केरल का वायनाड एक बार फिर भूस्खलन के खतरे की वजह से सुर्खियों में है, वहीं दूसरी ओर महाराष्ट्र के कई शहर बीते कई दिनों की मूसलाधार बारिश से पूरी तरह ठप पड़ गए हैं। पुणे में एक दो मंजिला इमारत चंद सेकंडों में ढह गई, तो मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर बना करीब 7 हजार करोड़ रुपये का मिसिंग लिंक प्रोजेक्ट उद्घाटन के महज दो महीने बाद ही भूस्खलन की चपेट में आ गया।
वायनाड की जमीन ही है खतरे की जड़
वायनाड केरल के उत्तर-पूर्व हिस्से में बसा है और राज्य का इकलौता पठारी इलाका है, यानी यहां मिट्टी-पत्थर के ऊंचे-नीचे टीलों पर पेड़-पौधे उगे हुए हैं। यही उबड़-खाबड़ भौगोलिक बनावट वायनाड को बाकी केरल से अलग और ज्यादा संवेदनशील बनाती है। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की 2021 की रिपोर्ट बताती है कि केरल का 43% हिस्सा भूस्खलन की चपेट में आ सकता है। वायनाड में तो हालात और गंभीर हैं क्योंकि यहां की 51% जमीन पहाड़ी ढलानों पर बसी है, जिससे भूस्खलन की आशंका पूरे साल बनी रहती है, खासकर मानसून के महीनों में यह खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
दो साल पहले और छह साल पहले की तबाही
वायनाड में सबसे बड़ा भूस्खलन हादसा दो साल पहले हुआ था। 30 जुलाई 2024 की रात करीब 2 बजे से 4 बजे के बीच मुंडक्कई, चूरलमाला, अट्टामाला और नूलपुझा गांवों में एक के बाद एक भूस्खलन हुए, जिनमें 400 से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी। इससे पहले 2019 में भी भारी बारिश के चलते इन्हीं इलाकों में भूस्खलन हुआ था, जिसमें 17 लोगों की मौत हुई और 52 घर पूरी तरह तबाह हो गए थे। सिर्फ बारिश ही इसकी वजह नहीं है, सड़क निर्माण, सुरंग खोदने, बांध बनाने, खनन और जंगलों की कटाई जैसी इंसानी गतिविधियां भी वायनाड में भूस्खलन का खतरा लगातार बढ़ाती जा रही हैं।
महाराष्ट्र में बारिश ने मचाई तबाही
इधर महाराष्ट्र में पिछले कई दिनों से लगातार हो रही बारिश ने आम जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। रिहायशी इलाके पानी में डूबे नजर आ रहे हैं, सड़कें तालाब का रूप ले चुकी हैं और घरों के बाहर खड़ी गाड़ियां पानी में तैरती दिख रही हैं। मुंबई और आसपास के इलाकों में रेलवे ट्रैक तक बारिश के पानी में डूब गए हैं, जिससे लोकल ट्रेनों की रफ्तार पर पूरी तरह ब्रेक लग गया है। जो ट्रेनें किसी तरह चल भी रही हैं, वे ट्रैक पर तैरती हुई सी नजर आ रही हैं, जिससे रोजाना सफर करने वाले लाखों लोगों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
पुणे में सेकंडों में ढह गई दो मंजिला इमारत
इसी बारिश के तांडव के बीच पुणे में एक दो मंजिला मकान चंद सेकंडों में ताश के पत्तों की तरह भरभराकर ढह गया और वहां से धूल का बड़ा गुबार उठता दिखाई दिया। राहत की बात यह रही कि लगातार बारिश से कमजोर हो चुकी इस इमारत को पहले ही खाली करवा लिया गया था, इसलिए बड़ा जानी नुकसान टल गया।
नालासोपारा, वसई और विरार में हर तरफ पानी ही पानी
मुंबई महानगर क्षेत्र के नालासोपारा इलाके में हर तरफ पानी भरा नजर आ रहा है और रेलवे ट्रैक पूरी तरह पानी में डूब चुके हैं। ट्रैक पर पानी भर जाने की वजह से इस रूट पर चलने वाली ज्यादातर लोकल ट्रेनें रोकनी पड़ी हैं, जिससे लोग मजबूरन पैदल ही ट्रैक पार कर रहे हैं। जो ट्रेनें चल रही हैं, वे भी बेहद धीमी रफ्तार से पानी में तैरती हुई सी आगे बढ़ रही हैं। सिर्फ नालासोपारा ही नहीं, वसई और विरार का भी यही हाल है, जहां घर और अपार्टमेंट पानी से घिरे नजर आ रहे हैं और वहां खड़ी गाड़ियां पानी में तैरती दिख रही हैं। सड़कों पर इतना पानी भर चुका है कि लोगों का पैदल चलना भी मुश्किल हो गया है, और दुकानें व रास्ते बंद होने से जरूरी सामान की भी किल्लत होने लगी है। वसई-विरार को जोड़ने वाले रेल रूट पर भी पानी भरने से लोगों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। गौरतलब है कि वसई-विरार को मुंबई से सटे पालघर जिले का सबसे बड़ा रिहायशी और व्यावसायिक केंद्र माना जाता है, इसलिए यहां का बंद पड़ना पूरे इलाके की रफ्तार पर असर डालता है।
7 हजार करोड़ की सुरंग भी बारिश के आगे नहीं टिकी
भारी बारिश के आगे मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे का एक हिस्सा भी घुटने टेकता नजर आया, जिसकी वजह से एक्सप्रेसवे पर कई घंटों तक ट्रैफिक रोकना पड़ा। इसी साल 1 मई को मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर बने मिसिंग लिंक प्रोजेक्ट का उद्घाटन हुआ था, लेकिन लगातार बारिश के बीच हुए भूस्खलन ने इस मिसिंग लिंक की सुरंग को बंद करवा दिया। बड़े-बड़े पत्थर भरभराकर एक्सप्रेसवे पर गिरे, जिसके बाद पूरे एक्सप्रेसवे पर घंटों ट्रैफिक थमा रहा। इस मिसिंग लिंक प्रोजेक्ट को तैयार करने में करीब 7 हजार करोड़ रुपये की लागत आई थी और इसे इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना बताया गया था। लेकिन उद्घाटन के महज दो महीने बाद ही जब यह हिस्सा धंस गया, तो महाराष्ट्र स्टेट रोड डवेलपमेंट कॉर्पोरेशन ने इसे एक्ट ऑफ गॉड यानी प्राकृतिक आपदा बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया। जबकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि यहां सेफ्टी नेट सिर्फ 15 मीटर ऊंचाई तक ही लगाई गई थी, जबकि पत्थर करीब 150 मीटर ऊपर से गिरे, यानी प्रोजेक्ट की प्लानिंग में साफ गैप था। इस प्लानिंग की खामी का असर मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के दूसरे हिस्सों में भी दिखाई देता है, जहां भारी बारिश के बाद आसपास के खेतों का पानी सड़क पर भर जाता है और कई किलोमीटर लंबा जाम लग जाता है।











