सैन्य ताकत में क्रांतिकारी बदलाव की तैयारी
आधुनिक युद्ध के बदलते तौर-तरीकों ने रक्षा उपकरणों में नई तकनीकों की आवश्यकता को बहुत बढ़ा दिया है। आज के समय में बिना किसी सीमा को लांघे दुश्मन के ठिकानों को तबाह करने की क्षमता बेहद जरूरी हो चुकी है। हाल के वैश्विक संघर्षों, जैसे रूस, यूक्रेन और ईरान की जंग ने यह साबित किया है कि बिना जमीन पर कदम रखे भी सटीक हमले किए जा सकते हैं। इसके लिए मुख्य रूप से तीन चीजों की आवश्यकता होती है, जिसमें स्टेल्थ फाइटर जेट, लंबी दूरी की मिसाइलें और घातक ड्रोन शामिल हैं। अमेरिका और चीन जैसे देश इन क्षेत्रों में काफी आगे बढ़ चुके हैं, और अब भारत भी अपनी रणनीतिक ताकत को मजबूत करने के लिए पूरी ताकत से जुट गया है। इसी कड़ी में, भारत के रक्षा वैज्ञानिक अब अपनी सबसे खतरनाक BrahMos क्रूज मिसाइल के तीन नए वेरिएंट्स पर काम कर रहे हैं।
वर्तमान में BrahMos की अधिकतम मारक क्षमता लगभग 450 से 490 किलोमीटर के बीच है। वैज्ञानिकों का लक्ष्य इसे बढ़ाकर 1500 किलोमीटर तक पहुंचाना है। इसके साथ ही एक हाइपरसोनिक वेरिएंट पर भी काम चल रहा है, जिसकी रफ्तार Mach 5 यानी 7400 किलोमीटर प्रति घंटे से भी अधिक होगी। तीसरा वेरिएंट BrahMos-NG है, जो वजन में हल्का और आकार में छोटा होगा, जिससे यह वायुसेना के लिए बेहद अनुकूल बन जाएगा।
BrahMos-NG की खासियतें और बदलाव
TrendKia की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, भारत और रूस मिलकर समानांतर रूप से BrahMos के तीन नए रूपों को विकसित करने की योजना पर काम कर रहे हैं। सन 2001 में पहली बार परीक्षित की गई मूल BrahMos मिसाइल का वजन लगभग 3 टन है और यह Mach 2.8 की रफ्तार से उड़ान भर सकती है। इसे जमीन, पानी, हवा और पनडुब्बी, चारों जगहों से दागा जा सकता है। हालांकि, अपने भारी वजन के कारण इसे मुख्य रूप से Su-30MKI विमानों पर ही तैनात किया जा सका है।
इस सीमा को पार करने के लिए DRDO और BrahMos Aerospace मिलकर BrahMos-NG को विकसित कर रहे हैं। इस नई मिसाइल का वजन करीब 1.2 टन होगा, जो मूल मिसाइल से काफी कम है, और इसकी लंबाई भी लगभग 2 मीटर छोटी होगी। इसके बावजूद, यह मिसाइल Mach 5 तक की स्पीड हासिल करने में सक्षम होगी। अपने छोटे आकार के चलते इसे Tejas, Rafale और भविष्य के AMCA जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों में आसानी से लगाया जा सकेगा। इसके अलावा, नौसेना के युद्धपोतों, थल सेना के लॉन्चरों और मानवरहित UAV प्रणालियों में भी इसका उपयोग किया जा सकेगा। इसमें एडवांस AESA सीकर और बेहद कम रडार सिग्नेचर जैसी आधुनिक खूबियां शामिल होंगी।
स्वदेशी तकनीक पर जोर और परीक्षण का समय
BrahMos-NG के उड़ान परीक्षणों में थोड़ी देरी देखी गई है, क्योंकि भारत सरकार ने 'आत्मनिर्भर भारत' पहल के तहत इसके लिए कड़े मापदंड तय किए हैं। इसके तहत रूसी प्रोपल्शन सिस्टम पर निर्भरता को कम करते हुए पूरी तरह स्वदेशी लिक्विड-फ्यूल रैमजेट तकनीक को मिसाइल में जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। रक्षा सूत्रों के मुताबिक, इसके परीक्षण वर्ष 2027 के आसपास शुरू होने की उम्मीद है।
इसके अलावा, भारत का हाइपरसोनिक परियोजना पर काम भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। Mach 5 से अधिक की गति होने के कारण किसी भी आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम के लिए इस मिसाइल को रोक पाना लगभग असंभव हो जाएगा। यह प्रोजेक्ट भारत के अपने हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल और एडवांस मिसाइल अनुसंधान कार्यक्रम का हिस्सा है।
1500 किलोमीटर की मारक क्षमता और सेना की योजनाएं
इस पूरे प्रोजेक्ट में सबसे बड़ा बदलाव 1500 किलोमीटर की रेंज वाले वेरिएंट को माना जा रहा है। इस सफलता के बाद BrahMos एक मजबूत सामरिक पारंपरिक प्रतिरोधक के रूप में स्थापित हो जाएगी, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दूर बैठे दुश्मनों को भी निशाना बना सकेगी। TrendKia की रिपोर्ट के अनुसार, इसमें 800 किलोमीटर रेंज वाले संस्करण और P-75I कार्यक्रम के तहत पनडुब्बी से लॉन्च होने वाले वेरिएंट पर भी नजरें हैं।
इन सभी नए वेरिएंट्स में मुख्य ध्यान लागत कम करने और स्वदेशीकरण पर है। BrahMos Aerospace का मानना है कि नए संस्करणों की लागत मौजूदा मिसाइलों से करीब 20 प्रतिशत कम हो जाएगी। स्वदेशी बूस्टर और वारहेड के परीक्षण पहले ही सफल हो चुके हैं। भारतीय वायुसेना ने करीब 400 BrahMos-NG मिसाइलों की मांग की है, जिसकी अनुमानित लागत 8,000 करोड़ रुपये आंकी गई है। यह कदम भारत की सैन्य प्रहार क्षमता को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा।













