बहराइच जिले के महसी क्षेत्र में घाघरा नदी के तट पर सुबह की पहली किरण के साथ एक बुजुर्ग रोज बैठकर जलधारा को निहारते दिखाई देते हैं। 75 वर्षीय राम समूच की कमर भले ही उम्र के पड़ाव पर झुक चुकी हो, लेकिन उनकी उम्मीद आज भी वैसी ही मजबूत है जैसी ढाई दशक पहले थी। करीब 25 साल पहले घाघरा नदी ने विकराल रूप धारण करके उनकी लहलहाती 25 बीघा जमीन को अपने आगोश में ले लिया था। अपनी आंखों के सामने जीवन भर की कमाई और आजीविका का साधन नदी में लीन होते देखने के बाद भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी। आज भी वे हर सुबह नदी तट पर पहुंचकर यही प्रार्थना करते हैं कि नदी उन्हें उनका खेत वापस लौटा दे।
25 बीघा लहलहाती ज़मीन और 25 सालों का अविरल इंतज़ार
बहराइच के महसी तहसील के अंतर्गत आने वाला जानकीनगर गांव हर साल कुदरत की मार झेलने को मजबूर रहता है। इसी गांव के रहने वाले राम समूच के पास कभी 25 बीघा उपजाऊ कृषि भूमि हुआ करती थी। इस खेत में वे गेहूं, गन्ना और दलहन की फसलों की खेती किया करते थे। इस खेती से उनका परिवार बेहद खुशी और सम्मान के साथ जीवन यापन कर रहा था। हालांकि, 25 वर्ष पूर्व मानसून के मौसम में घाघरा नदी में आई भीषण बाढ़ और कटान ने सबकुछ बदल कर रख दिया। नदी के तेज बहाव ने देखते ही देखते उनकी पूरी 25 बीघा जमीन काटकर जलमग्न कर दी। खेत के विलीन होते ही परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो गई और हंसता-खेलता परिवार दयनीय हालात में पहुंच गया।
झुकी हुई कमर, अटूट आस्था और गंगा मैया से गुहार
ज़मीन छिन जाने के इतने लंबे समय बाद भी राम समूच के दिल में उम्मीद का दीया बुझा नहीं है। 75 साल की उम्र में जहां लोग शारीरिक रूप से कमजोर हो जाते हैं, वहीं वे रोज सुबह नियम से घाघरा नदी के तट पर पहुंचते हैं। नदी की शांत और अशांत उठती लहरों को देखते हुए वे बेहद भक्ति भाव से प्रार्थना करते हैं। वे श्रद्धापूर्वक नदी से यही पुकार लगाते हैं कि "गंगा मैया, मेरा खेत वापस दे दो।" उनका मानना है कि जिस नदी ने उनसे उनकी रोजी-रोटी छीनी है, वही एक दिन दया करके उनकी भूमि वापस लौटाएगी। पिछले 25 वर्षों से बिना किसी नागा के जारी उनकी यह प्रार्थना इलाके में चर्चा का विषय बनी हुई है।
महसी और जानकीनगर में हर साल कटान का कहर
बहराइच का जानकीनगर गांव घाघरा नदी के तटीय क्षेत्र में स्थित होने के कारण हर साल बाढ़ और भीषण कटान की समस्या से जूझता है। बरसात के मौसम में नदी का जलस्तर बढ़ते ही किनारे की उपजाऊ मिट्टी कट-कटकर पानी में समाने लगती है। इस आपदा के कारण जानकीनगर के दर्जनों परिवारों के मकान नदी के तेज बहाव में बह चुके हैं और सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि नदी का निवाला बन चुकी है। राम समूच की यह भावुक कहानी इस बात की गवाही देती है कि प्राकृतिक आपदाएं किस तरह आम ग्रामीण परिवारों के सपनों और आजीविका को पूरी तरह तबाह कर देती हैं। इसके बावजूद राम समूच का अटूट विश्वास और अविरल इंतजार पूरे क्षेत्र के लोगों के दिलों को झकझोर देता है।





















