हाल के समय में भारतीय सिनेमा के मुख्य प्रवाह में देसी लोककथाओं, अंचल विशेष की मान्यताओं और अलौकिक शक्तियों के इर्द-गिर्द कहानियां बुनने का चलन लगातार मजबूत हुआ है। इसी कड़ी में निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा और लेखक अरुणाभ कुमार एक ताजा सिनेमैटिक प्रयोग के साथ दर्शकों के सामने उपस्थित हुए हैं, जिसका नाम 'द वन' है। इस द वन रिव्यू (2026) के माध्यम से यह समझने का प्रयास करेंगे कि आस्था, क्षेत्रीय परिवेश और मिथकों का यह संगम पर्दे पर कितना प्रभावी साबित हुआ है। कागजी स्तर पर यह कहानी बेहद अनूठी नजर आती है, जहां बिहार का पारंपरिक ताना-बाना, छठ पर्व की गहरी श्रद्धा, पुराने राजघरानों के रहस्य और हॉरर-कॉमेडी का पुट एक साथ दिखाई देते हैं। हालांकि, जब इन तमाम तत्वों को एक पूर्ण फीचर फिल्म में पिरोने की बारी आती है, तो यह कई प्रयोगों के भारी बोझ तले दबती हुई महसूस होती है।
कथानक का मुख्य केंद्र मुंबई शहर में रहने वाला ऋषि (सिद्धार्थ मल्होत्रा) है। ऋषि आधुनिक विचारों वाला, पढ़ा-लिखा और हर बात को व्यावहारिक दृष्टिकोण से तौलने वाला शहरी युवक है। वह पिछले छह सालों से अपने पैतृक गांव देवांचल के संपर्क से पूरी तरह दूर रहा है। अपनी पत्नी ममता (तमन्ना भाटिया) के साथ उसकी पारिवारिक जिंदगी सामान्य गति से चल रही है, परंतु उनके दांपत्य जीवन में एक सूनापन भी है। दरअसल, छह वर्ष पूर्व ममता के दर्दनाक मिसकैरेज ने दोनों के दिलों पर गहरा जख्म छोड़ा था, जिससे वे अब तक पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं। कहानी एक महत्वपूर्ण मोड़ पर तब पहुंचती है जब लोकपर्व छठ का आगमन होता है। ममता की प्रबल मनोकामना और आस्था उन्हें देवांचल लौटने पर विवश कर देती है। वहीं दूसरी ओर, ऋषि के मन में इस यात्रा को लेकर कोई धार्मिक भाव नहीं है, बल्कि उसका एकमात्र इरादा गांव जाकर अपनी पुश्तैनी जमीन का सौदा करना और उसे बेचना है।
देवांचल का रहस्य और देव वन का भय
देवांचल गांव की सीमा से सटा हुआ एक सघन, विशाल और डरावना जंगल फैला हुआ है, जिसे स्थानीय लोग 'देव वन' कहकर पुकारते हैं। इस वन को लेकर गांव वालों के बीच यह अटल धारणा बैठी हुई है कि सूर्यास्त के बाद वहां कदम रखना सीधे अपनी जान को जोखिम में डालना है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, स्वयं वन की अधिष्ठात्री देवी उस घने जंगल का संरक्षण करती हैं। ऐतिहासिक राजा विक्रमादित्य के वंशजों पर सदियों से इस दैवीय वन और उसकी परंपराओं की रक्षा की जिम्मेदारी चली आ रही है। तार्किक सोच का हिमायती ऋषि जब गांव पहुंचता है, तो वह इन पुरानी कथाओं और पाबंदियों को महज दकियानूसी सोच और अंधविश्वास मानकर सिरे से खारिज कर देता है।
तभी एक अप्रत्याशित घटनाक्रम जन्म लेता है। गांव का एक सांड शाम के अंधेरे में भटकते हुए प्रतिबंधित देव वन की सीमा के भीतर घुस जाता है। उसे जंगल से बाहर निकालने और बचाने के फेर में ऋषि बिना किसी हिचक या परिणाम की परवाह किए उस रहस्यमयी जंगल में प्रवेश कर जाता है। यहीं से कथानक में अलौकिक और सुपरनैचुरल घटनाओं का सिलसिला आरंभ होना चाहिए था। लेकिन अफसोस की बात यह है कि जिस मोड़ पर रहस्य की परतें खुलकर दर्शकों को रोमांच से भर देनी चाहिए थीं, वहां कहानी अनावश्यक जटिलताओं में उलझने लगती है। पटकथा में एक साथ कई सूत्र जोड़ने की कोशिश की जाती है, जिनमें राजा का छिपा हुआ गुप्त वंश, वन देवी की पौराणिक गाथा, एक जादुई सुरक्षा कवच, चमत्कारी पायल, अदृश्य बुरी शक्तियों का साया, ग्रामीणों के बीच चलने वाली आंतरिक राजनीति और पैतृक जमीन के मालिकाना हक का विवाद शामिल हैं। हर थोड़ी देर में कहानी में नया कोण जोड़ा जाता है, मगर कोई भी सिरा संतोषजनक मुकाम तक नहीं पहुंच पाता।
अभिनय का स्तर और मुख्य कलाकारों की मौजूदगी
फिल्म में कलाकारों के प्रदर्शन का स्तर काफी असमान और असंतोषजनक रहा है। मुख्य भूमिका में ऋषि का किरदार निभा रहे सिद्धार्थ मल्होत्रा का काम फिल्म का सबसे कमजोर पहलू साबित होता है। इस पात्र का दायरा काफी बड़ा था, जिसे शुरू में एक अविश्वासी और वैज्ञानिक सोच रखने वाले शख्स के रूप में दिखाया गया है, जो धीरे-धीरे रहस्यमयी घटनाओं का साक्षी बनकर डर, संशय और अंततः विश्वास के दौर से गुजरता है। इस तरह के आंतरिक रूपांतरण को जीवंत करने के लिए चेहरे पर जिन सूक्ष्म भावों की आवश्यकता थी, वे सिद्धार्थ के अभिनय में नजर नहीं आते। उनका भाव-प्रदर्शन अधिकांश दृश्यों में पूरी तरह सपाट बना रहता है। उनकी संवाद अदायगी में भी ग्रामीण माहौल और स्थानीय भाषा के अनुरूप अपनापन महसूस नहीं होता। संवादों को भीतर से आत्मसात करने के बजाय वे उन्हें रटे हुए वाक्यों की तरह बोलते दिखते हैं, जिससे वे गांव की माटी से जुड़े व्यक्ति की जगह कुछ समय के लिए शूटिंग करने पहुंचे किसी शहरी मॉडल जैसे दिखाई पड़ते हैं।
ममता की भूमिका में तमन्ना भाटिया का स्क्रीन प्रजेंस बेहद आकर्षक और गरिमामय है। पारंपरिक परिधानों में सजी तमन्ना विशेष रूप से छठ पूजा के पावन दृश्यों में आंखों को सुकून पहुंचाती हैं। किंतु पटकथा में उनके किरदार को केवल नायक की सहायक पत्नी के सांचे में बांधकर रखा गया है, जिसके चलते उन्हें अपनी अभिनय क्षमता को खुलकर दर्शाने का कोई वास्तविक अवसर नहीं मिल पाता। वहीं दूसरी ओर, मुख्य खलनायक दीपक की भूमिका में सुनील ग्रोवर नजर आते हैं। हास्य विधा के मंझे हुए कलाकार सुनील ग्रोवर ने एक क्रूर और गंभीर प्रतिपक्षी के तौर पर पूरी ईमानदारी से काम किया है और कई दृश्यों में उनका खौफ भी दिखता है। इसके बावजूद, दर्शकों के मानस पटल पर उनकी स्थापित कॉमिक छवि इतनी गहरी है कि उन्हें हाथ में धारदार हथियार थामे बेरहमी से मारकाट और हिंसा करते देखना सहज नहीं लगता।
हास्य के प्रयास और निर्देशन की सीमाएं
फिल्म में वीपी नामक किरदार में मनीष पॉल ने अपनी जानी-पहचानी शैली में वन-लाइनर्स के सहारे दर्शकों को गुदगुदाने की चेष्टा की है। लेकिन मनीष पॉल और सुलभा आर्या से जुड़े हास्य प्रसंग इतने बचकाने और बेतुके ढंग से जबरन ठूंसे गए हैं कि वे मनोरंजन करने के बजाय सिरदर्द का सबब बन जाते हैं। कुछ दृश्यों का स्तर तो इतना फूहड़ हो जाता है कि सिनेमाघर में बैठे दर्शकों को असहजता महसूस होने लगती है।
जमीनी और सजीव वेब सीरीज का सफल निर्देशन कर चुके दीपक कुमार मिश्रा से सिनेमा प्रेमियों को भारी अपेक्षाएं थीं। उनके निर्देशन की बात की जाए, तो वे कुछ चुनिंदा हिस्सों में अपनी छाप अवश्य छोड़ते हैं, जैसे जंगल के भीतर एक रहस्यमयी और डरावना वातावरण तैयार करना अथवा अपने परिचित अंदाज वाले हल्के-फुल्के संवाद शामिल करना। युवाओं के रुझान को ध्यान में रखते हुए कुछ लोकप्रिय संदर्भ भी डाले गए हैं। सूर्यास्त के बाद आंखों पर पट्टी बांधकर देव वन में प्रवेश करने की विचित्र रस्म और अंधेरी ताकतों की अवधारणा रोचक है, परंतु जब इन बिखरे हुए तत्वों को जोड़कर एक ठोस सिनेमाई रूप देने की बात आती है, तो निर्देशन का सिरा कमजोर पड़ जाता है।
तार्किकता की कमी और जल्दबाजी में निपटाया गया अंत
पटकथा में बुनियादी तार्किकता का भारी अभाव साफ झलकता है। उदाहरण के लिए, पूरे देवांचल गांव को इस बात की जानकारी है कि राजा विक्रमादित्य का एक गुप्त वारिस इसी गांव में कहीं रहता है, लेकिन हैरत की बात यह है कि किसी को उसकी सही पहचान का पता नहीं होता। फिल्म इस पहेली का कोई तार्किक आधार या स्पष्टीकरण पेश नहीं कर पाती। इसके अतिरिक्त, कहानी का एक बड़ा हिस्सा चमत्कारी शक्तियों से युक्त एक दिव्य पायल की तलाश पर केंद्रित है। सामान्य समझ कहती है कि इतनी बहुमूल्य और दैवीय वस्तु किसी बेहद गुप्त, दुर्गम या सुरक्षित स्थान पर छिपाई गई होगी, परंतु फिल्म में यह पवित्र पायल एक साधारण जगह पर इतनी आसानी से बरामद हो जाती है कि उसके पीछे रची गई खोज और संघर्ष की पूरी पृष्ठभूमि निरर्थक लगने लगती है।
फिल्म का अंतिम आधा घंटा यानी इसका क्लाइमैक्स भी घोर निराशा पैदा करता है। इसे बेहद जल्दबाजी में निपटाया गया प्रतीत होता है, जिससे न तो वांछित रोमांच उभर पाता है और न ही कहानी के फैले हुए धागे कायदे से सिमट पाते हैं। लोककथा और आधुनिक सोच के इस टकराव को यदि एक कसी हुई पटकथा और संवेदनशील अभिनय का सहारा मिलता, तो परिणाम कहीं बेहतर हो सकता था।



















