मध्य एशिया में जारी सैन्य संघर्ष और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच कूटनीतिक हलचलों का दौर तेज हो गया है। पूरे क्षेत्र में मिसाइल हमलों और अस्थिरता के माहौल के बीच भारत समेत कई देश स्थायी शांति की राह तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में बिश्केक में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) समिट के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की अहम द्विपक्षीय मुलाकात हुई। इस मुलाकात के तुरंत बाद वाशिंगटन की ओर से प्रतिक्रिया सामने आई है। अमेरिका ने स्पष्ट संदेश जारी करते हुए उन देशों को सचेत किया है जो तेहरान के साथ आर्थिक समझौते करने की योजना बना रहे हैं या अमेरिकी प्रतिबंधों का असर कम करने में उसकी मदद कर रहे हैं।
बिश्केक में द्विपक्षीय बातचीत और चाबहार पोर्ट पर चर्चा
सोमवार को बिश्केक में हुई यह बैठक अमेरिका और ईरान के बीच हालिया सैन्य संघर्ष भड़कने के बाद दोनों शीर्ष नेताओं की पहली सीधी बातचीत थी। बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि भारत ईरान के साथ अपने द्विपक्षीय व्यापार के दायरे को और अधिक बढ़ाना चाहता है तथा उसमें विविधता लाने का पक्षधर है। इसके साथ ही उन्होंने पश्चिम एशिया में शांति, स्थिरता और सुरक्षा की बहाली के लिए नई दिल्ली के निरंतर समर्थन को दोहराया। वार्ता के दौरान दोनों नेताओं ने संघर्ष से प्रभावित आम नागरिकों की सुरक्षा, असैन्य बुनियादी ढांचे के बचाव और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों में नेविगेशन की स्वतंत्रता की आवश्यकता पर गंभीर चर्चा की।
बातचीत के दौरान ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से एक विशेष आग्रह किया। उन्होंने कहा कि भारत के पास संघर्ष में शामिल विभिन्न पक्षों के साथ बेहतर और व्यापक कूटनीतिक संबंध हैं, इसलिए भारत को अपनी इस स्थिति का इस्तेमाल वार्ता को बढ़ावा देने और लड़ाई को समाप्त कराने के लिए करना चाहिए। इसके अलावा, दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल ने चाबहार पोर्ट परियोजना के भविष्य पर भी विचार-विमर्श जारी रखा। चाबहार पोर्ट भारत और ईरान के बीच क्षेत्रीय कनेक्टिविटी का एक बेहद महत्वपूर्ण जरिया माना जाता है। हालांकि, अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों की वजह से इस रणनीतिक प्रोजेक्ट के संचालन और भावी योजनाओं पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का बयान और व्यापारिक समझौते पर स्थिति
नरेंद्र मोदी और मसूद पेजेश्कियान की इस उच्चस्तरीय बैठक के बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बुधवार को वाशिंगटन का रुख स्पष्ट किया। उनसे जब पूछा गया कि क्या भारत और ईरान किसी नए व्यापारिक समझौते की तैयारी कर रहे हैं, तो उन्होंने ऐसी किसी भी संभावना को खारिज कर दिया। मार्को रुबियो ने साफ तौर पर कहा कि उन्हें नहीं लगता कि भारत और ईरान के बीच किसी प्रकार के ट्रेड डील को लेकर कोई बातचीत चल रही है। उन्होंने स्वीकार किया कि दुनिया का हर संप्रभु राष्ट्र अपनी स्वतंत्र विदेश नीति निर्धारित करता है और कई देश अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ईरानी सरकार के साथ संवाद बनाए रखते हैं।
मार्को रुबियो ने अपनी बात को और विस्तार देते हुए कहा कि स्वयं अमेरिका ने भी अतीत में विभिन्न अवसरों पर ईरानी अधिकारियों के साथ सीधे संपर्क साधे हैं और कुछ विषयों पर बातचीत की है। इसलिए किसी देश का ईरानी नेतृत्व से मिलना असामान्य नहीं है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि औपचारिक वार्ताओं और ईरान को आर्थिक राहत देने वाले नए व्यापारिक समझौतों के बीच एक स्पष्ट अंतर है।
प्रतिबंधों के उल्लंघन पर वाशिंगटन की चेतावनी और ट्रंप प्रशासन का रुख
अपने वक्तव्य में अमेरिकी विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वाशिंगटन की विदेश नीति और रुख को पूरी तरह से पारदर्शी और स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने कहा कि दुनिया के किसी भी देश को ऐसे रास्ते तलाशने में तेहरान की मदद नहीं करनी चाहिए, जिससे अमेरिकी प्रतिबंधों का प्रभाव कम हो सके। वाशिंगटन का मानना है कि यदि ईरान को पाबंदियां दरकिनार कर राजस्व जुटाने के मौके मिलेंगे, तो उन संसाधनों का उपयोग आतंकवाद को बढ़ावा देने और परमाणु हथियारों के विकास में किया जा सकता है।
मार्को रुबियो ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि कोई देश या संस्था अमेरिकी प्रतिबंधों को दरकिनार कर ईरान की वित्तीय मदद करने या उसे कमाई के नए जरिए मुहैया कराने का फैसला करती है, तो अमेरिका के पास उन देशों के खिलाफ भी दंडात्मक प्रतिबंध लगाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। यह बयान दिखाता है कि वाशिंगटन ईरान पर आर्थिक दबाव की अपनी नीति में किसी भी तरह की ढील देने के मूड में नहीं है।
पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत की कूटनीतिक संतुलन नीति
अमेरिकी विदेश मंत्री की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत एक तरफ ईरान के साथ अपने पारंपरिक, कूटनीतिक और आर्थिक संबंधों को बनाए हुए है, वहीं दूसरी तरफ पश्चिम एशिया संकट के बीच अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक साझेदारी को भी मजबूती से आगे बढ़ा रहा है। नई दिल्ली का हमेशा से मानना रहा है कि क्षेत्रीय विवादों और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को केवल बातचीत और कूटनीति के माध्यम से ही सुलझाया जा सकता है।
भारतीय विदेश मंत्रालय का रुख स्पष्ट है कि किसी भी देश की संप्रभुता का सम्मान करते हुए हिंसा का रास्ता छोड़ा जाना चाहिए। इसके साथ ही भारत को अपने राष्ट्रीय हितों, व्यापारिक सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी परियोजनाओं की रक्षा भी करनी है। यही वजह है कि भारत वैश्विक मंचों पर शांति की अपील करने के साथ-साथ चाबहार पोर्ट जैसे दूरगामी हितों वाली परियोजनाओं पर अपनी बातचीत जारी रखे हुए है।





















