अरुणाचल प्रदेश के घने जंगलों ने वनस्पति विज्ञान की दुनिया को एक बार फिर हैरान किया है, जहां जमीन के नीचे अपना अधिकांश जीवन बिताने वाला एक अनोखा आर्किड सामने आया है। केयी पान्योर जिले की गहरी खाई में खोजी गई इस नई वनस्पति को वैज्ञानिकों ने Gastrodia keyiensis नाम दिया है। सूरज की रोशनी पर निर्भर रहने वाले आम पौधों से बिल्कुल विपरीत, यह वनस्पति बिना हरी पत्तियों के जीवित रहती है और स्थानीय न्यीशी बोली में अपनी रहस्यमयी जीवनशैली के चलते ओरम ओपुह यानी भूतिया फूल के तौर पर पहचानी जाती है।
केयी नदी के किनारे हुई वैज्ञानिक खोज
यह खोज लगभग 1,000 मीटर की ऊंचाई पर एक विस्तृत वानस्पतिक सर्वेक्षण के दौरान दर्ज की गई। नदी के दाहिने किनारे पर घने बांस के झुरमुटों और सड़ी-गली पत्तियों की मोटी परतों के बीच छिपे इस पौधे को ढूंढ पाना बेहद कठिन काम था। मौके पर वैज्ञानिकों को इस वनस्पति के केवल पांच खिले हुए नमूने ही मिल सके। अंतरराष्ट्रीय वनस्पति वर्गीकरण पत्रिका फाइटोटैक्सा में 9 सितंबर को इस अध्ययन का औपचारिक विवरण प्रकाशित किया गया।
इस वैज्ञानिक अध्ययन को मधुसूदन खनाल, दीपांकर बोरा, शुभादीप सरकार, नीलम गैप, संतोष कुमार राय और देवेंद्र कुमार ने मिलकर तैयार किया है। इन शोधकर्ताओं का जुड़ाव जी बी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, सिक्किम विश्वविद्यालय, कालियाबोर कॉलेज और भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण जैसे प्रमुख वैज्ञानिक संस्थानों से है। जिस नदी घाटी से यह नमूना एकत्र किया गया, उसी केयी नदी के सम्मान में इस प्रजाति का नामकरण किया गया है।
बिना धूप और पत्तियों के जीवित रहने का अनोखा तंत्र
आमतौर पर पेड़-पौधे प्रकाश संश्लेषण के जरिए जीवित रहते हैं, लेकिन गैस्ट्रोडिया समूह के पौधे इस नियम को तोड़ते हैं। Gastrodia keyiensis पूरी तरह से होलोमाइकोट्रॉफी नामक प्रक्रिया पर निर्भर है। इस जैविक तंत्र में पौधा मिट्टी में मौजूद फंगस यानी कवक से जरूरी पोषक तत्व खींचता है। इसी वजह से इसे जीवित रहने के लिए न तो क्लोरोफिल की दरकार होती है और न ही पत्तों की।
यह पौधा नम, अंधेरे और जमीन के नीचे लंबे समय तक सुप्त अवस्था में रहता है, जिससे यह आम तौर पर नजरों से ओझल ही रहता है। जब यह जमीन के ऊपर निकलता है, तो इसकी ऊंचाई करीब 35 सेंटीमीटर तक पहुंच सकती है। इसके तने पर एक से लेकर तीन तक फूल खिलते हैं, जिनका रंग सफेद से लेकर हल्के नीलेपन तक बदलता है।
संरचनात्मक विशेषताएं और पहचान के मानक
टैक्सोनॉमिक विश्लेषण के अनुसार, इस नए आर्किड की संरचना इसे अपने परिवार की बाकी प्रजातियों से एकदम अलग खड़ा करती है। इसके लेबेलम का निचला हिस्सा चौड़ा ओबोवेट आकार का है, जिसमें लंबाई में छह से सात उभरी हुई संरचनाएं दिखाई देती हैं। इसके ऊपरी सिरे पर एक मोटा, स्पष्ट रूप से मुड़ा हुआ पीला हिस्सा मौजूद है, जो इसे विशेष पहचान दिलाता है।
उपमुख्यमंत्री चाउना मीन ने सोशल मीडिया मंच X पर लिखा कि यह खोज राज्य की जैव विविधता में एक और अध्याय जोड़ती है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि इस नाजुक वनस्पति का सीमित क्षेत्र और बेहद छोटा पुष्पन काल यह साबित करता है कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के निरंतर संरक्षण और गहन शोध की कितनी सख्त जरूरत है।
आंकड़ों की कमी और संरक्षण की तात्कालिक आवश्यकता
वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, इस प्रजाति का विस्तार केवल चार वर्ग किलोमीटर के अनुमानित क्षेत्र तक ही सीमित पाया गया है। चूंकि वैज्ञानिक जगत के पास इसकी कुल आबादी और व्यापक भौगोलिक मौजूदगी के पुख्ता आंकड़े मौजूद नहीं हैं, इसलिए इसे डेटा डेफिशिएंट की श्रेणी में रखा गया है। शोध दल ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में दीर्घकालिक निगरानी और व्यापक जमीनी सर्वेक्षणों से ही इसके वास्तविक अस्तित्व की स्थिति साफ हो सकेगी।
अरुणाचल प्रदेश के वन विभाग के अभिलेखों के मुताबिक, राज्य में पहले से ही लगभग 600 आर्किड प्रजातियां दर्ज हैं। अपनी विविध भौगोलिक ऊंचाई, अनुकूल जलवायु और वर्षा वनों की वजह से इस पूर्वोत्तर राज्य को आर्किड पैराडाइज के नाम से जाना जाता है। इस नई खोज ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि यहां के दुर्गम वनों में अभी भी अनगिनत जैविक रहस्य प्रकृति की गोद में सुरक्षित हैं।
























