अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की धुरी माने जाने वाले मर्चेंट नेवी के नाविकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बड़ा मानवीय प्रस्ताव रखा है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान उन्होंने सदस्य देशों के बीच एक साझा सीफेयरर्स इमरजेंसी सपोर्ट नेटवर्क स्थापित करने की जोरदार वकालत की। वैश्विक व्यापारिक जहाजों, मालवाहक पोतों और विशाल टैंकरों का संचालन करने वाले इन कर्मियों को अक्सर युद्ध प्रभावित या तनावपूर्ण समुद्री क्षेत्रों में बिना किसी मजबूत सुरक्षा तंत्र के छोड़ दिया जाता है, जिससे उनकी जान पर लगातार खतरा बना रहता है। फिलीपींस के बाद दुनिया को सबसे अधिक नौकायन कार्यबल देने वाले देश के रूप में भारत ने इस मुद्दे को वैश्विक मंच पर प्रमुखता से उठाया है, क्योंकि पिछले कुछ महीनों के दौरान विभिन्न संघर्ष क्षेत्रों में कई भारतीय नाविकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है।
वैश्विक मंच पर सुरक्षा और कूटनीतिक समन्वय की जरूरत
सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि वैश्विक वाणिज्य में सबसे अहम भूमिका निभाने वाले इन पेशेवरों के पास संकट के समय तत्काल सहायता पाने के लिए कोई प्रभावी तंत्र मौजूद नहीं है। प्रस्तावित नेटवर्क का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के समुद्री प्रशासनों और उनके कूटनीतिक मिशनों को एक साझा मंच पर सीधे तौर पर जोड़ना है, ताकि किसी भी अप्रत्याशित खतरे की स्थिति में त्वरित कार्रवाई की जा सके। इस विशेष व्यवस्था के लागू होने से आपातकालीन अलर्ट सिस्टम के जरिए समंदर में किसी भी हमले या अनहोनी की सूचना तुरंत संबंधित अधिकारियों तक पहुंचेगी। इसके अलावा, फंसी हुई नौकाओं या कर्मियों के लिए समय पर चिकित्सा सहायता और सुरक्षित निकासी की व्यवस्था सुनिश्चित की जा सकेगी, साथ ही उनके परिजनों तक सटीक व समयबद्ध सूचना पहुंचाने का प्रावधान भी इस तंत्र का अहम हिस्सा होगा।
वैश्विक शासन सुधार और रोडमैप की अनिवार्यता
इस मानवीय पहल को व्यापक वैश्विक शासन व्यवस्था के सुधारों से जोड़ते हुए प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स देशों से अगले सम्मेलन तक एक ठोस रिफॉर्म रोडमैप तैयार करने का आह्वान किया। उनका स्पष्ट मत था कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को केवल कागजी मंच बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि उनकी कार्यप्रणाली में ऐसी गति और व्यापकता होनी चाहिए जो अंतिम छोर तक सीधा प्रभाव डाल सके। नाविकों के लिए प्रस्तावित यह सुरक्षा ढांचा वैश्विक संस्थाओं की कार्यक्षमता को सुधारने का एक आदर्श उदाहरण बन सकता है।
वैश्विक समुद्री कार्यबल में भारत की प्रमुख स्थिति
दुनिया के महासागरों में तैरते विशालकाय जहाजों और टैंकरों की कमान संभालने में भारतीय नौसैनिक और अधिकारी सबसे अग्रणी पंक्ति में खड़े हैं। बाल्टिक एंड इंटरनेशनल मैरीटाइम काउंसिल तथा इंटरनेशनल चैंबर ऑफ शिपिंग की सीफेयरर वर्कफोर्स रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक मर्चेंट नेवी में फिليपींस के बाद भारत दूसरा सबसे बड़ा वर्कफोर्स सप्लायर बन चुका है। पूरी दुनिया के लगभग पच्चीस लाख से अधिक समुद्री कार्यबल में अकेले भारत की हिस्सेदारी बारह प्रतिशत से ज्यादा है। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि वर्तमान में तीन लाख से अधिक भारतीय नाविक अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों पर दिन-रात अपनी सेवाएं देते हुए वैश्विक सप्लाई चेन को सुचारू बनाए रखने में जुटे हैं।
जहाजों की कमान और वरिष्ठ अधिकारियों की भागीदारी
केवल सामान्य कर्मियों के स्तर पर ही नहीं, बल्कि जहाजों के नेविगेशन, कमान और विशालकाय इंजनों को नियंत्रित करने वाले वरिष्ठ अधिकारियों के मामले में भी भारतीय प्रतिभा का दबदबा काफी मजबूत है। उच्च पदों पर भारतीय पेशेवरों की हिस्सेदारी तेरह प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई है। हालांकि, भारतीय नाविकों की यह विशाल उपस्थिति और शीर्ष पदों पर उनकी सक्रियता उन्हें लाल सागर और अन्य संघर्ष क्षेत्रों में होने वाले हमलों के सीधे निशाने पर ला देती है। मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि पश्चिम एशिया में तनाव शुरू होने के बाद से कई भारतीय नाविक अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि बड़ी संख्या में कर्मी घायल भी हुए हैं।
संवेदनशील जलमार्ग और होर्मुज की चुनौतियां
भारतीय नाविकों और जहाजों के सामने आने वाली अधिकांश समस्याएं उन वाणिज्यिक पोतों से जुड़ी हैं जो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे संकरे रास्तों से गुजरते हैं। फारस की खाड़ी के मुहाने पर स्थित यह जलडमरूमध्य मध्य पूर्व के तेल टैंकरों के आवागमन का मुख्य मार्ग है, जहां ओमान के तट के पास सुरक्षा जोखिम सबसे ज्यादा गंभीर बने हुए हैं। मंत्रालय के दैनिक बुलेटिन और स्टेटस रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती हैं कि गर्मियों के दौरान फारसी खाड़ी और ओमान की खाड़ी में भारतीय झंडे वाले जहाजों पर बड़ी संख्या में नाविक तैनात रहे हैं। बढ़ते जोखिमों को देखते हुए शिपिंग कंपनियों और संबंधित मंत्रालयों ने इस संवेदनशील क्षेत्र से हजारों भारतीय नाविकों को सुरक्षित बाहर निकाला है, जबकि इस दौरान भारतीय झंडे वाले या भारतीय क्रू वाले जहाजों पर दर्जनों हमलों के रिकॉर्ड दर्ज किए जा चुके हैं।
काला सागर के युद्ध क्षेत्र में बढ़ता जोखिम
पश्चिम एशिया के अलावा रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे लंबे संघर्ष की तपिश अब काला सागर के व्यापारिक जलमार्गों तक पहुंच चुकी है, जहां से गुजरने वाले नाविकों के लिए भी हालात बेहद खतरनाक हो गए हैं। इन युद्धग्रस्त क्षेत्रों में मालवाहक जहाजों का संचालन करना लगातार जानलेवा साबित हो रहा है, जिससे वैश्विक स्तर पर नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा और अधिक गंभीर हो गया है। प्रधानमंत्री द्वारा प्रस्तावित आपातकालीन नेटवर्क यदि वास्तविकता का रूप लेता है, तो ऐसे खतरनाक जल क्षेत्रों में काम करने वाले नाविकों को एक नया सुरक्षा कवच मिल सकेगा।


















