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असम का सीडब्ल्यूआरसी पूरा कर रहा है वन्यजीव संरक्षण के पच्चीस साल, दस हजार से अधिक जीवों को बचायाअसम
30 अग॰ 2026, 4:25 pm (32 दिन पहले)· 3

असम का सीडब्ल्यूआरसी पूरा कर रहा है वन्यजीव संरक्षण के पच्चीस साल, दस हजार से अधिक जीवों को बचाया

असम के प्रसिद्ध वन्यजीव पुनर्वास केंद्र सीडब्ल्यूआरसी ने सेवा के 25 वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस दौरान संस्थान ने दस हजार से ज्यादा बेसहारा और घायल जानवरों का रेस्क्यू कर उन्हें सुरक्षित प्राकृतिक आवास में वापस भेजा है।

असम का अग्रणी वन्यजीव बचाव, चिकित्सा और पुनर्वास संस्थान सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ रिहैबिलिटेशन एंड कंजर्वेशन यानी सीडब्ल्यूआरसी ने अपनी सेवा के पच्चीस साल पूरे कर लिए हैं। अधिकारियों ने रविवार को जानकारी दी कि इस सफर के दौरान संस्थान ने दस हजार से अधिक जंगली जानवरों को बचाया है। यह केंद्र असम के काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और टाइगर रिजर्व के पास पानबाड़ी में स्थित है। इसकी स्थापना अट्ठाइस अगस्त दो हजार दो को की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य घायल, अनाथ और विस्थापित वन्यजीवों को विशेष चिकित्सा प्रदान करना और उन्हें वापस उनके प्राकृतिक परिवेश में सुरक्षित छोड़ना है।

साझेदारी और मान्यता प्राप्त संस्थान

यह केंद्र वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया, इंटरनेशनल फंड फॉर एनिमल वेलफेयर और असम वन विभाग की एक संयुक्त पहल है, जिसे केंद्र सरकार के पशु कल्याण विभाग का भी सहयोग प्राप्त है। इसके अलावा, इस केंद्र को सेंट्रल जू अथॉरिटी द्वारा मान्यता दी गई है। अपनी स्थापना के बाद से ही इस केंद्र और इसकी मोबाइल वेटरनरी सर्विस इकाइयों ने दस हजार से ज्यादा वन्यजीव बचाव मामलों को संभाला है। इनमें से लगभग अडसठ प्रतिशत जानवरों का सफल इलाज करके उन्हें दोबारा जंगलों में छोड़ा जा चुका है।

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मंत्री का बयान और प्रमुख प्रजातियां

असम के वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री जयंत मल्ला बरुआ ने कहा कि केंद्र की पच्चीसवीं वर्षगांठ असम की वन्यजीव संरक्षण यात्रा में एक उल्लेखनीय मील का पत्थर साबित हुई है। उन्होंने बताया कि इन वर्षों में केंद्र ने घायल, अनाथ और विस्थापित जंगली जीवों को जीवन का एक नया अवसर प्रदान किया है। इन लंबे वर्षों के दौरान केंद्र की टीमों ने गैंडे के बच्चों, एशियाई काले भालू के बच्चों, हुलॉक गिब्बन और जंगली भैंसों सहित कई प्रकार की प्रजातियों का रेस्क्यू किया है। इन सभी जीवों को आवश्यक चिकित्सा दी जाती है और जरूरत पड़ने पर उन्हें इंसानी देखरेख में पाला जाता है, ताकि वे उपयुक्त आवास में छोड़े जाने के लिए पूरी तरह तैयार हो सकें।

बाढ़ के दौरान राहत कार्य और समुदाय की भूमिका

अपनी दो मोबाइल वेटरनरी सर्विस इकाइयों के साथ यह केंद्र पूर्वी और पश्चिमी असम तक अपनी सेवाएं पहुंचाता है। यह टीम आपातकालीन पशु चिकित्सा देखभाल मुहैया कराती है और वैज्ञानिक रूप से स्थापित प्रोटोकॉल के जरिए स्वस्थ हो चुके जीवों को वापस छोड़ती है। बाढ़ के समय वन्यजीवों का बचाव करना इस केंद्र के कामकाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा रहा है। मानसून की बाढ़ के दौरान केंद्र के कर्मी वन विभाग के साथ मिलकर फंसे, घायल या बेघर हुए जानवरों को सुरक्षित बाहर निकालते हैं। वे तुरंत पशु चिकित्सा सहायता प्रदान करते हैं और छोटे बच्चों को उनकी मां से मिलाने के लिए हरसंभव प्रयास करते हैं। इसके अलावा, केंद्र मानव-पक्षी और मानव-पशु संघर्ष को कम करने तथा संरक्षण में जनता की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर जागरूकता और आउटरीच कार्यक्रम भी चलाता है।

सवाल-जवाब

सीडब्ल्यूआरसी की स्थापना कब और कहाँ हुई थी?
इस केंद्र की स्थापना 28 अगस्त 2002 को असम के काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और टाइगर रिजर्व के पास पानबाड़ी में की गई थी।
इस केंद्र की स्थापना में कौन-कौन सी संस्थाएं शामिल हैं?
यह केंद्र वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया, इंटरनेशनल फंड फॉर एनिमल वेलफेयर और असम वन विभाग की एक संयुक्त पहल है, जिसे केंद्र सरकार का सहयोग प्राप्त है।
अब तक इस केंद्र ने कितने जानवरों का रेस्क्यू किया है?
अपनी स्थापना के बाद से इस केंद्र ने 10,000 से अधिक वन्यजीव बचाव मामलों को संभाला है।
बचाए गए जानवरों में से कितने प्रतिशत को वापस जंगल में छोड़ा गया?
बचाए गए जानवरों में से लगभग 68 प्रतिशत जीवों का सफल इलाज कर उन्हें वापस जंगल में छोड़ा गया है।
इस केंद्र में मुख्य रूप से कौन से जानवर बचाए जाते हैं?
यहाँ गैंडे के बच्चे, एशियाई काले भालू के बच्चे, हुलॉक गिब्बन और जंगली भैंस जैसी विभिन्न प्रजातियों का रेस्क्यू किया जाता है।
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