अमेरिका के वरिष्ठ राजनयिक और दक्षिण-मध्य एशियाई मामलों के विशेष दूत सर्जियो गोर की हालिया कश्मीर यात्रा ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में एक नई वैश्विक बहस छेड़ दी है। श्रीनगर पहुंचे अमेरिकी दूत ने जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से एक उच्चस्तरीय द्विपक्षीय बैठक की और इसके बाद पत्रकारों व सार्वजनिक मंचों पर जम्मू-कश्मीर को भारत का अत्यंत महत्वपूर्ण और अभिन्न हिस्सा करार दिया। यह वक्तव्य भले ही बेहद संक्षेप में दिया गया था, लेकिन इसका कूटनीतिक प्रभाव बेहद व्यापक, दूरगामी और रणनीतिक माना जा रहा है। इस स्पष्ट बयान के सामने आते ही पड़ोसी देश पाकिस्तान में तीव्र राजनीतिक हलचल देखने को मिली, जहां सरकार ने तुरंत अमेरिकी राजनयिक को इस्लामाबाद में तलब करके अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि सर्जियो गोर की इस आधिकारिक टिप्पणी का दायरा केवल इस्लामाबाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार सीधे चीन की राजधानी बीजिंग से भी जुड़ते हैं। जम्मू-कश्मीर का संपूर्ण विवाद सिर्फ पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर तक सीमित नहीं है, बल्कि अक्साई चीन और वहां चीन की दीर्घकालिक सैन्य व बुनियादी मौजूदगी भी इस पूरे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऊपर से भले ही अमेरिका और चीन के बीच सब कुछ सामान्य दिखता हो, लेकिन अंदरखाने दोनों महाशक्तियों के बीच भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और तनाव हमेशा बना रहा है।
श्रीनगर में द्विपक्षीय बैठक और आर्थिक साझेदारी पर जोर
सर्जियो गोर का यह महत्वपूर्ण बयान ऐसे समय में सामने आया है जब दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व में कई नए समीकरण आकार ले रहे हैं। विशेष रूप से ईरान और अमेरिका के बीच हालिया संघर्ष के दौरान पाकिस्तान की भूमिका के बाद वॉशिंगटन और इस्लामाबाद के बीच उच्चस्तरीय संपर्कों में तेजी देखी गई थी। ऐसे जटिल कूटनीतिक माहौल के बीच अमेरिकी राजदूत का स्वयं श्रीनगर आना और भारत की प्रादेशिक संप्रभुता के पक्ष में इतना स्पष्ट वक्तव्य देना रणनीतिक नजरिया रखने वाले विश्लेषकों के लिए बेहद मायने रखता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि सर्जियो गोर का यह दौरा केवल एक औपचारिक या शिष्टाचार भेंट तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के साथ कई प्रमुख प्रशासनिक और विकासशील विषयों पर गहन चर्चा की। इस दौरान दोनों नेताओं ने व्यापारिक अवसरों, स्थानीय पर्यटन के विस्तार, बागवानी उद्योग और नई अर्थव्यवस्था के उभरते क्षेत्रों में भारत और अमेरिका के बीच सहयोग की संभावनाओं पर विचार-विमर्श किया। यानी इस संदेश में केवल रक्षा या सीमा सुरक्षा का पहलू ही शामिल नहीं है, बल्कि इसके साथ आर्थिक प्रगति, रोजगार सृजन और व्यापारिक साझेदारी का बड़ा एंगल भी पूरी मजबूती से जुड़ा हुआ है।
सकारात्मक माहौल और सोशल मीडिया के जरिए कूटनीतिक संदेश
श्रीनगर की अपनी पहली आधिकारिक यात्रा के दौरान अमेरिकी दूत ने क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता की दिल खोलकर तारीफ की। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के साथ आयोजित बैठक को अत्यंत सकारात्मक और रचनात्मक बताते हुए उन्होंने कहा कि दोनों देशों के मजबूत संबंधों को धरातल पर आगे बढ़ाने के लिए लगातार फॉलो-अप कदम उठाए जाएंगे। सर्जियो गोर ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट X पर भी इस मुलाकात की तस्वीरें साझा कीं और लिखा कि दोनों पक्षों ने आर्थिक सहयोग को अधिक सुदृढ़ बनाने और दोनों देशों के परस्पर लाभ वाले अवसरों की तलाश करने पर विस्तृत बात की है। दूसरी ओर, जम्मू-कश्मीर प्रशासन की ओर से भी यह बात प्रमुखता से सामने आई कि इस चर्चा में पर्यटन को पुनर्जीवित करने, स्थानीय फल व कृषि बागवानी को अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने और आधुनिक तकनीक आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने पर सहमति व्यक्त की गई है। श्रीनगर में हुई यह चर्चा स्पष्ट संकेत देती है कि वॉशिंगटन अब जम्मू-कश्मीर को केवल एक सुरक्षा विवाद के चश्मे से देखने के बजाय विकास और निवेश की अपार संभावनाओं वाले केंद्र के रूप में भी आंक रहा है।
इस्लामाबाद में अमेरिकी राजनयिक तलब, पाकिस्तान का रुख और पीओके का असंतोष
सर्जियो गोर की टिप्पणी सार्वजनिक होते ही पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय में हड़कंप मच गया। इस्लामाबाद ने तुरंत अमेरिकी दूतावास के प्रतिनिधि को तलब किया और अमेरिकी दूत द्वारा दिए गए बयान को तथ्यात्मक रूप से गलत करार दिया। पाकिस्तान ने दावा किया कि यह बयान वॉशिंगटन की पुरानी आधिकारिक नीति से मेल नहीं खाता है। इस्लामाबाद ऐतिहासिक रूप से जम्मू-कश्मीर को एक विवादित भूभाग बताता रहा है और अंतरराष्ट्रीय मंचों विशेषकर संयुक्त राष्ट्र के सीधे हस्तक्षेप की मांग करता आया है। इसके विपरीत भारत का स्पष्ट और अडिग रुख रहा है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का पूरी तरह से आंतरिक और अविभाज्य हिस्सा हैं और इस मुद्दे पर किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप या पाकिस्तान के दावों को नई दिल्ली पूरी तरह से खारिज करती है। ऐसे में अमेरिका के एक अत्यंत वरिष्ठ राजनयिक द्वारा भारत के पक्ष में स्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल करना पाकिस्तान के लिए एक बड़ा कूटनीतिक झटका माना जा रहा है। दिलचस्प बात यह भी है कि जिस समय इस्लामाबाद अमेरिका के सामने अपना विरोध दर्ज करा रहा है, उसी समय पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK में स्थानीय नागरिक अपनी ही पाकिस्तानी हुकूमत और सेना के खिलाफ सड़कों पर उतरकर उग्र प्रदर्शन कर रहे हैं।
चीन के लिए संदेश, अक्साई चीन का भूगोल और सीपेक परियोजनाएं
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे पेचीदा और महत्वपूर्ण पहलू चीन से जुड़ा हुआ है। भौगोलिक दृष्टिकोण से जम्मू-कश्मीर का मुद्दा केवल भारत और पाकिस्तान के बीच की सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी सीमाएं चीन तक फैली हुई हैं। भारत अक्साई चीन पर अपना ऐतिहासिक और कानूनी संप्रभु अधिकार मानता है, जबकि चीन ने वहां अवैध रूप से अपना नियंत्रण कायम कर रखा है। इसके अतिरिक्त, चीन ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के क्षेत्र में अरबों डॉलर का निवेश करके कई बड़ी ढांचागत परियोजनाएं स्थापित की हैं, जिनमें चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी CPEC सबसे प्रमुख है। यही मुख्य कारण है कि अमेरिकी राजदूत का 'जम्मू-कश्मीर भारत का अहम हिस्सा है' कहना केवल PoK या पाकिस्तान के लिए चेतावनी नहीं है, बल्कि इसमें अक्साई चीन और चीनी दखलअंदाजी का संदर्भ भी स्वतः शामिल हो जाता है। जब वॉशिंगटन का कोई जिम्मेदार राजनयिक भारत के क्षेत्रीय दावों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने वाली भाषा का प्रयोग करता है, तो इसका अर्थ यह निकाला जाता है कि अमेरिका भारत की क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन कर रहा है और चीन की विस्तारवादी गतिविधियों को खुली चुनौती दे रहा है।
5 अगस्त 2019 के बाद का बदला हुआ माहौल और ट्रैवल एडवाइजरी पर नजर
उल्लेखनीय है कि 5 अगस्त 2019 को भारत सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के विशेष प्रावधानों को समाप्त कर दिया था। इसके साथ ही राज्य को जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख नामक दो केंद्र शासित प्रदेशों में पुनर्गठित किया गया था। भारत सरकार सदैव यह दोहराती रही है कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े सभी प्रशासनिक और संवैधानिक बदलाव देश का आंतरिक मामला हैं। सर्जियो गोर की श्रीनगर यात्रा इसी बदले हुए नए प्रशासनिक और सुरक्षा वातावरण में संपन्न हुई है। अमेरिकी दूत ने क्षेत्र में बेहतर होती सुरक्षा स्थिति और सामान्य होते जनजीवन पर भी सकारात्मक टिप्पणी की। इसके अलावा, एक और अत्यंत महत्वपूर्ण बात यह सामने आ रही है कि अमेरिका द्वारा अपने नागरिकों के लिए जारी ट्रैवल एडवाइजरी की समीक्षा की जा सकती है। यदि वॉशिंगटन अपनी यात्रा चेतावनियों में ढील देता है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों और निवेशकों का भरोसा जागेगा, जिससे जम्मू-कश्मीर के पर्यटन और स्थानीय कारोबार को अभूतपूर्व गति मिलने की उम्मीद है।





















