अंबाला छावनी में इस बार रोशनी के पर्व की खुशियां एक अनूठे मानवीय उत्साह और रचनात्मकता के साथ सामने आई हैं। त्योहार पर अपने घरों को सजाने के लिए बाजारों का रुख करने वाले लोगों को वात्सल्य स्कूल फॉर स्पेशल चिल्ड्रन में बच्चों के हुनर का एक बेहद खास रूप देखने को मिला। संस्थान के प्रांगण में विशेष तौर पर आयोजित दिवाली कार्निवल में दिव्यांग छात्र-छात्राओं ने अपनी प्रतिभा से सजे हस्तनिर्मित उत्पादों की भव्य प्रदर्शनी लगाई। इन नन्हे कलाकारों ने अपने शिक्षकों की देखरेख में चार महीने की लगातार लगन से दीये, मोमबत्तियां और सजावटी सामान तैयार किए थे, जिनकी खरीदारी के लिए स्थानीय लोग बड़ी संख्या में पहुंचे। बिक्री काउंटर पर जब लोगों ने इन बच्चों के बनाए उत्पादों को सराहा, तो उनके चेहरों पर झलकी मुस्कान ने उत्सव के माहौल को कई गुना ज्यादा चमकदार बना दिया।
चार महीने की तपस्या से सजे हस्तशिल्प उत्पाद
प्रदर्शनी के स्टॉलों पर रखे गए सामान केवल सजावटी वस्तुएं नहीं थे, बल्कि वे इन बच्चों की आत्मनिर्भरता और लगन की कहानी बयां कर रहे थे। कार्निवल में छात्रों ने हाथ से बने ग्रीटिंग कार्ड, मिट्टी के पारंपरिक नक्काशीदार दीये, सुगंधित व डिजाइनर मोमबत्तियां, दरवाजों के लिए पारंपरिक बंधनवार, शगुन के रंग-बिरंगे लिफाफे और पर्यावरण के अनुकूल पेपर बैग बिक्री के लिए पेश किए। बच्चों ने इन तमाम उत्पादों का निर्माण अपने शिक्षकों के कुशल मार्गदर्शन में स्कूल परिसर में ही पूरा किया। जैसे ही आगंतुकों ने स्टॉलों पर पहुंचकर खरीदारी शुरू की, बच्चों का उत्साह देखते ही बनता था और वे अपनी कलाकृतियों की खूबियां ग्राहकों को समझाते नजर आए।
नन्हे शिल्पकारों की मेहनत को मिली बाजार में पहचान
इस प्रदर्शनी में भाग लेने वाले बच्चों के अनुभव उनकी अटूट मेहनत को दर्शाते हैं। संस्थान के स्पेशल चाइल्ड तांशू ने साझा किया कि उन्होंने शिक्षकों की मदद से लगभग चार महीने के कड़े अभ्यास और परिश्रम के बाद इन मोमबत्तियों का निर्माण किया। खरीदारों को अपनी बनाई मोमबत्तियों को पसंद करते देखकर उन्हें बेहद गर्व की अनुभूति हुई, क्योंकि यह उनके लिए केवल एक वस्तु की बिक्री नहीं, बल्कि उनके आत्मसम्मान और मेहनत को मिला सबसे बड़ा सम्मान था। एक अन्य छात्र नैतिक ने उत्सव के लिए विशेष बंधनवार, कलात्मक दीये और मोमबत्तियां तैयार की थीं, जो प्रदर्शनी शुरू होने के कुछ ही देर में पूरी तरह बिक गईं। इसी तरह नंदिनी ने भी त्योहार के लिए आवश्यक शगुन के लिफाफे, पेपर बैग और आकर्षक कैंडल बनाकर अपनी कलात्मक क्षमता का शानदार परिचय दिया।
हुनर तराश कर आत्मनिर्भर भविष्य की बुनियाद
विशेष बच्चों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने और उन्हें स्वावलंबी बनाने के मिशन पर चर्चा करते हुए वात्सल्य स्कूल के प्रिंसिपल यशपाल ने इस पहल के पीछे की सोच साझा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि संस्थान की स्थापना विशेष बच्चों की आंतरिक प्रतिभा को पहचानकर उन्हें भविष्य में अपने पैरों पर खड़ा करने के स्पष्ट उद्देश्य के साथ की गई है। उनका मानना है कि हर बच्चे के भीतर कोई न कोई विशेष योग्यता अवश्य छिपी होती है, जिसे सही समय पर पहचानकर निखारने की जरूरत होती है। दिवाली कार्निवल का यह मंच बच्चों को अपनी रचनात्मकता प्रदर्शित करने के साथ-साथ व्यावसायिक समझ और लेन-देन का व्यावहारिक अनुभव भी प्रदान करता है। इससे बच्चों का आत्मविश्वास मजबूत होता है और वे अपनी मेहनत के आर्थिक मूल्य को समझ पाते हैं, ताकि औपचारिक स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद वे अपनी आजीविका सम्मानपूर्वक कमा सकें।
छोटे प्रयास से अंतरराष्ट्रीय पदकों तक का सफर
छात्रों की इस उपलब्धि पर खुशी जाहिर करते हुए अंबाला कंटोनमेंट बोर्ड के सदस्य अजय बवेजा ने कहा कि इन बच्चों को आगे बढ़ाने और उनका मनोबल ऊंचा रखने के लिए प्रशासन लगातार हरसंभव सहयोग कर रहा है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2014 में वात्सल्य स्कूल की शुरुआत एक बेहद छोटे और साधारण प्रयास के रूप में की गई थी, लेकिन शिक्षकों के समर्पण और बच्चों के पक्के इरादों ने इसे एक प्रेरक संस्थान बना दिया। आज इसी स्कूल के कई विशेष बच्चे खेल और अन्य प्रतियोगिताओं में भाग लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीत चुके हैं और अपनी उपलब्धियों से अंबाला का नाम वैश्विक मंच पर रोशन कर रहे हैं। वर्ष 2014 में रोपा गया यह छोटा सा पौधा अब एक मजबूत वटवृक्ष का रूप ले चुका है।
स्थानीय नागरिकों से स्वावलंबन में भागीदारी की अपील
कंटोनमेंट बोर्ड के सीईओ राहुल आनंद ने दिव्यांग बच्चों के उज्ज्वल भविष्य और आत्मनिर्भरता के लिए चल रहे प्रयासों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि प्रशासन इन बच्चों को एक सुरक्षित, सशक्त और आत्मनिर्भर कल देने के लिए निरंतर ठोस कदम उठा रहा है। आम नागरिकों से भावुक अपील करते हुए उन्होंने कहा कि शहरवासियों को स्कूल पहुंचकर बच्चों द्वारा हाथों से तैयार की गई वस्तुओं को जरूर खरीदना चाहिए। जब स्थानीय समाज आगे आकर इन हस्तनिर्मित सामानों को अपनाएगा, तो इससे बच्चों का मनोबल बढ़ेगा और समाज में उनकी स्वीकार्यता और आत्मनिर्भरता का मार्ग और अधिक सुदृढ़ होगा।


















