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अरुणाचल प्रदेश में सजेगा ज़ीरो फेस्टिवल, देश-विदेश के 40 से अधिक फनकार बिखेरेंगे सुरों का जादूअरुणाचल प्रदेश
20 सित॰ 2026, 12:37 pm (37 दिन पहले)· 0

अरुणाचल प्रदेश में सजेगा ज़ीरो फेस्टिवल, देश-विदेश के 40 से अधिक फनकार बिखेरेंगे सुरों का जादू

अरुणाचल प्रदेश की सुरम्य ज़ीरो घाटी 24 से 27 सितंबर तक 13वें ज़ीरो फेस्टिवल ऑफ म्यूजिक की मेजबानी करेगी, जिसमें दुनिया भर के 40 से ज्यादा कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे।

अरुणाचल प्रदेश के मनोरम पहाड़ी परिदृश्य के बीच संगीत का एक भव्य समागम आयोजित होने जा रहा है। ज़ीरो घाटी में 24 से 27 सितंबर तक चलने वाले ज़ीरो फेस्टिवल ऑफ म्यूजिक के 13वें संस्करण की तैयारियां पूरी गति से चल रही हैं। चार दिनों तक खिंचने वाले इस सांस्कृतिक उत्सव में भारत के विभिन्न कोनों और सुदूर मुल्कों से 40 से अधिक फनकार अपने हुनर का प्रदर्शन करेंगे। इस आयोजन की सबसे अनूठी परंपरा यह है कि यहां मुख्य कलाकारों की कोई पारंपरिक क्रमबद्धता नहीं रखी जाती, जिससे हर पृष्ठभूमि के संगीतकार एक ही मंच की आभा साझा करते हैं।

देशभर के दिग्गजों और पूर्वोत्तर की प्रतिभाओं का संगम

इस बार मंच पर भारतीय संगीत जगत के जाने-पहचाने नामों की एक लंबी फेहरिस्त देखने को मिलेगी। सुखबीर, स्नेहा खानवलकर, मिडीवल पुंडित्ज़, शक्तिश्री गोपालन, शंका ट्राइब और विख्यात रॉक बैंड परिक्रमा अपनी धुनों से समां बांधेंगे। इनके साथ ही भारतीय शास्त्रीय संगीत के उस्ताद सरवर हुसैन और वायलिन वादक अपूर्व कृष्णा भी मंच की शोभा बढ़ाएंगे। बिहार के लोकप्रिय रैपर शिकरीवाल, काली दुनिया, करण कंचन और स्वरा ओझा की प्रस्तुतियां भी दर्शकों को झूमने पर मजबूर करेंगी।

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उत्सव की आत्मा पूर्वोत्तर भारत की स्थानीय धुनों में बसती है। इस साल मंच पर त्रिपुरा के लोक गायक सुकेश शुक्लावैद्य, मणिपुर से चिंगलेईपाक कलेक्टिव और येलहोमी, सिक्किम का ट्राइबल रेन, नगालैंड के तेमसु क्लोवर, मिजोरम का मूड स्टेशन, असम के नोवो और स्थानीय राज्य अरुणाचल प्रदेश के डेविड आंगु अपनी कला का जादू बिखेरेंगे।

वैश्विक धुनों और कला विनिमय का दायरा

अंतरराष्ट्रीय फलक पर श्रीलंका की गायिका योहानी, अल्जीरिया के फाती तेनीरी, फिलिस्तीनी-फ्रांसीसी संगीत निर्माता इसाम एलियास, नेपाल का फॉसफीन्स, थाईलैंड का जीवाईएमवी, फिलीपींस का तालाहिब और दक्षिण कोरियाई समूह मोहेर अपनी प्रस्तुतियां देंगे। इस वर्ष के उत्सव में दक्षिण अफ्रीका, स्विट्जरलैंड और आयरलैंड की संस्कृतियां भी सम्मिलित हो रही हैं।

कलात्मक आदान-प्रदान के तहत स्विस आर्ट्स काउंसिल प्रो हेल्वेटिया के सहयोग से संचालित इलेक्ट्रॉनिक संगीत परियोजना 'सर्किट मिक्सर्स' का अंतिम पड़ाव भी यहीं संपन्न होगा। इससे पहले जोहान्सबर्ग और मॉन्ट्रो में कार्यशालाओं का आयोजन कर चुका यह मंच भारत के ज़ेक्वेंक्स, दक्षिण अफ्रीका की नालेदी चाई, और स्विट्जरलैंड के लुआ जुंगक व ओवेल को एक साथ लाएगा। वहीं दूसरी ओर, कल्चर आयरलैंड और नई दिल्ली स्थित आयरलैंड के दूतावास के सहयोग से आयरिश लोक बैंड साल्टेयर एक विशेष सांस्कृतिक रेजीडेंसी के तहत कार्यशालाएं आयोजित करेगा। यह सहयोग यूरोपीय संघ परिषद की आयरलैंड अध्यक्षता के उपलक्ष्य में आयोजित किया जा रहा है।

कॉसमॉस और आपातानी परंपराओं का उत्सव

आयोजन को और अधिक जीवंत बनाने के लिए इस बार 'कॉसमॉस' नामक एक अनौपचारिक स्थल की शुरुआत की जा रही है। यह दायरा कलाकारों के बीच सहज संवाद, अनियोजित जुगलबंदी और बिना किसी पटकथा वाली तात्कालिक प्रस्तुतियों के लिए समर्पित रहेगा।

यह उत्सव केवल धुनों तक सीमित न रहकर मेज़बान आपातानी जनजाति की समृद्ध परंपराओं को भी सामने लाएगा। कार्यक्रम के दौरान पारंपरिक 'दामिंदा' फसल नृत्य और आपातानी विमेंस एसोसिएशन ज़ीरो (आवाज़) की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां होंगी। इसके अलावा पोपी सारमिं स्टूडियो में धान की बांसुरी (एलू) बनाने और पारंपरिक मिट्टी के बर्तन तैयार करने जैसी कलाओं पर कार्यशालाएं भी आयोजित की जाएंगी। उत्सव के सह-संस्थापक और निदेशक बॉबी हानो ने रेखांकित किया कि नई प्रतिभाओं की खोज और संस्कृतियों का परस्पर मिलन ही इस महोत्सव की मूल प्रेरणा है।

सवाल-जवाब

ज़ीरो फेस्टिवल 2026 कब और कहां आयोजित किया जा रहा है?
यह उत्सव अरुणाचल प्रदेश की ज़ीरो घाटी में 24 सितंबर से 27 सितंबर तक आयोजित होगा।
इस उत्सव में कुल कितने कलाकार और बैंड हिस्सा ले रहे हैं?
इस चार दिवसीय आयोजन में भारत और विदेशों से 40 से अधिक कलाकार और संगीत समूह भाग लेंगे।
इस वर्ष के उत्सव में 'कॉसमॉस' क्या है?
'कॉसमॉस' एक अनौपचारिक स्थल है, जिसे कलाकारों के बीच सहज संवाद, अनियोजित जुगलबंदी और अनस्क्रिप्टेड प्रस्तुतियों के लिए बनाया गया है।
किन-किन देशों के अंतरराष्ट्रीय कलाकार इस महोत्सव में शामिल हो रहे हैं?
इसमें अल्जीरिया, थाईलैंड, फिलिस्तीन, स्विट्जरलैंड, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, नेपाल, आयरलैंड, फिलीपींस और श्रीलंका के कलाकार भाग लेंगे।
स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए उत्सव में क्या विशेष रखा गया है?
कार्यक्रम में आपातानी समुदाय का दामिंदा फसल नृत्य, आवाज़ संघ की प्रस्तुतियां तथा एलू बांसुरी और मिट्टी के बर्तन बनाने की कार्यशालाएं शामिल हैं।
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टिप्पणियाँ 5

Neha Verma@neha-verma·37 दिन पहले

ज़िरो फेस्टिवल ऑफ म्यूजिक सिर्फ सुरों का ही नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर की अनूठी जीवनशैली, पर्यावरण-अनुकूल फ़ैशन और सांस्कृतिक सौंदर्यशास्त्र का भी एक बड़ा मंच बन चुका है। देश-विदेश के फ़नकारों और युवाओं का यह समागम बोहेमियन स्टाइल, स्थानीय जनजातीय हथकरघा और सस्टेनेबल फ़ैशन ट्रेंड्स को बढ़ावा देता है। इस तरह के ओपन-एयर सांस्कृतिक उत्सव पूर्वोत्तर के प्राकृतिक परिदृश्य और आधुनिक लाइफस्टाइल संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाते हैं।

Arjun Mehta@arjun-mehta·37 दिन पहले

अरुणाचल प्रदेश जैसे सीमावर्ती राज्य में वैश्विक भागीदारी वाला ज़ीरो फेस्टिवल सिर्फ एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की 'सॉफ्ट पावर' और सांस्कृतिक कूटनीति का सशक्त उदाहरण है। स्विस आर्ट्स काउंसिल और आयरिश दूतावास जैसे अंतरराष्ट्रीय निकायों का सहयोग पूर्वोत्तर को वैश्विक मानचित्र पर ला खड़ा करता है। ऐसे आयोजनों से न केवल क्षेत्र के पर्यटन और बुनियादी ढांचे को बढ़ावा मिलता है, बल्कि यह राष्ट्रीय एकीकरण और सीमावर्ती इलाकों में नीतिगत विकास एवं कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

Nyra Kaif@nyra-kaif·37 दिन पहले

अर्जुन की सांस्कृतिक कूटनीति वाली बात से आगे बढ़कर देखें, तो ज़ीरो फेस्टिवल युवा लाइफस्टाइल और ट्रैवल ट्रेंड्स में आ रहे बड़े बदलाव का प्रतीक है। आज की युवा पीढ़ी पारंपरिक टूरिज्म की जगह ऐसे 'एक्सपेरिमेंटल म्यूजिक रिट्रीट' को तरजीह दे रही है, जहाँ कोई हेडलाइनर पदानुक्रम नहीं होता। 'कॉसमॉस' जैसे अनौपचारिक स्थल और आपातानी संस्कृति के बीच वैश्विक व स्थानीय कलाकारों का मेलजोल युवाओं को गहरा कम्युनिटी अनुभव देता है। पूर्वोत्तर का यह उत्सव अब सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सस्टेनेबल ट्रैवल, इंडिपेंडेंट म्यूजिक और सोशल कनेक्शन का एक नया लाइफस्टाइल हब बन चुका है।

Rohan Verma@rohan-verma·37 दिन पहले

पूर्वोत्तर भारत के सीमांत क्षेत्रों में ऐसे अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक आयोजनों का नियमित आयोजन केवल संगीत उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण की दिशा में एक प्रभावी नीतिगत कदम है। वैश्विक कलाकारों और स्थानीय प्रतिभाओं को बिना किसी पदानुक्रम के एक मंच पर लाना पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक पटल पर मज़बूती देता है। 'सर्किट मिक्सर्स' जैसी अंतरराष्ट्रीय साझेदारियाँ और नया 'कॉसमॉस' मंच यह दर्शाता है कि कैसे सतत पर्यटन और कलात्मक विनिमय के माध्यम से अरुणाचल जैसे राज्यों में बुनियादी ढाँचे और जन-संबोधन को नया आयाम दिया जा सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·37 दिन पहले

रोहन की बात को आगे बढ़ाते हुए आर्थिक दृष्टि से देखें तो ज़ीरो फेस्टिवल जैसे सांस्कृतिक आयोजन पूर्वोत्तर में 'अनुभव-आधारित अर्थव्यवस्था' को गति देने का एक मजबूत माध्यम हैं। अंतरराष्ट्रीय कलाकारों और वैश्विक दूतावासीय साझेदारियों का यह संगम स्थानीय हॉस्पिटैलिटी, होमस्टे सेक्टर, परिवहन और क्रिएटिव स्टार्ट-अप्स के लिए प्रत्यक्ष व्यावसायिक अवसर पैदा करता है। यह मॉडल दर्शाता है कि पर्यावरण के अनुकूल सांस्कृतिक आईपी के जरिए सीमांत क्षेत्रों में बिना किसी बड़े औद्योगिक नुकसान के माइक्रो-इन्वेस्टमेंट और स्थानीय रोज़गार को बढ़ावा दिया जा सकता है, जो पूर्वोत्तर की दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि के लिए बेहद अहम है।

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