खरीदारी करते समय अक्सर ग्राहकों को खराब सामान थमा दिया जाता है या ऑनलाइन ऑर्डर करने पर डिफेक्टिव प्रोडक्ट की डिलीवरी हो जाती है. ऐसे मामलों में दुकानदार या कंपनियां अक्सर पल्ला झाड़ लेती हैं, लेकिन उपभोक्ता संरक्षण कानून 2019 ग्राहकों को ऐसे मामलों में कड़ा कानूनी संरक्षण प्रदान करता है. इस कानून के तहत लापरवाही बरतने वाले व्यापारियों पर लाखों रुपये का जुर्माना लग सकता है और वे उपभोक्ता को मुआवजा देने के लिए बाध्य होते हैं. जिला उपभोक्ता फोरम दरभंगा के प्रभारी अध्यक्ष पीयूष कमल दीक्षित ने उपभोक्ता अधिनियम 2019 के विभिन्न कानूनी प्रावधानों और अधिकारों की कार्यप्रणाली साझा की है.
वस्तुओं और सेवाओं दोनों पर समान रूप से लागू होते हैं नियम
उपभोक्ता अधिनियम केवल भौतिक वस्तुओं की खरीद तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह सेवा क्षेत्र पर भी समान रूप से लागू होता है. यदि बैंकिंग सेक्टर, पोस्टल डिपार्टमेंट, बिजली विभाग या कोई भी निजी व सरकारी सेवा प्रदाता आपसे तय दर से अधिक पैसे वसूलता है, या फिर दी गई सेवा की गुणवत्ता सही नहीं है, तो उसके खिलाफ विधिवत शिकायत की जा सकती है. इसके अलावा यदि आपने कोई नई गाड़ी या मशीनरी खरीदी है और उसमें शुरुआत से ही कोई मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट यानी निर्माण संबंधी तकनीकी खराबी सामने आती है, तो यह कानून सीधे तौर पर ग्राहक के अधिकारों की रक्षा करता है.
ई-जागृति पोर्टल से आवेदन और स्थानीय क्षेत्राधिकार के नियम
अगर किसी वस्तु या सेवा के लिए पूरा भुगतान करने के बावजूद विक्रेता डैमेज सामान सौंपता है, तय शर्तों पर खरा नहीं उतरता और ग्राहक की शिकायत का समाधान करने से इनकार करता है, तो ऐसी स्थिति में जिला उपभोक्ता फोरम हस्तक्षेप करता है. उपभोक्ता अपनी शिकायत घर बैठे आधिकारिक ई-जागृति पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन दर्ज करा सकते हैं. इसके लिए एक आवश्यक शर्त यह है कि संबंधित दुकान अथवा सेवा प्रदाता स्थानीय क्षेत्र का हो, या फिर शिकायतकर्ता उस जिले का मूल निवासी हो. यदि कोई शिकायतकर्ता उस जिले का मूल निवासी नहीं है, तो उसे अपने आवेदन के साथ वैध रेंट एग्रीमेंट संलग्न करना अनिवार्य होता है.
ई-कॉमर्स का दायरा और तीन महीने में त्वरित फैसले का प्रावधान
वर्ष 2019 से पहले पुराने उपभोक्ता कानूनों में ई-कॉमर्स यानी ऑनलाइन खरीदारी के लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान शामिल नहीं थे. हालांकि वर्ष 2019 में लागू हुए नए उपभोक्ता कानून के बाद ऑनलाइन मार्केटिंग और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स को भी पूरी तरह से इस कानूनी परिधि के तहत लाया गया है. पीड़ित ग्राहक अपने ऑनलाइन ट्रांजैक्शन डॉक्यूमेंट्स, बिल और छोटे-छोटे डिजिटल साक्ष्यों को संलग्न करके ई-जागृति पोर्टल पर आसानी से आवेदन दाखिल कर सकते हैं.
शिकायत दर्ज होने के बाद फोरम द्वारा इसे औपचारिक रूप से एडमिट किया जाता है, जिसके तुरंत बाद विपक्षी व्यापारी या कंपनी को कानूनी नोटिस जारी होता है. यदि विपक्षी पक्ष तय समय सीमा के भीतर फोरम के समक्ष उपस्थित होकर अपना पक्ष प्रस्तुत नहीं करता है, तो फोरम द्वारा एकपक्षीय निर्णय भी सुनाया जा सकता है. यह सामान्य दीवानी अदालतों की तरह वर्षों चलने वाली लंबी प्रक्रिया नहीं है. कानून के अनुसार फोरम को अधिकतम 3 महीने के भीतर पूरे मामले की सुनवाई पूरी कर अंतिम फैसला देना होता है, जिससे पीड़ित उपभोक्ता को समय पर उचित मुआवजा और न्याय सुनिश्चित हो सके.


















