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बालोद के कृषि वैज्ञानिक ने बताया, धान में यूरिया डालते समय किसान अक्सर कर बैठते हैं ये चूकछत्तीसगढ़
7 सित॰ 2026, 6:13 am (18 दिन पहले)· 2

बालोद के कृषि वैज्ञानिक ने बताया, धान में यूरिया डालते समय किसान अक्सर कर बैठते हैं ये चूक

कृषि विज्ञान केंद्र बालोद के मृदा वैज्ञानिक डॉ एआर गौर ने धान की खड़ी फसल में यूरिया डालने का सही तरीका, सही समय और सही मात्रा बताई है ताकि किसानों की मेहनत और पैसा दोनों बर्बाद न हों.

छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में इन दिनों धान की फसल कंसा फूटने की अवस्था में पहुंच चुकी है, और यही वह समय है जब किसान बड़ी संख्या में खेतों में उर्वरक डालने में जुटे हैं. लेकिन कृषि विज्ञान केंद्र बालोद के मृदा वैज्ञानिक डॉ एआर गौर का कहना है कि अगर इस दौरान थोड़ी सी भी लापरवाही हो जाए तो यूरिया पर खर्च किया गया पैसा और मेहनत दोनों बेकार जा सकते हैं.

यूरिया ही टॉप ड्रेसिंग के लिए सही उर्वरक क्यों

डॉ गौर के मुताबिक खड़ी फसल में उर्वरक डालने की प्रक्रिया को टॉप ड्रेसिंग कहते हैं, और धान में इसके लिए सबसे उपयुक्त उर्वरक यूरिया ही है. डीएपी, सुपर फास्फेट और पोटाश जैसे उर्वरकों की जगह खेत में जुताई या रोपाई से पहले ही मिट्टी में मिला देनी चाहिए. इसकी वजह यह है कि फास्फोरस और पोटाश जैसे तत्व मिट्टी में आसानी से घुलते नहीं और पौधे की जड़ें इन्हें तभी बेहतर तरीके से सोख पाती हैं जब ये पहले से मिट्टी में मौजूद हों. खड़ी फसल में इन्हें ऊपर से डालने का फायदा उतना नहीं मिलता जितना उम्मीद की जाती है.

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खेत में पानी की मात्रा पर रखें नजर

डॉ गौर ने साफ कहा कि अगर खेत में पानी पूरी तरह भरा हुआ है तो उस हालत में यूरिया बिल्कुल न डालें. ऐसा करने पर यूरिया पानी के साथ बह जाता है या मिट्टी की निचली परतों में रिसकर बर्बाद हो जाता है, जिसे लीचिंग कहा जाता है. नतीजा यह होता है कि पौधे को नाइट्रोजन का लाभ मिलने से पहले ही खाद खेत से बाहर निकल जाती है. उनके मुताबिक टॉप ड्रेसिंग के लिए सही स्थिति यह है कि खेत में सिर्फ हल्की नमी या छपछपाहट भर हो, पानी लबालब न भरा हो.

डीएपी का छिड़काव और जिंक मिलाना कितना नुकसानदेह

डॉ गौर ने यह भी बताया कि आजकल कुछ किसान धान की खड़ी फसल पर सीधे डीएपी का छिड़काव करने लगे हैं, जो सही तरीका नहीं है. डीएपी को हमेशा बुआई या रोपाई से पहले ही मिट्टी में मिलाना चाहिए, ऊपर से छिड़कने पर पौधे को उसका पूरा फायदा नहीं मिलता. इसके अलावा कुछ किसान डीएपी के साथ जिंक मिलाकर छिड़काव कर रहे हैं, जिससे भी बचना चाहिए. डॉ गौर के अनुसार दोनों को एक साथ मिलाने पर पौधे को न तो फास्फोरस का पूरा लाभ मिलता है और न ही जिंक का, यानी दोनों उर्वरकों की ताकत आपस में ही कम हो जाती है.

कंसा अवस्था में यूरिया की तीन खुराक का पूरा गणित

डॉ गौर के अनुसार धान की फसल इस समय कंसा निकलने की अवस्था में है, जो टॉप ड्रेसिंग के लिहाज से बेहद अहम पड़ाव है. इस दौरान यूरिया के साथ जिंक सल्फेट मिलाकर देने से पौधे को नाइट्रोजन के साथ जिंक भी मिल जाता है, जिसका सीधा फायदा फसल की बढ़वार को मिलता है. सामान्य तौर पर धान के लिए एक एकड़ में कुल 70 से 80 किलो यूरिया की जरूरत बताई गई है, जिसे तीन बार में बांटकर देना चाहिए. रोपाई के करीब एक हफ्ते के भीतर पहली खुराक के तौर पर 20 से 25 किलो प्रति एकड़ यूरिया दिया जाना चाहिए. इसके बाद 30 से 35 दिन के आसपास, जब कंसा निकलने लगे, तब दूसरी खुराक के रूप में 30 से 35 किलो प्रति एकड़ यूरिया डालना चाहिए. आखिर में करीब 60 दिन की अवस्था पर तीसरी और अंतिम खुराक के तौर पर 20 से 30 किलो प्रति एकड़ यूरिया दिया जा सकता है.

सवाल-जवाब

टॉप ड्रेसिंग किसे कहते हैं?
खड़ी फसल में सीधे उर्वरक डालने की प्रक्रिया को टॉप ड्रेसिंग कहा जाता है.
धान की टॉप ड्रेसिंग के लिए सबसे उपयुक्त उर्वरक कौन सा है?
डॉ एआर गौर के मुताबिक टॉप ड्रेसिंग के लिए मुख्य रूप से यूरिया का इस्तेमाल करना चाहिए.
डीएपी, सुपर फास्फेट और पोटाश कब डालने चाहिए?
इन्हें टॉप ड्रेसिंग के बजाय बुआई या रोपाई से पहले ही मिट्टी में मिला देना चाहिए.
खेत में पानी भरा हो तो यूरिया डालना क्यों नुकसानदायक है?
पानी भरे होने पर यूरिया पानी के साथ बह जाता है या लीचिंग के कारण मिट्टी में रिसकर बर्बाद हो जाता है.
धान में एक एकड़ के लिए कुल कितना यूरिया चाहिए?
सामान्य तौर पर एक एकड़ में कुल 70 से 80 किलो यूरिया की सिफारिश की गई है, जिसे तीन खुराक में दिया जाता है.
कंसा अवस्था में यूरिया के साथ क्या मिलाना फायदेमंद है?
डॉ गौर के मुताबिक कंसा आने की अवस्था में यूरिया के साथ जिंक सल्फेट मिलाकर देना फायदेमंद हो सकता है.
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Ravikash Gupta@ravikash·17 दिन पहले

यह खबर केवल कृषि तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और इनपुट कॉस्ट के प्रबंधन से जुड़ी है। जब किसान यूरिया या डीएपी के गलत इस्तेमाल से बचते हैं, तो उनकी प्रति एकड़ उत्पादन लागत घटती है और शुद्ध आय में सुधार होता है। यह वित्तीय अनुशासन कृषि स्टार्टअप्स और एग्रटेक सेक्टर के लिए भी एक बड़ा संकेत है कि भारतीय ग्रामीण बाजार में सॉइल हेल्थ और लागत अनुकूलन पर आधारित डिजिटल सलाह की मांग तेजी से बढ़ रही है, जिससे भविष्य में उर्वरक आपूर्ति और मूल्य श्रृंखला पर सीधा प्रभाव पड़ेगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·17 दिन पहले

यह नीतिगत पहलू से जुड़ा है कि उर्वरक सब्सिडी और ग्रामीण वित्तीय प्रबंधन का सीधा असर राजनीतिक एजेंडे पर पड़ता है। जब कृषि इनपुट के गलत इस्तेमाल से किसानों की लागत बढ़ती है, तो यह सरकारी नीतियों और कृषि कल्याण योजनाओं की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता है। आने वाले चुनावों में ग्रामीण और कृषक वर्ग के बीच इनपुट कॉस्ट, खाद की समय पर उपलब्धता और सॉइल हेल्थ कार्ड जैसी सरकारी पहलों का क्रियान्वयन अहम चुनावी मुद्दे बनेंगे।

Rohan Verma@rohan-verma·18 दिन पहले

यह तकनीकी मार्गदर्शन केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश के प्रमुख धान उत्पादक क्षेत्रों जैसे तराई और पूर्वांचल के किसानों के लिए भी बेहद प्रासंगिक है। खासकर जब खाद संकट और कालाबाजारी की खबरें अक्सर प्रशासनिक विफलता का मुद्दा बनती हैं, तब सही मात्रा और समय का यह वैज्ञानिक ज्ञान किसानों की लागत को सीधे तौर पर नियंत्रित कर सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·18 दिन पहले

रोहन वर्मा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए यह जोड़ना जरूरी है कि रासायनिक उर्वरकों के गलत इस्तेमाल से न केवल किसानों की आर्थिक लागत बढ़ती है, बल्कि मृदा स्वास्थ्य भी तेजी से गिर रहा है। जब खाद पानी में घुलकर लीचिंग के जरिए बहती है, तो यह भूजल को भी प्रदूषित करती है, जो पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता का विषय है। कृषि विज्ञान केंद्रों की ऐसी तकनीकी सलाह यदि सही समय पर जमीन पर उतरे, तो यह प्रशासनिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर राहत दे सकती है।

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