस्थिति में ध्यान आकर्षित करती हैं। शिल्पा शिंदे, राजेश शर्मा, अलका अमीन, इशलीन प्रसाद और नरेश वोहरा जैसे अनुभवी कलाकारों ने भी अपने छोटे-छोटे किरदारों से कहानी को समृद्ध बनाया है।
तकनीकी कमियां और अंतिम निष्कर्ष
सकारात्मक पहलुओं के बावजूद फिल्म में कुछ तकनीकी कमियां भी देखने को मिलती हैं। फिल्म की गति विशेषकर पहले हाफ में काफी धीमी है, जहां मुख्य मुद्दे तक पहुंचने में जरूरत से ज्यादा समय लिया गया है। इसके अतिरिक्त, प्रेम संबंध और ब्रेकअप का घटनाक्रम थोड़ा अनुमानित लगता है जिसमें ताजगी की गुंजाइश थी। फिल्म का संगीत भी सामान्य स्तर का है और सिनेमाघर से निकलने के बाद याद नहीं रहता। क्लाइमैक्स के भावुक दृश्यों में नाटकीयता बढ़ाने के चक्कर में कहीं-कहीं वास्तविकता से थोड़ा समझौता किया गया है। इन छोटी कमियों के बावजूद 'आर्यभट्ट का जीरो' केवल एक बेरोजगार युवक की कहानी नहीं है, बल्कि उन सभी लोगों के लिए एक आईना है जो समाज के पैमानों पर खुद को आंकने की भूल करते हैं।


















