31 अक्टूबर 1984 की सुबह राजधानी दिल्ली में दिन की शुरुआत बिल्कुल आम दिनों की तरह ही हो रही थी। उस समय देश की प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी अपने आवास से सटे हुए दफ्तर में जाने के लिए पूरी तरह तैयार हो रही थीं। तभी अचानक ही घर के भीतर पटाखों जैसी आवाजें गूंज उठीं। उस वक्त घर के अंदर मौजूद सोनिया गांधी को शुरुआत में कुछ भी समझ नहीं आया कि आखिर माजरा क्या है। इसके तुरंत बाद ही बच्चों की देखभाल करने की जिम्मेदारी संभालने वाली आया बेहद घबराई हुई स्थिति में बाथरूम के दरवाजे पर आ पहुंची। वह लगातार फफक-फफक कर रो रही थी और साथ ही घर के बगीचे की तरफ इशारा कर रही थी। सोनिया गांधी बिना एक पल गंवाए बाहर की तरफ भागीं तो उन्होंने देखा कि सामने से एक सफेद एंबेसडर कार धीरे-धीरे आगे आ रही थी।
अस्पताल का सफर और खौफनाक मंजर
उसी कार के भीतर इंदिरा गांधी को इलाज के लिए ले जाया जा रहा था और कुछ ही पलों के भीतर सोनिया गांधी भी उस कार के अंदर पहुंच चुकी थीं। उनके ठीक सामने उनकी सास इंदिरा गांधी का शरीर पड़ा हुआ था जिनकी साड़ी पर खून के निशान थे और उनके सीने पर भी चारों तरफ खून ही खून फैला हुआ था। उस वक्त इंदिरा गांधी की आंखें पूरी तरह से खुली हुई थीं और वह बिल्कुल शांत थीं, उनके मुंह से कोई शब्द नहीं निकल रहा था। सोनिया गांधी ने उन्हें मां कहकर पुकारने की पूरी कोशिश की लेकिन उनके गले से आवाज ही बाहर नहीं आ पा रही थी। इस डरावने और वीभत्स मंजर का जिक्र सोनिया गांधी ने अपनी आत्मकथा 'बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव' में विस्तार से किया है। द गार्जियन अखबार में छपे इस किताब के कुछ हिस्सों में उन्होंने उस दिन की एक-एक घटना को बेहद करीब से याद किया है।
आया का रोना और सोनिया की बेचैनी
सोनिया गांधी ने अपनी इस किताब में लिखा है कि इंदिरा गांधी अपने घर के नजदीक बने हुए दफ्तर के लिए रवाना हो चुकी थीं और वह खुद उस वक्त नहाने की तैयारी में जुटी हुई थीं। तभी उन्हें अचानक गोलियों की आवाजें सुनाई दीं जो सामान्य पटाखों जैसी नहीं थीं बल्कि कुछ अलग थीं और इसी बात ने उन्हें अपनी जगह पर ठिठकने के लिए मजबूर कर दिया। उसी दौरान बच्चों की आया ओंगमू ने बाथरूम के दरवाजे को जोर-जोर से पीटना शुरू कर दिया और उसका रो-रोकर बुरा हाल था। सोनिया गांधी ने जैसे ही दरवाजा खोला तो वह आया कुछ भी बोल पाने की हालत में नहीं थी और बस लगातार बगीचे की दिशा में हाथ से इशारा किए जा रही थी। यह सब देखते ही सोनिया तुरंत अकबर रोड की तरफ जाने वाले रास्ते पर पूरी ताकत से दौड़ पड़ीं।
जैसे ही वह आगे बढ़ीं तो उन्होंने सामने से आती हुई वही सफेद एंबेसडर कार देख ली और वह कुछ पलों के लिए वहीं सहम कर रुक गईं। उनके मन के भीतर एक अजीब सा डर और भारी घबराहट समाई हुई थी, जिसके बाद उन्होंने देखा कि इंदिरा गांधी को उसी वाहन में अस्पताल ले जाया जा रहा है। इस भयानक दृश्य को अपनी आंखों के सामने देखते ही वह जोर से चीख पड़ीं। कार के भीतर का हाल यह था कि सोनिया गांधी ठीक इंदिरा गांधी के सामने फर्श के ऊपर झुकी हुई बैठी थीं। उनकी अपनी साड़ी पर भी खून लग चुका था और इंदिरा गांधी के सीने पर भी खून के धब्बे थे। उनकी बड़ी-बड़ी आंखें खुली हुई थीं और उनके चेहरे पर एक गहरी हैरानी का भाव साफ झलक रहा था।
अस्पताल में अनहोनी का अहसास
सोनिया गांधी ने उस दर्दनाक वाकये को याद करते हुए लिखा है कि वह बार-बार उन्हें पुकारने की कोशिश कर रही थीं और उनके मुंह से सिर्फ मम्मी-मम्मी शब्द निकलना चाहते थे लेकिन उनके गले से कोई आवाज बाहर नहीं आ पा रही थी। उन्होंने अपनी तरफ से दोबारा पूरी कोशिश की लेकिन इंदिरा गांधी की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। उस गाड़ी के आगे बैठे हुए उनके सहयोगी लगातार चिल्ला रहे थे और उस वक्त रास्ते पर भारी ट्रैफिक जाम लगा हुआ था। वह कार बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रही थी और उसमें कोई सायरन तक नहीं लगा हुआ था। एक के बाद एक कई लाल बत्तियों को पार करते हुए वे आखिरकार अस्पताल तक पहुंच गए जहां पहले से ही भारी अफरा-तफरी का माहौल बना हुआ था।
शुरुआत में उन्हें अस्पताल के अंदर जाने से रोक दिया गया था लेकिन बाद में इंदिरा गांधी के शरीर को स्ट्रेचर पर रखकर अंदर ले जाया गया और सोनिया को पास के ही एक कमरे में बैठने के लिए भेज दिया गया। सोनिया उस समय केवल इंदिरा गांधी के पास ही रहना चाहती थीं क्योंकि वह किसी भी कीमत पर यह जानना चाहती थीं कि आखिर अस्पताल के भीतर चल क्या रहा है। लेकिन वहां मौजूद डॉक्टर और तमाम अस्पताल के कर्मचारी अपने काम में पूरी तरह से व्यस्त थे और सोनिया की घबराहट लगातार बढ़ती जा रही थी। उस गंभीर स्थिति में उन्हें यह तक याद नहीं आ रहा था कि राजीव गांधी इस वक्त कहां पर मौजूद हैं। इसके तुरंत बाद ही उन्हें अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका का ख्याल आया जो उस वक्त अपने स्कूल में पढ़ाई कर रहे थे।
बच्चों की वापसी और राजीव का आना
सोनिया गांधी ने सोचा कि उन दोनों बच्चों को किसी भी तरह से सुरक्षित उनके घर वापस लाना बहुत जरूरी है। कुछ समय बीतने के बाद किसी ने आकर यह बात कही कि इंदिरा गांधी के कपड़ों पर खून के निशान लगे हुए हैं, जिसके बाद सोनिया के लिए दूसरे कपड़ों का इंतजाम किया गया। अस्पताल के बाहर धीरे-धीरे लोगों की भारी भीड़ जमा होने लगी थी और कई घंटे यूं ही गुजरते चले गए। सोनिया ने एक डॉक्टर के पास जाकर इशारों ही इशारों में यह पूछना चाहा कि असल में क्या हुआ है, तो डॉक्टर ने केवल अपना सिर नीचे की तरफ हिला दिया। उस एक इशारे को समझते ही सोनिया सब कुछ भांप गईं और जोर-जोर से फूट-फूटकर रोने लगीं। आखिरकार 31 अक्टूबर 1984 को दोपहर के ठीक दो बजे इंदिरा गांधी को मृत घोषित कर दिया गया।
इस दुखद घटना के बाद सोनिया गांधी को उनके घर भेजा गया ताकि वह इंदिरा गांधी के शरीर के लिए साफ कपड़े लेकर आ सकें। जब वह रास्ते में थीं तो कुछ उग्र लोगों ने उनकी गाड़ी को रोकने की पूरी कोशिश की और वे खिड़की के शीशों पर हाथ मारने के साथ ही गुस्से में जोर-जोर से चिल्ला रहे थे। जैसे ही वह अपने घर पहुंचीं तो राहुल और प्रियंका दोनों दौड़कर सीधे उनसे लिपट गए और दोनों बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल था। सुरक्षा में तैनात कमांडो उन दोनों को अचानक ही स्कूल से सीधे घर लेकर आ गए थे और घर के अन्य कर्मचारियों को इस तरह रोते हुए देखकर बच्चों को पहले ही किसी बड़ी अनहोनी का भारी अहसास हो चुका था।
वे दोनों लगातार सोनिया से यह सवाल पूछ रहे थे कि उनकी मम्मा कहां हैं, उनके पापा कहां हैं और आखिर उनकी दादी को क्या हो गया है। सोनिया गांधी उन सभी बच्चों को अपने गले से लगाकर पूरी सच्चाई बताना चाहती थीं लेकिन वह खुद अंदर से इतनी बुरी तरह टूट चुकी थीं कि उनके मुंह से एक शब्द भी बाहर नहीं आ रहा था। उन्हें मजबूरन वापस अस्पताल लौटना पड़ा क्योंकि उसी समय राजीव गांधी के वहां पहुंचने की पूरी सूचना मिल चुकी थी। राजीव गांधी उस दौरान पश्चिम बंगाल राज्य में अपनी एक चुनावी रैली को संबोधित करने गए थे और पुलिस ने रास्ते में ही उनके काफिले को रोककर दिल्ली से आए उस संदेश की जानकारी दी।
राजीव गांधी को बीबीसी के माध्यम से यह खबर मिल चुकी थी कि उनकी मां इंदिरा गांधी किसी दुर्घटना का शिकार हुई हैं और उनकी हालत बहुत ज्यादा नाजुक बनी हुई है। हालांकि किसी ने भी सीधे तौर पर उन्हें उनकी मौत की मनहूस खबर नहीं दी थी लेकिन वह अंदर ही अंदर सब कुछ समझ चुके थे। इसके बाद राजीव गांधी शाम के करीब साढ़े तीन बजे अस्पताल पहुंचे जहां सोनिया ने उन्हें देखते ही कसकर गले लगा लिया। उसी वक्त राजीव गांधी ने सोनिया को यह बताया कि उन्हें देश के अगले प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के लिए कहा गया है और यह बात सुनते ही सोनिया पूरी तरह से अंदर से बिखर गईं। उन्हें इस बात का गहरा डर सता रहा था कि कहीं उनके पति राजीव गांधी का अंजाम भी बिल्कुल वैसा ही न हो जाए जैसा उनकी सास का हुआ है।


















