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आजादी के दौर की पाक कला और खास स्वाद, दून के इस पारंपरिक आटा बिस्किट के मुरीद हैं दिग्गजउत्तराखंड
21 सित॰ 2026, 7:54 pm (12 घंटे पहले)· 1

आजादी के दौर की पाक कला और खास स्वाद, दून के इस पारंपरिक आटा बिस्किट के मुरीद हैं दिग्गज

देहरादून के पलटन बाजार स्थित ऐतिहासिक सनराइज बेकर्स के आटा बिस्किट और रस्क आज भी दशकों पुराने स्वाद को सहेजे हुए हैं। विभाजन के समय सीमा पार से आई इस पारंपरिक रेसिपी के मुरीद आम नागरिकों के साथ महेंद्र सिंह धोनी भी हैं।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की आबोहवा जितनी सुकून देने वाली है, उतनी ही समृद्ध यहां की खानपान संस्कृति भी रही है। शहर के प्रसिद्ध पलटन बाजार की घोसी गली में स्थित सनराइज बेकरी आज भी स्वतंत्रता संग्राम के दौर की बेकिंग विरासत को संजोए हुए है। सन 1947 से चली आ रही इस प्रतिष्ठित दुकान के तैयार किए गए बेकरी उत्पाद न सिर्फ स्थानीय बाशिंदों के पसंदीदा हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को पार कर सुदूर देशों तक अपनी महक बिखेर रहे हैं। ब्रिटिश हुकूमत के दौर में अंग्रेज अफसर भी इस खास जायके के कायल हुआ करते थे, और बदलते समय के बावजूद इस पारंपरिक स्वाद की पहचान वैसी ही बनी हुई है।

विभाजन की दास्तान और सीमा पार से आया बेकिंग हुनर

इस बेकरी की नींव के पीछे विभाजन की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि जुड़ी हुई है। दुकान के वर्तमान संचालक जगजीत सिंह के अनुसार, उनके पिता विभाजन के बाद पाकिस्तान से पलायन कर देहरादून में आ बसे थे। उन्होंने पाकिस्तान में ही बिस्कुट, रस्क और पारंपरिक खताई तैयार करने का काम सीखा था। जब वे विस्थापित होकर भारत आए, तो अपने साथ वही समृद्ध पाक कला, पारंपरिक हुनर और खास रेसिपी लेकर पहुंचे। इस कौशल को उन्होंने देहरादून में बेकिंग के रूप में स्थापित किया, जो धीरे-धीरे इस पहाड़ी शहर की विशिष्ट पहचान बन गया।

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8 आने की बनवाई से 150 रुपये के पैकेट तक का सफर

दुकान की शुरुआती कार्यप्रणाली की यादें साझा करते हुए जगजीत सिंह बताते हैं कि शुरुआती दौर में कामकाज का तरीका आज से बिल्कुल अलग था। उस जमाने में ग्राहक अपने घरों से खुद मैदा, चीनी और दूध जैसी जरूरी सामग्रियां लेकर दुकान पर पहुंचते थे। बेकरी में केवल उनकी बनवाई का मामूली शुल्क लिया जाता था और तैयार बिस्किट व रस्क कागज के साधारण लिफाफों में दिए जाते थे, जिसकी लागत उस वक्त मात्र 8 आने हुआ करती थी। दशकों के लंबे सफर के बाद आज रस्क के एक पैकेट का मूल्य 150 रुपये हो चुका है, परंतु गुणवत्ता, सादगी और शुद्धता के मानकों से कोई समझौता नहीं किया गया है।

सात समंदर पार मांग और नामचीन हस्तियों की पहली पसंद

सनराइज बेकर्स के आटा बिस्किट और रस्क की सादगी, कुरकुरापन और देसी स्वाद का दायरा अब केवल भारत तक सीमित नहीं है। यहां तैयार होने वाले उत्पाद नियमित रूप से अमेरिका, कनाडा, जर्मनी और जापान जैसे देशों में रहने वाले ग्राहकों तक भिजवाए जाते हैं। आम जनता और प्रवासी भारतीयों के साथ-साथ यह स्थान मशहूर हस्तियों की भी पसंदीदा सूची में शामिल है। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और उनकी पत्नी साक्षी धोनी जब भी देहरादून के दौरे पर होते हैं, तो वे यहां के मशहूर आटा बिस्किट और रस्क अपने साथ ले जाना कभी नहीं भूलते। आधुनिक मशीनीकरण के दौर में भी पारंपरिक भट्टी और पुरानी रेसिपी के प्रति समर्पण ही इस स्वाद को अमर बनाए हुए है।

सवाल-जवाब

सनराइज बेकरी देहरादून में कहां स्थित है?
यह ऐतिहासिक बेकरी देहरादून के प्रसिद्ध पलटन बाजार की घोसी गली में स्थित है।
इस बेकरी की शुरुआत कब हुई थी?
इस बेकरी की स्थापना विभाजन के दौर में वर्ष 1947 में हुई थी।
बेकरी के बिस्किट और रस्क की रेसिपी कहां से आई थी?
दुकान के संचालक जगजीत सिंह के पिता विभाजन के समय पाकिस्तान से यह पारंपरिक रेसिपी और हुनर देहरादून लेकर आए थे।
शुरुआती दौर में यहां बिस्किट और रस्क बनवाने की लागत क्या थी?
शुरुआती समय में लोग अपनी सामग्री खुद लाते थे और उनसे लिफाफे में बिस्किट तैयार करने के लिए केवल 8 आने बनवाई ली जाती थी।
वर्तमान में यहां रस्क के एक पैकेट की कीमत कितनी है?
वर्तमान समय में सनराइज बेकर्स पर रस्क के एक पैकेट की कीमत 150 रुपये है।
किन विदेशी देशों में इस बेकरी के उत्पाद भेजे जाते हैं?
यहां के बने बिस्किट और रस्क अमेरिका, कनाडा, जर्मनी और जापान जैसे देशों में भेजे जाते हैं।
कौन से प्रसिद्ध क्रिकेट व्यक्तित्व इस बेकरी के उत्पादों के दीवाने हैं?
भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और उनकी पत्नी साक्षी धोनी जब भी देहरादून आते हैं, तो यहां के बिस्किट और रस्क जरूर ले जाते हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ravikash Gupta@ravikash·10 घंटे पहले

यह ऐतिहासिक बेकरी दर्शाती है कि कैसे पारंपरिक खाद्य व्यवसाय आधुनिक एमएसएमई (MSME) और डिजिटल सप्लाई चेन के दौर में भी अपनी सांस्कृतिक विरासत के दम पर वैश्विक स्तर पर पहुंच बना सकते हैं। अमेरिका, कनाडा और जर्मनी जैसे देशों में इनके उत्पादों की मांग यह साबित करती है कि प्रामाणिक देसी जायके और पुरानी रेसिपी में मजबूत ब्रांड वैल्यू छिपी है, जो आगे चलकर इसे एक बड़े कंज्यूमर ब्रांड में बदल सकती है।

Sandeep Yadav@sandeep-yadav·10 घंटे पहले

रविकाश गुप्ता के इस विश्लेषण को खेल और फिटनेस की दुनिया से जोड़ते हुए देखा जाए तो एमएसएमई सेक्टर की यह सफलता यह साबित करती है कि पारंपरिक और शुद्ध खाद्य पदार्थों की मांग अब वैश्विक स्तर पर शीर्ष एथलीटों की जीवनशैली का हिस्सा बन चुकी है। जिस तरह महेंद्र सिंह धोनी जैसे दिग्गज खिलाड़ी देहरादून दौरे पर इन उत्पादों को चुनते हैं, वह स्पष्ट करता है कि अंतरराष्ट्रीय खेल पटल पर अनुशासन और फिटनेस बनाए रखने वाले सितारे भी अपनी डाइट में शुद्धता और पारंपरिक विरासत को प्राथमिकता देते हैं। यह ट्रेंड आने वाले समय में छोटे बेकरी उद्योगों को वैश्विक स्पोर्ट्स न्यूट्रिशन और एथलीट टूरिज्म के साथ जोड़ने का एक अनूठा मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·11 घंटे पहले

यह रिपोर्ट केवल एक बेकरी की कहानी नहीं है, बल्कि विभाजन के दर्द और सांस्कृतिक जड़ों के संरक्षण का एक जीवंत राजनीतिक दस्तावेज है। पाकिस्तान से विस्थापन के बाद किस प्रकार शरणार्थियों ने अपनी कला और मेहनत से भारत की स्थानीय अर्थव्यवस्था और खानपान संस्कृति को समृद्ध किया, यह उसका एक अनूठा उदाहरण है। हालांकि, आज के भू-राजनीतिक माहौल में जहां सीमा पार के संबंधों में लगातार तनाव बना रहता है, इस तरह की ऐतिहासिक विरासतें लोगों को मानवीय स्तर पर जोड़ने का काम करती हैं। भविष्य में ऐसी पारंपरिक और पारिवारिक इकाइयों को एमएसएमई नीतियों के तहत संरक्षित करने की आवश्यकता है ताकि वे वैश्वीकरण के दबाव में दम न तोड़ें।

Rohan Verma@rohan-verma·11 घंटे पहले

यह खबर दर्शाती है कि कैसे पारंपरिक खाद्य व्यवसाय और सांस्कृतिक विरासत आपस में जुड़े हुए हैं। 1947 के विभाजन की पृष्ठभूमि से जुड़े इस संस्थान ने आधुनिक मशीनीकरण के दौर में भी अपनी पारंपरिक भट्टी और पुरानी रेसिपी को जीवित रखा है। स्थानीय स्तर से शुरू होकर अमेरिका, कनाडा, जर्मनी और जापान तक पहुंचना और महेंद्र सिंह धोनी जैसे दिग्गजों को आकर्षित करना यह साबित करता है कि गुणवत्ता और सादगी समय की सीमाओं से परे होती है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·11 घंटे पहले

क्राइम और सुरक्षा मामलों के विश्लेषक के रूप में, यह कहानी केवल खानपान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विस्थापन के दौर के सामाजिक ताने-बाने और आर्थिक सहनशीलता का दस्तावेज है। जब कोई विरासत बिना किसी औपचारिक सुरक्षा या ब्रांडिंग के सात दशकों से अधिक समय तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रामाणिकता बनाए रखती है, तो यह उपभोक्ता संरक्षण और खाद्य सुरक्षा के पारंपरिक मानकों को भी उजागर करती है। आधुनिक खाद्य उद्योग में मिलावट और विज्ञापनों के बीच, इस तरह के पारिवारिक और पारंपरिक व्यवसाय इस बात का प्रमाण हैं कि पारदर्शी और बिना मिलावट की आपूर्ति श्रृंखला ग्राहकों का अटूट भरोसा कैसे जीतती है।

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