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आंदोलनों में बच्चों के इस्तेमाल पर योग गुरु बाबा रामदेव ने जताई चिंता, कहा देश का भविष्य संकट मेंभारत
17 अग॰ 2026, 6:58 am (45 दिन पहले)· 2

आंदोलनों में बच्चों के इस्तेमाल पर योग गुरु बाबा रामदेव ने जताई चिंता, कहा देश का भविष्य संकट में

आंदोलनों में स्कूली बच्चों की भागीदारी पर योग गुरु बाबा रामदेव ने चिंता जाहिर की है। उनका कहना है कि देश का असली संकट धर्म या जाति का नहीं, बल्कि बच्चों और युवाओं के भविष्य का है।

आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों में बच्चों की भागीदारी को लेकर योग गुरु बाबा रामदेव ने गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि बच्चे पढ़ाई छोड़कर सड़कों और प्रदर्शनों में ही व्यस्त रहेंगे, तो उनका शैक्षणिक विकास और भविष्य किस दिशा में जाएगा। उनके अनुसार देश का वास्तविक संकट किसी धर्म या जाति की सुरक्षा को लेकर नहीं, बल्कि भावी पीढ़ी के सही मार्गदर्शन से जुड़ा हुआ है।

धर्म और जाति के बजाय बचपन और भविष्य पर ध्यान देने की अपील

बाबा रामदेव ने स्पष्ट किया कि देश के अंदर किसी विशेष समुदाय, धर्म या जाति को खतरा नहीं है। हिंदू, मुसलमान, सिख, बौद्ध, जैन, ब्राह्मण, दलित या आदिवासी में से कोई भी असुरक्षित नहीं है। वास्तविक चिंता का विषय देश का बचपन, जवानी और आने वाला भविष्य है। अगर युवा और बच्चे राजनीतिक या सामाजिक आंदोलनों में उलझे रहेंगे, तो देश की संस्कृति, संप्रभुता और अखंडता पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

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अराजकता और आंदोलनों पर बाबा रामदेव का दृष्टिकोण

विरोध प्रदर्शन के तरीकों पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि अव्यवस्था और अंधेरगर्दी से ही जन-आक्रोश जन्म लेता है। विरोध के नाम पर अराजकता फैलाने या बच्चों को आगे करने से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि केवल एक राजनीतिक दल पूरे देश की व्यवस्था में बदलाव नहीं ला सकता। इसके लिए सही दिशा में प्रयास और अनुशासित दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है।

सवाल-जवाब

बाबा रामदेव ने आंदोलनों में बच्चों के इस्तेमाल पर क्या कहा?
उन्होंने चिंता जताते हुए सवाल उठाया कि यदि बच्चे प्रदर्शनों में व्यस्त रहेंगे तो उनकी पढ़ाई और शैक्षणिक विकास प्रभावित होगा।
बाबा रामदेव के अनुसार देश में असली खतरा किस बात का है?
उन्होंने कहा कि देश में कोई धर्म या जाति खतरे में नहीं है, बल्कि बचपन, जवानी और देश का भविष्य संकट में है।
विरोध प्रदर्शनों के तरीकों को लेकर उन्होंने क्या विचार व्यक्त किए?
उनका मानना था कि कुप्रबंधन और अंधेरगर्दी से आक्रोश पैदा होता है, लेकिन विरोध के नाम पर अराजकता नहीं होनी चाहिए।
क्या उनका मानना है कि एक राजनीतिक दल व्यवस्था बदल सकता है?
नहीं, उन्होंने कहा कि केवल एक राजनीतिक पार्टी अकेले पूरे देश की व्यवस्था में बदलाव नहीं ला सकती।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 3

Ravikash Gupta@ravikash·44 दिन पहले

आंदोलनों में बच्चों की संलिप्तता का सीधा असर उनके मानव पूंजी विकास पर पड़ता है, जिससे देश की उत्पादकता और जनसांख्यिकी लाभांश को नुकसान पहुँच सकता है। आर्थिक और व्यावसायिक स्थिरता के लिए यह आवश्यक है कि युवा शक्ति का उपयोग शिक्षा और कौशल विकास में हो, न कि सामाजिक व्यवधानों में। यदि भावी पीढ़ी का शैक्षणिक और व्यावसायिक नुकसान होता है, तो दीर्घकाल में यह कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए कुशल श्रम की कमी और बाजार की वृद्धि दर को प्रभावित कर सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·44 दिन पहले

अपराध और कानून-व्यवस्था की दृष्टि से देखें तो आंदोलनों में नाबालिगों और स्कूली बच्चों को आगे करना गंभीर विधिक और सुरक्षात्मक चिंता का विषय है। किशोर न्याय अधिनियम और बाल अधिकारों के तहत बच्चों को राजनीतिक या संवेदनशील प्रदर्शनों में झोंकना उनकी सुरक्षा और मनोवैज्ञानिक विकास पर सीधा असर डालता है। यदि इस प्रवृत्ति पर कानूनी और सामाजिक रूप से रोक नहीं लगाई गई, तो यह आने वाले समय में बाल अधिकारों के हनन और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·44 दिन पहले

करण मल्होत्रा के इस विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह समझना आवश्यक है कि जब जन-आंदोलनों में बच्चों की सहभागिता बढ़ती है, तो नीति निर्माताओं और कानून प्रवर्तन एजेंसियों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। चुनावी और राजनीतिक बहसों के बीच बाल अधिकारों की सुरक्षा का मुद्दा अक्सर पीछे छूट जाता है। यदि इस प्रवृत्ति को विनियमित नहीं किया गया, तो भविष्य की सार्वजनिक नीतियों और विधायी सुधारों में किशोर न्याय से जुड़े प्रावधानों को और अधिक सख्त करना पड़ेगा, ताकि राजनीतिक गतिविधियों में नाबालिगों के इस्तेमाल को रोका जा सके।

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