बॉलीवुड में जब भी समय यात्रा यानी टाइम ट्रैवल और मनोवैज्ञानिक रोमांच यानी साइकोलॉजिकल सस्पेंस थ्रिलर जैसे चुनौतीपूर्ण विषयों पर काम होता है, तो सिनेप्रेमियों की उम्मीदें स्वाभाविक रूप से काफी बढ़ जाती हैं। निर्देशक करण रावल की नई फिल्म ‘तू है मेरी किरण’ भी एक ऐसे ही अनूठे और आकर्षक विचार पर आधारित है, जहां एक पुराना फ्लिप फोन दस साल के अंतराल यानी 2016 और 2026 के बीच की दो अलग-अलग जिंदगियों को आपस में जोड़ देता है। हालांकि इस फिल्म का मूल विचार मजबूत है और कलाकारों ने भी अपनी तरफ से बेहतरीन काम किया है, लेकिन एक बिखरी हुई पटकथा, दिशाहीन निर्देशन और कई तार्किक कमियों की वजह से यह पूरी परियोजना दर्शकों की कसौटी पर खरी नहीं उतरती है।
फिल्म की कहानी और टाइम ट्रैवल का अजीब मेल
यह कहानी 28 सितंबर 2026 के दिन से शुरू होती है, जहां मुख्य किरदार किरण यानी सोनाक्षी सिन्हा अपने पति रायन यानी अंकित गुप्ता के साथ एक शांत और सुखी जीवन बिता रही है। उसकी सामान्य जिंदगी में भूचाल तब आता है जब उसे अपने घर की अलमारी में एक पुराना और खराब हो चुका फ्लिप फोन मिलता है। अचानक उस उपकरण पर समर यानी जहीर इकबाल नाम के एक अनजान व्यक्ति का फोन आने लगता है। बातचीत के दौरान यह चौंकाने वाला खुलासा होता है कि समर वर्तमान यानी 2026 में नहीं, बल्कि पूरे दस साल पीछे यानी 2016 के दौर में जी रहा है। जब दोनों एक ही शहर के अलग-अलग सिनेमाघरों में मिलने का फैसला करते हैं, तो किरण को अपने सामने ‘धुरंधर 2’ फिल्म चलती हुई दिखती है, जबकि समर की स्क्रीन पर ‘एमएस धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी’ प्रदर्शित हो रही होती है। इस तरह उन्हें इस बात का पक्का यकीन हो जाता है कि वे दोनों एक दशक के फासले से आपस में बातचीत कर रहे हैं। शुरुआत में यह अनोखा मेल काफी दिलचस्प प्रतीत होता है, लेकिन जैसे-जैसे घटनाक्रम आगे बढ़ता है, समर का असली और डरावना चेहरा सामने आने लगता है।
अपराध, जुनूनी प्यार और भटकती हुई पटकथा
समर असल में एक आपराधिक पृष्ठभूमि और विकृत मानसिक स्थिति वाला इंसान है, जो किरण के जरिए भविष्य की जानकारी हासिल करके पैसों का दांव लगाना चाहता है। उसकी यह महत्वकांक्षा धीरे-धीरे एक खतरनाक और मानसिक रूप से बीमार करने वाले जुनूनी प्रेम में तब्दील हो जाती है। जब किरण उससे दूरी बनाने का प्रयास करती है, तो वह उसे पुराने दौर यानी 2016 में ही फंसाकर उसकी पूरी जिंदगी को तबाह करने की धमकी देने लगता है। हालांकि इस कहानी की मूल सोच में काफी दम था, लेकिन इसका स्क्रीनप्ले इतना अव्यवस्थित और उलझा हुआ है कि दर्शक पूरी फिल्म के दौरान तर्क की तलाश करते रह जाते हैं। लेखक ने अपनी सुविधा के अनुसार समय यात्रा के बुनियादी नियमों को कई जगह तोड़ा-मरोड़ा है, जिससे इस सस्पेंस थ्रिलर का मूल उद्देश्य ही पूरी तरह से समाप्त हो जाता है।
कलाकारों का अभिनय और मजबूत पक्ष
कमजोर पटकथा के बावजूद अगर यह फिल्म किसी एक मोर्चे पर मजबूत ठहरती है, तो वह इसके कलाकारों का समर्पित अभिनय है। वास्तविक जीवन के दंपती सोनाक्षी सिन्हा और जहीर इकबाल ने अपने-अपने किरदारों को पर्दे पर पूरी ईमानदारी के साथ जीने का प्रयास किया है। किरण की भूमिका में सोनाक्षी ने बेहद शांत, संयमित और गंभीर अदाकारी का परिचय दिया है। वह हर दृश्य में अपनी आंखों के भावों और जज्बातों के जरिए 2016 की बेफिक्र लड़की और 2026 की डरी हुई लेकिन भीतर से मजबूत औरत के फर्क को बखूबी दर्शाती हैं। वहीं दूसरी तरफ, जहीर इकबाल ने समर के नकारात्मक, स्वार्थी और जुनूनी स्टॉकर वाले रूप को बहुत प्रभावी ढंग से पर्दे पर उतारा है। एक मनोरोगी प्रेमी के रूप में उनकी देहभाषा और संवाद अदायगी काफी असरदार बन पड़ी है। सहायक कलाकारों में अंकित गुप्ता ने पति के रूप में सीमित समय में भी स्वाभाविक अभिनय किया है, जबकि वरिष्ठ कलाकार जरीना वहाब और पूर्णेंदु भट्टाचार्य ने भी अपने छोटे दायित्वों को पूरी निष्ठा से निभाया है, हालांकि कमजोर संवादों के कारण उनके हुनर का पूरा फायदा नहीं मिल पाया है।
निर्देशन और तकनीकी पहलुओं की खामियां
निर्देशक करण रावल ने एक नया विषय तो चुना, लेकिन वह उसे सही अंजाम तक पहुंचाने में असफल रहे। इस विधा की फिल्मों में सबसे बड़ी जरूरत कड़े नियंत्रण और तार्किक स्पष्टता की होती है। निर्देशक फिल्म के शुरुआती हिस्से में तो रहस्य बनाए रखने में सफल रहते हैं, लेकिन अंतराल के बाद कहानी अपनी दिशा पूरी तरह से खो बैठती है। वह दो अलग-अलग कालखंडों के बीच के तनाव को सही तरीके से संभाल नहीं पाए। एक थ्रिलर फिल्म में जो सिहरन, डर और रोमांच का भाव होना चाहिए था, वह कमजोर निर्देशन के कारण नदारद दिखता है। इसके अलावा फिल्म का दृश्य संयोजन भी बेहद साधारण स्तर का है। दोनों दशकों के फर्क को उभारने के लिए जिस तरह के रंग, प्रकाश व्यवस्था और कैमरामैन की कला की जरूरत थी, वह यहां नदारद है। संगीत और पृष्ठभूमि का स्कोर भी बहुत कमजोर है, जो दृश्यों के तनाव को बढ़ाने में नाकाम रहता है। गानों का फिल्मांकन कहानी की रफ्तार को और धीमा कर देता है, और थिएटर से बाहर आने के बाद कोई भी धुन याद नहीं रहती।


















