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1857 के संग्राम से जुड़ा गोमती नदी का लोहे का पुल जर्जर, देखरेख की गुहारभारत
8 अग॰ 2026, 2:14 pm (54 दिन पहले)· 0

1857 के संग्राम से जुड़ा गोमती नदी का लोहे का पुल जर्जर, देखरेख की गुहार

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद गोमती नदी पर अंग्रेजों द्वारा बनाया गया ऐतिहासिक लोहे का पुल अब उपेक्षा के कारण जीर्ण-शीर्ण हो चुका है। सुरक्षा कारणों से आवाजाही बंद होने के बाद अब स्थानीय निवासी इसके संरक्षण और मरम्मत की मांग उठा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में गोमती नदी के तट पर स्थित एक ऐतिहासिक धरोहर आज अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा लोहे का यह ऐतिहासिक पुल प्रशासनिक उपेक्षा के कारण दिन-ब-दिन जर्जर होता जा रहा है। एक समय था जब यह पुल सुल्तानपुर के संपूर्ण व्यापारिक गतिविधियों का मुख्य केंद्र हुआ करता था। ब्रिटिश शासनकाल में अवध प्रांत के विभिन्न हिस्सों को आपस में जोड़ने के उद्देश्य से इस पुल का निर्माण किया गया था, लेकिन देखरेख के अभाव में अब यह ऐतिहासिक संरचना तबाही की कगार पर पहुंच चुकी है।

अवध प्रांत को जोड़ने वाले पुल का ऐतिहासिक महत्व

इस पुल का इतिहास 1857 के महान स्वाधीनता आंदोलन से गहराई से जुड़ा हुआ है। क्रांति के समय जब सुल्तानपुर के स्थानीय नागरिकों और क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोला था, तब ब्रिटिश सरकार ने लोगों को गोमती नदी पार करने से रोकने के लिए वहां पहले से मौजूद लकड़ी के पुल को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। इस इलाके की भौगोलिक और सामरिक स्थिति को देखते हुए अवध प्रांत से सीधा संपर्क बहाल करना अंग्रेजों के लिए बेहद जरूरी था। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए क्रांति को दबाने के बाद ब्रिटिश प्रशासन ने मजबूत लोहे के पुल का निर्माण करवाया था।

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तोप के गोलों से मिला 'गोलाघाट' नाम

क्षेत्रीय इतिहास और वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, 1857 के संघर्ष के दौरान ब्रिटिश सेना ने नदी पार कर रहे स्थानीय निवासियों को रोकने के लिए भारी तोपखाने का इस्तेमाल किया था। अंग्रेजों द्वारा पुल पर दागे गए तोप के गोलों की वजह से ही इस विशेष स्थान का नाम 'गोलाघाट' पड़ा। यह स्थान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वीरता और अंग्रेजों के दमन चक्र का एक मूक गवाह रहा है।

सुरक्षा बंदिशों के बीच असामाजिक गतिविधियों का जमावड़ा

वर्तमान समय में समय की मार और जर्जर ढांचे के कारण पुल की मजबूती काफी कम हो गई है। आम जनता की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रशासन ने इस पुल पर सभी प्रकार की आवाजाही को पूरी तरह से बंद कर दिया है। हालांकि, आवाजाही रोकने के लिए बनाई गई पक्की दीवार भी अब टूटकर ध्वस्त हो चुकी है। देखरेख न होने से यह ऐतिहासिक स्थल अब असामाजिक तत्वों का अड्डा बन चुका है। इतना ही नहीं, धरोहर की मर्यादा को दरकिनार करते हुए पुल के ठीक बगल में एक शराब का ठेका भी खोल दिया गया है, जिससे क्षेत्र का माहौल और खराब हो रहा है।

विरासत को बचाने के लिए संरक्षण की उठती मांगें

सुल्तानपुर के स्थानीय निवासी अब एकजुट होकर जिला प्रशासन और उत्तर प्रदेश सरकार से इस बहुमूल्य विरासत के जीर्णोद्धार की मांग कर रहे हैं। नागरिकों का स्पष्ट कहना है कि यदि सरकार ने समय रहते इस सैकड़ों साल पुराने लोहे के पुल की मरम्मत और समुचित संरक्षण का काम शुरू नहीं किया, तो सुल्तानपुर की यह ऐतिहासिक पहचान हमेशा के लिए मिट जाएगी। क्षेत्र के लोग चाहते हैं कि इसे एक संरक्षित स्मारक के रूप में विकसित किया जाए ताकि 1857 की क्रांति का यह प्रतीक आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रह सके।

सवाल-जवाब

यह ऐतिहासिक पुल उत्तर प्रदेश में कहां स्थित है?
यह पुल उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में गोमती नदी पर स्थित है।
इस पुल का निर्माण अंग्रेजों द्वारा कब कराया गया था?
इसे 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों ने अवध प्रांत को जोड़ने और व्यापारिक मार्ग बहाल करने के लिए बनवाया था।
इस स्थान को 'गोलाघाट' नाम कैसे मिला?
1857 की क्रांति के समय अंग्रेजों ने स्थानीय लोगों को रोकने के लिए पुराने लकड़ी के पुल पर तोप के गोले दागे थे, जिससे इस स्थान का नाम गोलाघाट पड़ा।
पुल पर सुरक्षा कारणों से आवाजाही क्यों रोक दी गई है?
वर्षों की उपेक्षा के कारण लोहे का यह पुल काफी जर्जर और कमजोर हो चुका है, इसलिए सुरक्षा के लिहाज से इस पर आवाजाही बंद की गई है।
स्थानीय निवासी प्रशासन से क्या मांग कर रहे हैं?
स्थानीय नागरिक सरकार और प्रशासन से इस प्राचीन ऐतिहासिक धरोहर की तुरंत मरम्मत कराने और इसे संरक्षित स्मारक घोषित करने की मांग कर रहे हैं।
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