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5 दशक पुराने ज़मीन विवाद पर गौहाटी हाईकोर्ट का फैसला, 30 साल लंबे कब्ज़े के आधार पर तरुबाला साहा का मालिकाना हक बरकरारभारत
31 अग॰ 2026, 1:02 pm (59 मिनट पहले)· 2

5 दशक पुराने ज़मीन विवाद पर गौहाटी हाईकोर्ट का फैसला, 30 साल लंबे कब्ज़े के आधार पर तरुबाला साहा का मालिकाना हक बरकरार

गौहाटी हाईकोर्ट ने 1975 में खरीदी गई 4 बीघा ज़मीन के मालिकाना हक पर महिला के पक्ष में निर्णय दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि नाबालिगों के हिस्से की बिक्री कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण थी, परंतु परिजनों द्वारा कानूनी कदम उठाने में 30 वर्ष से अधिक की देरी के कारण महिला का कब्ज़ा वैध रहेगा।

असम के एक दशकों पुराने भूमि विवाद में ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए गौहाटी हाईकोर्ट ने तरुबाला साहा नामक महिला खरीदार के मालिकाना हक को सही ठहराया है। यह मामला वर्ष 1975 में पंजीकृत एक बिक्री विलेख से जुड़ा हुआ है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यद्यपि एक बड़ा भाई अपने नाबालिग भाई-बहनों का कानूनी संरक्षक बने बिना उनकी संपत्ति नहीं बेच सकता, लेकिन यदि खरीदार तीन दशकों से अधिक समय से उस भूमि पर निर्बाध रूप से काबिज है, तो इतनी लंबी अवधि के बाद बिक्री को चुनौती नहीं दी जा सकती। न्यायमूर्ति कल्याण राय सुराना की पीठ ने 24 अगस्त 2026 को इस महत्वपूर्ण याचिका का निपटारा करते हुए निचली अदालतों के फैसलों को बरकरार रखा।

वर्ष 1975 के भूमि सौदे की पृष्ठभूमि

विवाद की शुरुआत 4 बीघा, 2 कठ्ठा और 10 लेचा क्षेत्रफल वाली एक कृषि भूमि से हुई थी। यह संपत्ति मूल रूप से याद अली नाम के व्यक्ति की थी। उनकी मृत्यु के पश्चात उनके बड़े बेटे नागर अली ने 18 फरवरी 1975 को पंजीकृत बिक्री विलेख संख्या 2913/75 के माध्यम से पूरी ज़मीन तरुबाला साहा को बेच दी। इस बिक्री पत्र में नागर अली ने अपने स्वयं के एक-पांचवें हिस्से के साथ-साथ अपने चार नाबालिग भाई-बहनों के अधिकारों का भी सौदा कर दिया था।

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भूमि की खरीद के बाद तरुबाला साहा का नाम आधिकारिक राजस्व अभिलेखों में दर्ज हो गया। उन्होंने इस ज़मीन पर स्वयं खेती करने के बजाय बटाईदारों के माध्यम से फसल उगाना शुरू किया। महिला का दावा था कि वह खरीद के दिन से ही लगातार ज़मीन के उपयोग और नियंत्रण में थीं। हालांकि वर्ष 2008 के आते-आते इस संपत्ति को लेकर विवाद गहरा गया।

वर्ष 2008 में बेदखली का आरोप और कानूनी संघर्ष

तरुबाला साहा का आरोप था कि 15 फरवरी 2008 को याद अली के अन्य बच्चों, जो अब बालिग हो चुके थे, ने उन्हें जबरन ज़मीन से बेदखल कर दिया और वहां अपने मकान बना लिए। इसके विरोध में महिला ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने 1975 के बिक्री विलेख की वैधता को चुनौती दी।

प्रतिवादियों का तर्क था कि नागर अली उनके गार्जियन यानी कानूनी संरक्षक नहीं थे और न ही किसी अदालत ने उन्हें ऐसा अधिकार दिया था। इस आधार पर उन्होंने दावा किया कि नागर अली को अपने चार नाबालिग भाई-बहनों के हिस्से की संपत्ति बेचने का कोई विधिक अधिकार नहीं था, इसलिए 1975 का वह सौदा पूरी तरह से अमान्य था और ज़मीन का मालिकाना हक वापस उनके पास होना चाहिए।

निचली अदालतों का निर्णय और पहली अपील

मामले की सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट ने तरुबाला साहा के पक्ष में अपना फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि तरुबाला साहा लंबे समय से संपत्ति पर काबिज थीं, इसलिए उन्हें ज़मीन का कब्ज़ा वापस सौंपा जाना चाहिए। इसके साथ ही अदालत ने प्रतिवादियों के मालिकाना हक के दावे को खारिज कर दिया।

इसके बाद प्रतिवादियों ने प्रथम अपीलीय अदालत में याचिका दायर की। प्रथम अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट के आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए यह माना कि 1975 की बिक्री विलेख केवल नागर अली के स्वयं के एक-पांचवें हिस्से तक ही कानूनी रूप से वैध थी, जबकि नाबालिगों के चार-पांचवें हिस्से के लिए यह अमान्य थी। फिर भी, लंबे समय के कब्ज़े और याचिका दायर करने में हुई अत्यधिक देरी को ध्यान में रखते हुए महिला के पक्ष में फैसला बरकरार रखा गया।

मुस्लिम कानून और समयसीमा पर हाईकोर्ट का विश्लेषण

मामला गौहाटी हाईकोर्ट पहुंचा तो न्यायमूर्ति कल्याण राय सुराना ने मोहम्मडन लॉ यानी मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के प्रावधानों का बारीकी से विश्लेषण किया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम कानून के तहत एक बड़ा भाई केवल अपने पारिवारिक रिश्ते के आधार पर अपने नाबालिग भाई-बहनों का प्राकृतिक या कानूनी गार्जियन नहीं बन जाता।

अदालत ने कहा, "नागर अली को उनके चार छोटे भाई-बहनों का अभिभावक मानकर ज़मीन बेचने की इजाजत नहीं दी जा सकती।" इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के उस निष्कर्ष से सहमति जताई कि 4/5 हिस्से की बिक्री विलेख की शुरुआत में कानूनी त्रुटि थी।

30 वर्षों के अनवरत कब्ज़े का साक्ष्य

कानूनी त्रुटि के बावजूद हाईकोर्ट ने माना कि तरुबाला साहा लगभग 30 से 33 वर्षों तक उस ज़मीन पर बिना किसी रुकावट के काबिज रहीं। महिला ने अदालत में उन बटाईदारों (अधियार) की गवाही पेश की जो उनके लिए ज़मीन पर खेती करते थे। साक्ष्य देने वाले गवाहों (PW-1, PW-3 और PW-5) की जिरह के दौरान प्रतिवादी पक्ष उनकी गवाही को गलत साबित करने में विफल रहा।

अदालत ने कहा कि चूंकि खरीदार ने साक्ष्यों के माध्यम से यह साबित कर दिया कि उसने खरीद के बाद से बटाईदारों के ज़रिए ज़मीन पर अपना कब्ज़ा बनाए रखा था और प्रतिवादियों ने वयस्क होने के बाद भी दशकों तक कोई कानूनी कदम नहीं उठाया, इसलिए अब इतने वर्षों बाद मालिकाना हक को चुनौती देकर महिला को बेदखल नहीं किया जा सकता। इस प्रकार हाईकोर्ट ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाते हुए अपील खारिज कर दी।

सवाल-जवाब

गौहाटी हाईकोर्ट ने 1975 के ज़मीन सौदे पर क्या फैसला दिया?
हाईकोर्ट ने महिला खरीदार तरुबाला साहा के मालिकाना हक को बरकरार रखा और 30 साल से अधिक समय तक निर्बाध कब्ज़ा होने के कारण परिजनों की चुनौती को खारिज कर दिया।
क्या बड़ा भाई नाबालिग भाई-बहनों की संपत्ति बेच सकता है?
मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के अनुसार, बड़ा भाई केवल रिश्ते के आधार पर नाबालिगों का कानूनी संरक्षक नहीं बनता और कोर्ट की अनुमति के बिना उनकी संपत्ति नहीं बेच सकता।
महिला ने ज़मीन पर अपना कब्ज़ा अदालत में कैसे साबित किया?
महिला ने अदालत में राजस्व रिकॉर्ड और अपने बटाईदारों (अधियार) की गवाहियां पेश कीं, जो दशकों से उनके लिए उस ज़मीन पर खेती कर रहे थे।
परिजनों का दावा अदालत में क्यों खारिज हुआ?
परिजनों ने बालिग होने के बाद भी 30 वर्षों से अधिक समय तक बिक्री को चुनौती नहीं दी, इसलिए अत्यधिक देरी के आधार पर उनका दावा खारिज कर दिया गया।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·27 मिनट पहले

यह फैसला भूमि मामलों में 'कानूनी सीमा अधिनियम' और 'लंबे समय के निर्बाध कब्जे' के महत्व को रेखांकित करता है। यद्यपि मूल बिक्री में कानूनी खामी थी, लेकिन तीन दशकों की चुप्पी ने स्वतः ही खरीदार के पक्ष में कानूनी सुरक्षा कवच तैयार कर दिया। इस फैसले से उन हजारों पुराने संपत्ति विवादों को नई दिशा मिलेगी, जहां तकनीकी कमियों का हवाला देकर दशकों बाद मालिकाना हक चुनौती दिए जाते हैं। आने वाले समय में यह न्यायदृष्टि अदालतों में लंबित प्राचीन दीवानी मुकदमों के निपटारे में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगी।

Ravikash Gupta@ravikash·26 मिनट पहले

यह न्यायिक नज़रिया भारतीय संपत्ति बाज़ार और रियल एस्टेट निवेश के लिए एक बड़ा सुरक्षा चक्र है। जब भूमि सौदों में दशकों पुराने तकनीकी दांव-पेंचों को इस तरह नकारा जाता है, तो कॉरपोरेट और व्यक्तिगत खरीदारों का डिजिटल ज़मीन अभिलेखों और निवेश पर भरोसा मजबूत होता है। आर्थिक और वित्तीय सुरक्षा की दृष्टि से यह अनिश्चितता को दूर कर दीर्घकालिक निवेश को स्थिरता प्रदान करेगा।

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