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अंबाला में 100 साल पुरानी मिट्टी की विरासत: 75 वर्षीय देवराज और उनका परिवार पीढ़ियों से संजोए हुए हैं पुश्तैनी हुनरहरियाणा
5 अक्तू॰ 2026, 7:35 pm (32 दिन पहले)· 1

अंबाला में 100 साल पुरानी मिट्टी की विरासत: 75 वर्षीय देवराज और उनका परिवार पीढ़ियों से संजोए हुए हैं पुश्तैनी हुनर

अंबाला के कुम्हार मोहल्ले में रहने वाले 75 वर्षीय देवराज पिछले छह दशकों से चाक पर मिट्टी के बर्तन बना रहे हैं, जहां उनके परिवार के 10 सदस्य मिलकर इस सदियों पुरानी परंपरा और कारोबार को आगे बढ़ा रहे हैं।

रसोई और घरों में धातु और आधुनिक बर्तनों के बढ़ते चलन के बीच हरियाणा के अंबाला शहर में एक परिवार ऐसा भी है जो अपनी एक सदी पुरानी पारंपरिक विरासत को पूरी निष्ठा के साथ संजोए हुए है। कुम्हार मोहल्ले की तंग गलियों में मिट्टी को सिर्फ एक कच्चा माल नहीं माना जाता, बल्कि यह इस कुनबे की सांस्कृतिक पहचान और आजीविका का मुख्य आधार है। 75 साल के बुजुर्ग देवराज आज भी अपने सधे हुए हाथों से चाक पर मिट्टी को तराशते हैं। उनके साथ उनके बेटे, बहुएं और पोते-पोतियां भी इस पुश्तैनी काम को नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ाने में जुटे हैं।

पिता और दादा से सीखी कला को बनाया जीवन का आधार

देवराज के परिवार में मिट्टी के बर्तन और कलाकृतियां बनाने की परंपरा लगभग 100 साल पुरानी है। उनके दादा और पिता इसी काम से अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। बचपन में जब देवराज अपने पिता को गीली मिट्टी को विभिन्न रूपों में ढालते देखते थे, तब उनके मन में भी इस हुनर को सीखने की ललक पैदा हुई। धीरे-धीरे उन्होंने बारीकियों को समझा और इसी पुश्तैनी काम को अपना मुख्य पेशा बना लिया। पिछले 60 वर्षों से वह लगातार मिट्टी के उत्पाद तैयार कर रहे हैं। उम्र के 75वें पड़ाव पर पहुंचने के बावजूद जब उनके हाथ मिट्टी को छूते हैं, तो उनकी उंगलियों की कारीगरी और हुनर में वही पुरानी फुर्ती दिखाई देती है।

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घड़े से लेकर पानी के ठंडे कैंपर तक का निर्माण

देवराज मिट्टी से पारंपरिक घड़े, कढ़ाई, छोटे मंदिर, पूजा के दीये, गड़बड़े और गर्मियों में पानी रखने के लिए ठंडे कैंपर समेत कई उपयोगी सामान तैयार करते हैं। बीते दौर में जब बाजार में प्लास्टिक और स्टील के विकल्प मौजूद नहीं थे, तब इन पारंपरिक बर्तनों की भारी मांग हुआ करती थी। समय बदलने के साथ बाजारों में आधुनिक बर्तनों की भरमार हो गई, लेकिन देवराज ने अपनी कला और कारोबार से कभी मुंह नहीं मोड़ा। उनका साफ मानना है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि सच्ची लगन और मेहनत से किया गया हर काम इंसान को जीवन में आगे ले जाता है।

पूरा कुनबा मिलकर संभालता है निर्माण और कारोबार

इस पारिवारिक व्यवसाय को जीवित रखने में देवराज के दोनों बेटे, बहुएं और अगली पीढ़ी के बच्चे कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हैं। परिवार के लगभग 10 सदस्य मिलकर मिट्टी तैयार करने, चाक पर बर्तन गढ़ने, उन्हें पकाने और फिर बाजार में आपूर्ति करने तक का पूरा जिम्मा संभालते हैं। देवराज के लिए सबसे बड़ा संतोष इस बात का है कि उनकी यह पैतृक कला उनके बाद खत्म नहीं होगी। वह मानते हैं कि आधुनिक जीवनशैली अपनाने के बावजूद अपनी जड़ों और पुरानी संस्कृति को बचाकर रखने की जिम्मेदारी युवा पीढ़ी पर है। इसी कारण वह आम लोगों से भी मिट्टी के बर्तनों के दैनिक इस्तेमाल की अपील करते हैं।

पंजाब और हिमाचल तक फैली उत्पादों की पहुंच

देवराज के बेटे सुरेंद्र का कहना है कि उन्होंने अपने पारिवारिक पेशे को कभी कमतर नहीं आंका। पहले उनके दादा ने यह काम संभाला, फिर उनके पिता ने इसे पहचान दिलाई और अब वह खुद अपने बेटे के साथ मिलकर इसे आगे बढ़ा रहे हैं। जब पूरा परिवार एक साथ बैठकर काम करता है, तो इससे आपसी रिश्ता भी मजबूत रहता है और घर का खर्च भी सुचारू रूप से चलता है। सुरेंद्र बताते हैं कि उनके बनाए मिट्टी के सामान की मांग सिर्फ अंबाला तक सीमित नहीं है। पंजाब के रोपड़ और राजपुरा के अलावा हिमाचल प्रदेश और हरियाणा के कई जिलों में भी उनके उत्पादों की आपूर्ति की जाती है। पुराने दिनों में उनके पिता द्वारा बनाए गए विशेष गमले कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी तक भेजे जाते थे, और कई मौकों पर परिवार के लोग खुद वहां जाकर भी मिट्टी का सामान तैयार करते थे।

सवाल-जवाब

अंबाला के देवराज कौन हैं और वह क्या काम करते हैं?
देवराज अंबाला के कुम्हार मोहल्ले के 75 वर्षीय शिल्पकार हैं, जो पिछले 60 वर्षों से अपने पुश्तैनी हुनर के तहत मिट्टी के बर्तन बना रहे हैं।
देवराज के परिवार में मिट्टी के बर्तन बनाने का काम कितने सालों से चल रहा है?
उनके परिवार में मिट्टी के बर्तन बनाने की यह परंपरा करीब 100 साल पुरानी है, जिसे उनके दादा और पिता ने शुरू किया था।
देवराज और उनका परिवार मिट्टी से कौन-कौन सी चीजें तैयार करते हैं?
वे मिट्टी से पारंपरिक घड़े, कढ़ाई, पूजा के मंदिर, दीये, गड़बड़े और पानी ठंडा रखने वाले कैंपर तैयार करते हैं।
इस काम में परिवार के कितने सदस्य शामिल हैं?
देवराज के दोनों बेटे, बहुएं और पोते-पोतियां मिलाकर परिवार के करीब 10 सदस्य इस काम को संभालते हैं।
उनके बनाए मिट्टी के बर्तनों की आपूर्ति किन-किन राज्यों में होती है?
उनके सामान की आपूर्ति हरियाणा के विभिन्न जिलों के अलावा पंजाब के रोपड़ और राजपुरा तथा हिमाचल प्रदेश के कई इलाकों में होती है।
कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से देवराज के परिवार का क्या संबंध रहा है?
पुराने समय में देवराज के पिता द्वारा बनाए गए गमले कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी तक भेजे जाते थे और परिवार के सदस्य वहां जाकर भी मिट्टी का सामान तैयार करते थे।
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टिप्पणियाँ 5

Priya Sharma@priya-sharma·31 दिन पहले

अंबाला के देवराज जी और उनके पूरे परिवार को देखकर बहुत सुकून मिला। आज के दौर में जहां हर कोई प्लास्टिक और स्टील के पीछे भाग रहा है, अपनी जड़ों को थामे रखना और इस कला को जिंदा रखना वाकई बड़ी बात है। उनके हाथ के बने ठंडे कैंपर और दीयों की बात ही अलग होती है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·31 दिन पहले

अंबाला के देवराज जी ने सच में अपनी पुरानी परंपरा को ज़िंदा रखा है, आज के दौर में ऐसी मेहनत देखना बहुत अच्छा लगता है।

Ravikash Gupta@ravikash·31 दिन पहले

अर्जुन जी, 75 साल की उम्र में भी देवराज जी के हाथों की फुर्ती वाकई कमाल की है, इतनी मेहनत आज के युवाओं में कहां दिखती है।

Rohan Verma@rohan-verma·31 दिन पहले

75 साल की उम्र में भी इतनी मेहनत से चाक चलाना वाकई बड़ी बात है। आज के समय में जब प्लास्टिक और स्टील हर घर में घुस गया है, तब इस परिवार ने अपनी पुरानी कला को कैसे बचाए रखा होगा? क्या इन्हें सरकार की तरफ से कोई मदद मिलती है या सिर्फ अपने दम पर चल रहा है?

Karan Malhotra@karan-malhotra·31 दिन पहले

रोहन भाई, परिवार के दस लोग मिलकर काम संभाल रहे हैं, यही इस उम्र में उनका सबसे बड़ा सहारा है।

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