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अरुणाचल के तवांग में मिलीं जंगली मधुमक्खियों की दुर्लभ प्रजातियां, बर्फीले पहाड़ों में परागण का नया रहस्य उजागरअरुणाचल प्रदेश
8 अक्तू॰ 2026, 7:54 pm (19 दिन पहले)· 1

अरुणाचल के तवांग में मिलीं जंगली मधुमक्खियों की दुर्लभ प्रजातियां, बर्फीले पहाड़ों में परागण का नया रहस्य उजागर

भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के वैज्ञानिकों ने तवांग के उच्च पर्वतीय इलाकों में मधुमक्खियों और भौंरों की समृद्ध विविधता दर्ज की है। अध्ययन में अल्पाइन फूलों वाले क्षेत्रों के संरक्षण को पर्यावरण संतुलन के लिए बेहद जरूरी बताया गया।

पूर्वी हिमालय की बर्फीली चोटियों और ठंडी हवाओं के बीच अरुणाचल प्रदेश का तवांग जिला जैव विविधता का अनोखा घर साबित हुआ है। समुद्र तल से हजारों मीटर की ऊंचाई पर जहां वनस्पति बेहद सीमित हो जाती है, वहां जंगली मधुमक्खियों और भौंरों का एक समृद्ध संसार बसता है। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक गहन वैज्ञानिक अध्ययन ने साबित किया है कि ये छोटे परागणकर्ता ऊंचाई वाले कठोर पर्यावरण में भी जीवित रहने के लिए स्थानीय अल्पाइन वनस्पतियों पर गहराई से निर्भर हैं।

सीमाई इलाकों में व्यापक फील्डवर्क

यह सर्वेक्षण नेशनल मिशन ऑन हिमालयन स्टडीज के अंतर्गत 15 सितंबर से 7 अक्टूबर के दौरान संचालित किया गया। अनुसंधान दल ने 2,000 मीटर से लेकर 4,700 मीटर तक की अत्यधिक ऊंचाई वाले भौगोलिक हिस्सों की पड़ताल की। इस दौरान भारत-चीन सीमा के निकटवर्ती अनेक अहम स्थानों जैसे सेला दर्रा, बुमला दर्रा, नागुला, संगेत्सर त्सो, चूमी ग्यात्से जलप्रपात और जांग में जमीनी नमूने जुटाए गए। जोधपुर स्थित भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के डेजर्ट रीजनल सेंटर की टीम ने इस खोज को अंजाम दिया, जिसमें रिसर्च एसोसिएट पूर्णिमा पाठक के नेतृत्व में प्रोजेक्ट असिस्टेंट हाबुंग एल्सा शामिल थीं।

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चार प्रमुख परिवारों की पहचान और फूलों से रिश्ता

अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने मुख्य रूप से चार परिवारों से जुड़ी मधुमक्खियों को चिन्हित किया, जिनमें एपिडे, मेगाचिलिडे, एंड्रिनिडे और हेलिक्टिडे शामिल हैं। शोधकर्ताओं ने खासतौर पर भौंरों की गतिविधियों और उनके पराग व नेक्टर जुटाने की आदतों का बारीकी से निरीक्षण किया। ऊंचे पहाड़ों में पाए जाने वाले अल्पाइन पौधे, जो ट्री-लाइन से ऊपर कठोर बर्फीले मौसम में प्राकृतिक रूप से उगते हैं, इन कीटों के जीवन की रीढ़ हैं।

विशेष रूप से सिरसियम प्रजाति के पौधे, पेटमा मेंटो नाम से स्थानीय तौर पर पहचाना जाने वाला रोज़ कार्पेट नॉटवीड (बिस्टॉर्टा वैसीनिफोलिया) और सिसेरबिटा अल्पीना इन मधुमक्खियों के प्रमुख पोषण स्रोत बनकर उभरे। तवांग में फूलों का मौसम काफी सीमित समय के लिए रहता है, इसलिए कीटों को पूरे चक्र में विविध प्रकार के पौधों की लगातार उपलब्धता की दरकार होती है। इसके अलावा इंसानी बस्तियों के पास तैयार किचन गार्डन, कृषि फार्म और स्थानीय फूलों ने भी आवश्यक पराग आपूर्ति में अहम भूमिका निभाई।

पर्यावरणीय खतरे और भविष्य की योजना

ऊंचाई वाले क्षेत्रों में प्राकृतिक आवासों का क्षरण, मानवीय हस्तक्षेप और जलवायु परिवर्तन के कारण फूलों के खिलने के समय में आ रहा असंतुलन इन परागणकर्ताओं के भोजन चक्र को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक केवल मधुमक्खियों को बचाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उन अल्पाइन चारागाहों और जड़ी-बूटियों का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है जिन पर इनका अस्तित्व टिका है। एकत्र किए गए आंकड़े आने वाले समय में पूर्वी हिमालय में विस्तृत पर्यावास मैपिंग और वैज्ञानिक निगरानी परियोजनाओं के लिए आधार रेखा का कार्य करेंगे।

सवाल-जवाब

तवांग में यह वैज्ञानिक सर्वेक्षण किस संस्था ने किया?
यह अध्ययन भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के जोधपुर स्थित डेजर्ट रीजनल सेंटर की टीम द्वारा किया गया।
फील्डवर्क किन ऊंचाइयों और तारीखों के बीच संपन्न हुआ?
यह शोध 15 सितंबर से 7 अक्टूबर के बीच समुद्र तल से 2,000 से 4,700 मीटर की ऊंचाई पर संचालित हुआ।
तवांग में मधुमक्खियों के कौन से चार परिवार दर्ज किए गए?
वैज्ञानिकों ने एपिडे, मेगाचिलिडे, एंड्रिनिडे और हेलिक्टिडे नामक चार परिवारों की पहचान की।
भौंरों के मुख्य भोजन के रूप में कौन से पौधे सामने आए?
सिरसियम प्रजातियां, पेटमा मेंटो (रोज़ कार्पेट नॉटवीड) और सिसेरबिटा अल्पीना उनके प्राथमिक आहार पाए गए।
अध्ययन दल का नेतृत्व किसने किया?
रिसर्च एसोसिएट पूर्णिमा पाठक ने टीम का नेतृत्व किया, जिसमें प्रोजेक्ट असिस्टेंट हाबुंग एल्सा सहयोगी थीं।
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टिप्पणियाँ 5

Nyra Kaif@nyra-kaif·18 दिन पहले

तवांग के उन बर्फीले रास्तों पर जब मैं पिछली बार ट्रेक कर रही थी, तब इन नन्हे भौंरों को ऐसे ही फूलों पर मंडराते देखा था। कुदरत का जादू है ये।

Arjun Mehta@arjun-mehta·18 दिन पहले

तवांग की इन बर्फीली ऊंचाइयों पर इन छोटी मधुमक्खियों का मिलना सचमुच हैरान करता है। जब भारत-चीन सीमा जैसे संवेदनशील इलाकों की बात होती है, तो अक्सर सिर्फ रणनीतिक हलचल ही ध्यान खींचती है, लेकिन वहाँ का पर्यावरण भी कम दिलचस्प नहीं है।

Aisha Khan@aisha-khan·18 दिन पहले

बिल्कुल अर्जुन, तवांग की सिर्फ रणनीतिक चर्चा ही होती है, लेकिन वहाँ की कुदरत और ऐसी खोजें वाकई चौंकाती हैं।

Rohan Verma@rohan-verma·18 दिन पहले

तवांग की इस ठंड और बर्फीली ऊंचाइयों में भी इतनी समृद्ध जैव विविधता देखकर हैरानी होती है। क्या जलवायु परिवर्तन की वजह से इन छोटे जीवों का जीवन खतरे में पड़ रहा है?

Ravikash Gupta@ravikash·18 दिन पहले

रोहन जी, 4,700 मीटर की ऊंचाई पर भी इन जीवों का मिलना वाकई हैरान करता है।

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