पूर्वी हिमालय की सुरम्य वादियों और घने जंगलों के बीच बसी ग्लॉ झील ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। अरुणाचल प्रदेश में स्थित इस सुरम्य जल निकाय को भारत की 101वीं रामसर साइट का आधिकारिक दर्जा प्रदान किया गया है। यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि ग्लॉ झील इस राज्य की पहली ऐसी आर्द्रभूमि है जिसे इस प्रतिष्ठित वैश्विक सूची में स्थान मिला है। इस मनमोहक झील तक पहुंचने के लिए पर्यटकों और प्रकृति प्रेमियों को दुर्गम पहाड़ी रास्तों और घने जंगलों से होकर 20 किलोमीटर की पैदल यात्रा तय करनी पड़ती है, जिसके बाद ही कुदरत का यह अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है।
रामसर साइट का दर्जा और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कदम
पर्यावरण के दृष्टिकोण से किसी भी जल निकाय को रामसर साइट का दर्जा मिलना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह मान्यता 1971 में ईरान के रामसर शहर में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के तहत अस्तित्व में आई थी, जहां वैश्विक समुदाय ने महत्वपूर्ण दलदली इलाकों और झीलों के संरक्षण का संकल्प लिया था। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने 3 अगस्त को इस बात की आधिकारिक घोषणा की। उन्होंने बताया कि इस प्राकृतिक धरोहर को रामसर साइट का दर्जा मिलने से जैव विविधता के संरक्षण, जल सुरक्षा को मजबूत करने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में दूरगामी मदद मिलेगी। इसके अतिरिक्त, केंद्रीय मंत्री ने आंकड़े साझा करते हुए कहा कि वर्ष 2014 तक देश में केवल 26 रामसर स्थल थे, लेकिन पिछले 12 वर्षों के निरंतर प्रयासों से यह संख्या बढ़कर 101 तक पहुंच गई है।
कमलंग अभयारण्य का प्राकृतिक परिवेश और समृद्ध वन्यजीवन
ग्लॉ झील न केवल एक आकर्षक पर्यटन स्थल है, बल्कि यह पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पहाड़ी नालों के निरंतर प्रवाह से भरने वाली यह झील चारों ओर से अत्यंत घने वनस्पतियों से घिरी हुई है। इस क्षेत्र में 150 से अधिक प्रजातियों के पेड़-पौधे और 49 प्रकार के दुर्लभ ऑर्किड पाए जाते हैं। भौगोलिक रूप से यह झील कमलंग वन्यजीव अभयारण्य के संरक्षित दायरे में आती है। इसके कारण यहां विविध वन्यजीवों का आवास है, जिनमें हाथी, तेंदुआ बिल्ली, जंगली सूअर, हिरण, विशाल गिलहरी और हवा में तैरने वाली उड़ने वाली गिलहरी शामिल हैं। इस स्थान के समीप ही पवित्र तीर्थ स्थल परशुराम कुंड भी स्थित है, जिससे यहां आने वाले यात्रियों को अध्यात्म के साथ-साथ शुद्ध प्राकृतिक वातावरण का अनुभव प्राप्त होता है।
मिश्मी जनजाति की मान्यताएं और झील के अनोखे रहस्य
स्थानीय मिश्मी समुदाय के बीच ग्लॉ झील को लेकर कई दिलचस्प और प्राचीन लोक मान्यताएं प्रचलित हैं। स्थानीय लोग मानते हैं कि इस झील में चार दिव्य देवता निवास करते हैं, जिनमें दो पुरुष और दो महिला देवता शामिल हैं, जो इस पूरे क्षेत्र और यात्रियों की रक्षा करते हैं। क्षेत्र में प्रचलित जनश्रुति के अनुसार इस झील के जल में कोई भी व्यक्ति कभी नहीं डूबता। एक और आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि चारों तरफ विशाल वृक्ष और घने जंगल होने के बावजूद झील के साफ पानी की सतह पर कभी भी सूखे पत्ते या टहनियां तैरती हुई दिखाई नहीं देतीं। इसके अलावा, यहां पहली बार कदम रखने वाले पर्यटकों का स्वागत अक्सर हल्की प्राकृतिक बारिश की बौछारों के साथ होता है।
भ्रमण की योजना और सबसे अनुकूल मौसम
यदि आप एकांत, घने जंगलों की हरियाली और रहस्यमयी लोक कथाओं में रुचि रखते हैं, तो यह झील आपके लिए एक आदर्श गंतव्य है। ग्लॉ झील की यात्रा के लिए सबसे सुहावना समय अक्टूबर से अप्रैल के महीनों के बीच माना जाता है। इस अवधि के दौरान पूर्वी हिमालयी क्षेत्र का मौसम काफी अनुकूल रहता है और 20 किलोमीटर का कठिन पैदल रास्ता पार करना भी अपेक्षाकृत आसान होता है। इस मौसम में यात्री बिना किसी कठिनाई के यहां की अलौकिक सुंदरता का आनंद ले सकते हैं।


















