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घाघरा नदी में समा गई थी 25 बीघा ज़मीन, 75 साल के राम समूच 25 वर्षों से हर सुबह किनारे बैठकर मांग रहे अपना खेतउत्तर प्रदेश
28 अग॰ 2026, 11:19 am (1 घंटे पहले)· 2

घाघरा नदी में समा गई थी 25 बीघा ज़मीन, 75 साल के राम समूच 25 वर्षों से हर सुबह किनारे बैठकर मांग रहे अपना खेत

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में घाघरा नदी की कटान में 25 बीघा खेत गंवाने वाले 75 वर्षीय बुजुर्ग राम समूच पिछले 25 सालों से हर रोज नदी किनारे जाकर अपनी जमीन वापस लौटाने की प्रार्थना कर रहे हैं।

बहराइच जिले के महसी क्षेत्र में घाघरा नदी के तट पर सुबह की पहली किरण के साथ एक बुजुर्ग रोज बैठकर जलधारा को निहारते दिखाई देते हैं। 75 वर्षीय राम समूच की कमर भले ही उम्र के पड़ाव पर झुक चुकी हो, लेकिन उनकी उम्मीद आज भी वैसी ही मजबूत है जैसी ढाई दशक पहले थी। करीब 25 साल पहले घाघरा नदी ने विकराल रूप धारण करके उनकी लहलहाती 25 बीघा जमीन को अपने आगोश में ले लिया था। अपनी आंखों के सामने जीवन भर की कमाई और आजीविका का साधन नदी में लीन होते देखने के बाद भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी। आज भी वे हर सुबह नदी तट पर पहुंचकर यही प्रार्थना करते हैं कि नदी उन्हें उनका खेत वापस लौटा दे।

25 बीघा लहलहाती ज़मीन और 25 सालों का अविरल इंतज़ार

बहराइच के महसी तहसील के अंतर्गत आने वाला जानकीनगर गांव हर साल कुदरत की मार झेलने को मजबूर रहता है। इसी गांव के रहने वाले राम समूच के पास कभी 25 बीघा उपजाऊ कृषि भूमि हुआ करती थी। इस खेत में वे गेहूं, गन्ना और दलहन की फसलों की खेती किया करते थे। इस खेती से उनका परिवार बेहद खुशी और सम्मान के साथ जीवन यापन कर रहा था। हालांकि, 25 वर्ष पूर्व मानसून के मौसम में घाघरा नदी में आई भीषण बाढ़ और कटान ने सबकुछ बदल कर रख दिया। नदी के तेज बहाव ने देखते ही देखते उनकी पूरी 25 बीघा जमीन काटकर जलमग्न कर दी। खेत के विलीन होते ही परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो गई और हंसता-खेलता परिवार दयनीय हालात में पहुंच गया।

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झुकी हुई कमर, अटूट आस्था और गंगा मैया से गुहार

ज़मीन छिन जाने के इतने लंबे समय बाद भी राम समूच के दिल में उम्मीद का दीया बुझा नहीं है। 75 साल की उम्र में जहां लोग शारीरिक रूप से कमजोर हो जाते हैं, वहीं वे रोज सुबह नियम से घाघरा नदी के तट पर पहुंचते हैं। नदी की शांत और अशांत उठती लहरों को देखते हुए वे बेहद भक्ति भाव से प्रार्थना करते हैं। वे श्रद्धापूर्वक नदी से यही पुकार लगाते हैं कि "गंगा मैया, मेरा खेत वापस दे दो।" उनका मानना है कि जिस नदी ने उनसे उनकी रोजी-रोटी छीनी है, वही एक दिन दया करके उनकी भूमि वापस लौटाएगी। पिछले 25 वर्षों से बिना किसी नागा के जारी उनकी यह प्रार्थना इलाके में चर्चा का विषय बनी हुई है।

महसी और जानकीनगर में हर साल कटान का कहर

बहराइच का जानकीनगर गांव घाघरा नदी के तटीय क्षेत्र में स्थित होने के कारण हर साल बाढ़ और भीषण कटान की समस्या से जूझता है। बरसात के मौसम में नदी का जलस्तर बढ़ते ही किनारे की उपजाऊ मिट्टी कट-कटकर पानी में समाने लगती है। इस आपदा के कारण जानकीनगर के दर्जनों परिवारों के मकान नदी के तेज बहाव में बह चुके हैं और सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि नदी का निवाला बन चुकी है। राम समूच की यह भावुक कहानी इस बात की गवाही देती है कि प्राकृतिक आपदाएं किस तरह आम ग्रामीण परिवारों के सपनों और आजीविका को पूरी तरह तबाह कर देती हैं। इसके बावजूद राम समूच का अटूट विश्वास और अविरल इंतजार पूरे क्षेत्र के लोगों के दिलों को झकझोर देता है।

सवाल-जवाब

राम समूच कौन हैं और वे कहाँ के रहने वाले हैं?
राम समूच 75 वर्ष के बुजुर्ग किसान हैं, जो उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के महसी क्षेत्र स्थित जानकीनगर गांव के निवासी हैं।
घाघरा नदी ने राम समूच का कितना खेत निगल लिया था?
घाघरा नदी की भयंकर कटान में राम समूच का 25 बीघा उपजाऊ खेत समा गया था।
राम समूच का खेत नदी में कब समाया था?
यह घटना लगभग 25 साल पहले घटी थी, जब नदी के तेज बहाव ने उनकी जमीन को लीन कर लिया था।
राम समूच के खेत में पहले कौन सी फसलें उगाई जाती थीं?
नदी में समाने से पहले राम समूच अपने 25 बीघा खेत में गेहूं, गन्ना और दलहन की खेती करते थे।
राम समूच पिछले 25 सालों से हर सुबह क्या करते हैं?
वे पिछले 25 वर्षों से हर सुबह घाघरा नदी के तट पर बैठकर "गंगा मैया, मेरा खेत वापस दे दो" की प्रार्थना करते हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·55 मिनट पहले

यह खबर केवल एक बुजुर्ग के भावनात्मक इंतजार की नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के तटीय इलाकों में हर साल होने वाले भूमि कटाव और प्रशासनिक उदासीनता का गंभीर कानूनी और सामाजिक मुद्दा है। बहराइच के महसी क्षेत्र में घाघरा नदी की कटान से प्रभावित किसानों के पुनर्वास, मुआवजा और भूमि स्वामित्व के कानूनी प्रावधानों पर तत्काल नीतिगत समीक्षा की आवश्यकता है, ताकि आपदा पीड़ितों को केवल प्रार्थना करने पर मजबूर न होना पड़े।

Rohan Verma@rohan-verma·55 मिनट पहले

बहराइच के महसी क्षेत्र में घाघरा की कटान से जानकीनगर जैसे गांवों में हर साल जो जमीन नदी में समाती है, उसका सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है। राम समूच का यह इंतजार सिर्फ व्यक्तिगत नहीं है, बल्कि यह जिला प्रशासन की नदी कटान रोधी परियोजनाओं की विफलता और स्थाई पुनर्वास नीति के अभाव को उजागर करता है। यदि समय रहते ठोकरों के निर्माण और तटबंधों की मजबूती पर ध्यान नहीं दिया गया, तो तटीय इलाकों के किसानों का अस्तित्व ऐसे ही संकट में रहेगा।

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