कोहिमा में एक बड़े विरोध प्रदर्शन के दौरान एक प्रमुख धार्मिक संस्था ने विदेशी फंडिंग नियमों में प्रस्तावित बदलावों और सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत गाने की अनिवार्यता के खिलाफ आवाज उठाई। नागालैंड जॉइंट क्रिश्चियन फोरम (NJCF) द्वारा आयोजित इस सभा में कोहिमा में बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए। इस प्रदर्शन का उद्देश्य धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करना, संवैधानिक अधिकारों को बनाए रखना और देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को सुरक्षित रखना था। प्रदर्शनकारियों ने इस बात पर जोर दिया कि हालिया नीतिगत बदलावों से पूर्वोत्तर क्षेत्र में अल्पसंख्यक समुदायों और लोकतांत्रिक परंपराओं पर गहरा असर पड़ सकता है।
सभा को संबोधित करते हुए NJCF के अध्यक्ष एन पफिनो ने स्पष्ट किया कि इस प्रदर्शन को देश, संविधान या राज्य सरकार के विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके बजाय, उन्होंने इसे अपनी आस्था, सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर पैदा हुई चिंताओं को शांतिपूर्ण ढंग से व्यक्त करने का एक माध्यम बताया। उन्होंने जोर देकर कहा कि ईसाई आस्था और नागा पहचान का देशभक्ति के साथ कोई टकराव नहीं है।
अंतरात्मा की आवाज और पहचान की रक्षा
भीड़ को संबोधित करते हुए एन पफिनो ने देशभक्ति और राष्ट्रीय एकता के वास्तविक अर्थ पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद का मतलब अपनी पहचान को नष्ट करना नहीं है, और देशभक्ति का यह अर्थ कतई नहीं है कि कोई व्यक्ति अपनी अंतरात्मा की आवाज को दबा दे। इस मंच के अनुसार, भारत की असली ताकत उसकी विविध संस्कृति में निहित है, और देश को एकजुट रखने के लिए किसी भी तरह की सांस्कृतिक या धार्मिक एकरूपता थोपने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
सरकारी कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम' गाने को अनिवार्य बनाने के मुद्दे पर भी रैली में गंभीर चर्चा हुई। फोरम ने कहा कि जिन लोगों की धार्मिक मान्यताएं उन्हें इस गीत को गाने की अनुमति नहीं देतीं, उन्हें इसके लिए विवश नहीं किया जाना चाहिए। एन पफिनो ने इसे देशभक्ति की परीक्षा के बजाय पूरी तरह से अंतरात्मा की स्वतंत्रता का मामला बताया। उन्होंने सरकार से यह सुनिश्चित करने की मांग की कि इस गीत को गाने से इनकार करने वाले किसी भी नागरिक को किसी भी तरह से प्रताड़ित या परेशान न किया जाए।
राष्ट्रपति को भेजा गया ज्ञापन
रैली के समापन के बाद, NJCF ने अपनी मांगों और चिंताओं को लेकर भारत के राष्ट्रपति को संबोधित एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन को कोहिमा स्थित लोक भवन के माध्यम से भेजा गया। इस ज्ञापन में केवल मुख्य मुद्दों को ही नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर क्षेत्र को प्रभावित करने वाली कई अन्य पुरानी समस्याओं को भी रेखांकित किया गया। इनमें क्षेत्र में प्रोटेक्टेड एरिया परमिट (PAP) व्यवस्था को जारी रखने और आर्म्ड फोर्सेज एक्ट के निरंतर लागू रहने जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल थे।
FCRA संशोधन और जमीनी स्तर पर इसके प्रभाव
विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) में प्रस्तावित संशोधनों को लेकर NJCF ने अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। मंच ने आरोप लगाया कि वित्तीय नियमों के नाम पर ईसाई संगठनों को चुनिंदा रूप से निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने उन आरोपों को पूरी तरह से खारिज कर दिया जिनमें यह कहा गया था कि ईसाई संस्थाओं को मिलने वाले विदेशी फंड का उपयोग जबरन धर्म परिवर्तन के लिए किया जाता है। मंच ने स्पष्ट किया कि इन फंड्स का उपयोग पूरी तरह से धर्मार्थ कार्यों, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए किया जाता है, जिससे समाज के हाशिए पर मौजूद और कमजोर वर्गों को सीधा लाभ मिलता है।
हालांकि, फोरम ने स्पष्ट किया कि वे FCRA के सख्त कार्यान्वयन के खिलाफ नहीं हैं। उनका मानना है कि जो भी संगठन नियमों का उल्लंघन करता पाया जाए, उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए और उसका लाइसेंस भी रद्द किया जाना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने इन संशोधनों की समीक्षा कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) से अपील की कि वे इस मामले में जमीनी स्तर के लाभार्थियों सहित सभी हितधारकों के साथ व्यापक चर्चा करें। फोरम ने सुझाव दिया कि JPC के सदस्यों को जमीनी हकीकत जानने के लिए दूरदराज के क्षेत्रों का दौरा करना चाहिए ताकि अंतिम सिफारिशें तैयार करने से पहले इन संशोधनों के वास्तविक प्रभाव का सही आकलन किया जा सके।



















