भारतीय वायुसेना ने सीमा पार सटीक हवाई हमले कर रणनीतिक सैन्य ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है. वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने 3 अक्टूबर को इस अहम मिशन के सामरिक पहलुओं की जानकारी साझा की. उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिक लड़ाकू विमानों और लंबी दूरी के गाइडेड हथियारों की मदद से सीमा पार दबाव बनाया गया, जिससे दूसरी ओर मौजूद सर्विलांस रडार सिस्टम पूरी तरह जमींदोज हो गए. इस आक्रामक अभियान के दौरान रनवे, हैंगर, कमांड एंड कंट्रोल सेंटर और संवेदनशील सैन्य प्रतिष्ठानों को पिन-पॉइंट एक्यूरेसी के साथ निशाना बनाया गया.
अभियान के सामरिक लक्ष्य और एकीकृत रक्षा कवच
एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने बताया कि वायुसेना ने तय किए गए सभी प्राथमिक सैन्य उद्देश्यों को सफलतापूर्वक हासिल कर लिया है. हमले के दौरान जमीन पर बने महत्वपूर्ण ठिकानों को बर्बाद कर रणनीतिक बढ़त हासिल की गई. इसके साथ ही भारत के इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस सिस्टम (IADS) ने देश की सीमाओं पर एक अभेद्य सुरक्षा चक्र तैयार रखा, जिससे विरोधी का कोई भी लड़ाकू विमान या हथियार भारतीय हवाई क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सका. सीमावर्ती इलाकों में खतरा पैदा करने वाले संदिग्ध विमानों को हवा में ही मार गिराकर देश की वायु रक्षा प्रणाली की अचूक क्षमता को साबित किया गया.
वैश्विक हथियार संकट और आत्मनिर्भरता का महत्व
मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात पर बात करते हुए एयर चीफ ने स्पष्ट किया कि दुनिया भर में जारी टकरावों के कारण कई देशों में सैन्य साजो-सामान और गोला-बारूद के भंडार तेजी से घट रहे हैं. विमानों, हथियारों और तकनीकी प्रणालियों की उपलब्धता के साथ-साथ लॉजिस्टिक सप्लाई चेन पर भारी दबाव बना हुआ है. इस पृष्ठभूमि में उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत के लिए रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना अब कोई विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्य जरूरत बन चुका है. हथियारों के निरंतर प्रवाह और सुरक्षा तैयारियों को मजबूत रखने के लिए घरेलू स्तर पर मजबूत उत्पादन तंत्र विकसित करना बेहद अहम है.
ड्रोन तकनीक का मौजूदा ढांचे में समन्वय
मानवरहित प्रणालियों पर अपना दृष्टिकोण रखते हुए वायुसेना प्रमुख ने कहा कि ड्रोन के लिए अलग से कोई नया सैन्य बल गठित करने का औचित्य नहीं है. इसके बजाय ड्रोन को वर्तमान सैन्य ढांचे का अभिन्न अंग बनाकर अन्य प्रणालियों के साथ तालमेल में इस्तेमाल किया जाना चाहिए. उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय वायुसेना ड्रोन तकनीक को किसी अचानक आए क्रांतिकारी बदलाव के तौर पर नहीं, बल्कि एक क्रमिक तकनीकी विकास के रूप में देखती है. इसलिए जरूरी है कि इन प्रणालियों को मौजूदा क्षमताओं के साथ पूरी तरह एकीकृत करके ही युद्धक्षेत्र में तैनात किया जाए.


















