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हरिद्वार की ढाई सौ साल पुरानी सेठ सूरजमल धर्मशाला, जहां आज भी मामूली शुल्क पर मिलती है शरणउत्तराखंड
4 सित॰ 2026, 6:17 am (19 मिनट पहले)· 2

हरिद्वार की ढाई सौ साल पुरानी सेठ सूरजमल धर्मशाला, जहां आज भी मामूली शुल्क पर मिलती है शरण

हरिद्वार में हर की पौड़ी के नजदीक स्थित सेठ सूरजमल धर्मशाला करीब ढाई सौ साल पुरानी है। ब्रिटिश काल में बनी इस ऐतिहासिक इमारत में आज भी यात्रियों से कोई व्यावसायिक किराया नहीं लिया जाता है।

उत्तराखंड के प्रमुख शहर हरिद्वार में प्राचीन काल की कई निशानियां आज भी अपनी खास पहचान के साथ मौजूद हैं। हर की पौड़ी के करीब अपर रोड पर स्थित सेठ सूरजमल धर्मशाला इन्हीं पुरानी और महत्वपूर्ण विरासतों में गिनी जाती है। करीब ढाई सौ साल पुरानी इस इमारत को उस समय की संस्कृति और वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना माना जाता है।

यह पुरानी धर्मशाला प्रसिद्ध हर की पौड़ी से सिर्फ 300 मीटर की दूरी पर मुख्य रास्ते पर ही बनी हुई है और हरिद्वार नगर कोतवाली से लगभग 100 मीटर आगे स्थित है। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान एक परोपकारी सेठ ने इस बड़े भवन को बनवाया था ताकि दूर-दराज के इलाकों से पैदल या बैलगाड़ियों के जरिए गंगा स्नान और धार्मिक कार्यों के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को सुरक्षित रहने की जगह मिल सके।

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पुराने समय में तीर्थयात्रा को भौतिक सुख-सुविधाओं से दूर मानसिक शांति और साधना का साधन माना जाता था। उस दौर की वास्तुकला को दर्शाती यह इमारत आज भी अपनी सादगी और पुरानी मर्यादाओं को पूरी तरह से बचाकर रखती है। यहां आने वाले लोग आधुनिक सुविधाओं की परवाह किए बिना जमीन पर आराम करते थे और अपनी धार्मिक यात्रा पूरी करते थे।

इस ढाई सौ साल पुरानी इमारत में कुल 53 कमरे बने हुए हैं जिनकी बनावट पुराने समय की याद ताजा कराती है। इस जगह ठहरने के नियम काफी सख्त और अनुशासित हैं क्योंकि यहां केवल परिवार के साथ आने वाले श्रद्धालुओं को ही कमरे दिए जाते हैं। किसी भी अकेले या बिना परिवार के पहुंचे यात्री को यहां रहने की अनुमति नहीं दी जाती है।

धर्मशाला के मैनेजर श्रीनिवास पांडे बताते हैं कि व्यवस्था को ठीक रखने के लिए परिसर के खुलने और बंद होने का समय तय किया गया है। इस जगह की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह आज भी पूरी तरह से सेवा की भावना से चलाई जाती है। यहां आने वाले लोगों से कोई भी व्यावसायिक किराया नहीं वसूला जाता है, बल्कि केवल बिजली और पानी के खर्च के तौर पर प्रति व्यक्ति 100 या 120 रुपए ही लिए जाते हैं।

श्रीनिवास पांडे ने आगे बताया कि इस ऐतिहासिक भवन की स्थिति और इसके आसपास का नजारा बेहद खूबसूरत है। शिवालिक पहाड़ियों के करीब होने की वजह से इसकी छत से आसपास का प्राकृतिक सौंदर्य साफ दिखाई देता है। यहां की छत से ऊंची पहाड़ियों पर स्थित मां मनसा देवी और दूसरी तरफ सिद्धपीठ मां चंडी देवी के दर्शन बहुत ही स्पष्ट रूप से होते हैं।

आज के समय में आधुनिक होटलों की चकाचौंध के बीच सेठ सूरजमल धर्मशाला तीर्थयात्रा के असली रूप को जीवित रखे हुए है। यह ब्रिटिश कालीन इमारत हरिद्वार के गौरवशाली इतिहास को दिखाने के साथ-साथ उस पुरानी भारतीय परंपरा की भी याद दिलाती है जहां निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा करना ही सबसे बड़ा धर्म माना जाता था।

सवाल-जवाब

सेठ सूरजमल धर्मशाला कहां स्थित है?
यह धर्मशाला हरिद्वार में हर की पौड़ी से लगभग 300 मीटर पहले अपर रोड पर मुख्य मार्ग पर स्थित है।
यह धर्मशाला कितनी पुरानी है?
यह ऐतिहासिक इमारत लगभग ढाई सौ साल पुरानी है जिसका निर्माण ब्रिटिश काल में हुआ था।
यहां ठहरने के लिए कितना शुल्क लिया जाता है?
यहां कोई व्यावसायिक किराया नहीं लिया जाता है, बल्कि बिजली और पानी के खर्च के रूप में प्रति व्यक्ति केवल 100 या 120 रुपए लिए जाते हैं।
इस धर्मशाला में किसे ठहरने की अनुमति मिलती है?
इस धर्मशाला में केवल परिवार के साथ आने वाले श्रद्धालुओं को ही कमरे दिए जाते हैं और अकेले यात्रियों को प्रवेश नहीं मिलता है।
धर्मशाला के मैनेजर कौन हैं?
इस ऐतिहासिक धर्मशाला के मैनेजर श्रीनिवास पांडे हैं।
धर्मशाला की छत से कौन से मंदिर दिखाई देते हैं?
इसकी छत से मां मनसा देवी और सिद्धपीठ मां चंडी देवी के दर्शन साफ रूप से होते हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·अभी

यह ऐतिहासिक धर्मशाला दिखाती है कि बढ़ती व्यावसायिकता के बीच किस तरह लोक-कल्याणकारी परंपराएं आज भी प्रासंगिक हैं। इस तरह के विरासती भवनों का संरक्षण न केवल तीर्थाटन के मूल स्वरूप को बचाता है, बल्कि आज के मंहगे दौर में आम श्रद्धालुओं के लिए सस्ती ठहरने की व्यवस्था भी सुनिश्चित करता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·अभी

सहकर्मी रोहन वर्मा के इस बिंदु को आगे बढ़ाते हुए, इस 250 साल पुरानी और कोतवाली से मात्र 100 मीटर की दूरी पर स्थित ब्रिटिश कालीन धर्मशाला के कड़े नियम और परिवार-उन्मुख प्रवेश नीति सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के लिहाज से भी एक बेहतरीन मॉडल पेश करती है। केवल 100 से 120 रुपये के मामूली शुल्क और 53 कमरों की इस अनुशासित व्यवस्था से यह स्पष्ट होता है कि ऐतिहासिक विरासतों का सही रखरखाव और पारदर्शी संचालन भीड़भाड़ वाले धार्मिक क्षेत्रों में बिना किसी व्यावસાયिक दबाव के भी सुचारू रूप से चलाया जा सकता है।

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