देशभर में जनगणना की पूरी प्रक्रिया में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है, जिसका सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों पर गहरा प्रभाव पड़ना तय माना जा रहा है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार होने जा रही जातीय गणना के इस वृहद अभियान में केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख को एक अहम शुरुआत के रूप में चुना गया है। दुर्गम और बर्फीले इलाकों की भौगोलिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, यहाँ जनसंख्या गणना के दूसरे चरण का आगाज 17 अगस्त से किया जा रहा है, जिसके जरिए नागरिकों की आबादी से जुड़ी तमाम बारीक जानकारियाँ जुटाई जाएंगी।
जनसंख्या गणना के इस चरण के दौरान नागरिकों से लगभग 40 विभिन्न पैमानों पर सवाल पूछे जाने की रूपरेखा तैयार की गई है। इन मानकों में लोगों की सामाजिक स्थिति के साथ-साथ आर्थिक हालात से जुड़े तमाम बिंदु भी शामिल होंगे। इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा और चर्चित पहलू यह है कि नागरिकों की जाति दर्ज करने के लिए एक अलग से खुला कॉलम यानी ओपन कॉलम उपलब्ध कराया जाएगा, जिसमें प्रविष्टि की जाएगी।
लद्दाख को इस विशाल प्रक्रिया की शुरुआत के लिए इसलिए भी विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना गया है क्योंकि यह देश के नवनिर्मित केंद्र शासित प्रदेशों में शुमार है। यहाँ से जनगणना के इस बिल्कुल नए स्वरूप का व्यावहारिक उदाहरण देश के सामने आएगा। मौसम की दुश्वारियों और बर्फबारी जैसी कठिन परिस्थितियों वाले इन पहाड़ी क्षेत्रों में प्रशासनिक अमला बाकी देश से पहले ही यह अभियान शुरू कर रहा है, ताकि ठंड और बर्फ के प्रकोप से पहले आबादी के मु मुकम्मल आंकड़े सुरक्षित जुटाए जा सकें।
जनसंख्या गणना के इस आगामी चरण के लिए देश भर के 16 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 1 से 20 जुलाई के बीच एक रिहर्सल यानी प्री-टेस्ट का आयोजन किया गया था। इस दौरान अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के अलावा अन्य उत्तरदाताओं ने अपनी जाति को खुले कॉलम में स्वयं दर्ज किया या फिर गणना करने वाले कर्मचारियों ने उनके बताए अनुसार उसे नोट किया। तकनीकी रूप से इस कार्यप्रणाली को ही अंतिम रूप दिए जाने की पूरी संभावना है।
भले ही यह संपूर्ण राष्ट्रव्यापी जनगणना देश की पहली डिजिटल जनगणना होने जा रही है, फिर भी प्रशासन लद्दाख के मामले में विशेष छूट देते हुए भारी मात्रा में कागजी शेड्यूल यानी पेपर शेड्यूल प्रिंट करवा रहा है। यह निर्णय चीन और पाकिस्तान की सीमाओं से सटे संवेदनशील इलाकों में मौजूद बड़े सुरक्षा और रक्षा प्रतिष्ठानों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। इन महत्वपूर्ण ठिकानों की सटीक लोकेशन को सुरक्षा कारणों के चलते जियो-टैग करने से पूरी तरह परहेज किया जा रहा है। डिजिटल जनगणना प्रणाली के तहत गणनाकारों के लिए यह अनिवार्य होता है कि वे मोबाइल ऐप के जरिए हर एक संरचना को जियो-लोकेट करें और जो नागरिक खुद पोर्टल पर अपनी गिनती करेंगे, उन्हें भी यही प्रक्रिया अपनानी होती है।
भारत के रजिस्ट्रार जनरल और सेंसस कमिश्नर कार्यालय की ओर से अभी तक आधिकारिक तौर पर प्रश्नावली या शेड्यूल को नोटिफाई नहीं किया गया है, इसके बावजूद लद्दाख के अलावा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बर्फीले क्षेत्रों में 17 अगस्त से 30 सितंबर के बीच जनसंख्या गणना का दूसरा चरण पूरा करने की पुख्ता तैयारियाँ शुरू कर दी गई हैं। देश के अन्य मैदानी और शेष हिस्सों में यह महत्वपूर्ण कार्य फरवरी 2027 में संपन्न कराया जाएगा।
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के सेंसस ऑपरेशन डायरेक्टरेट ने हाल ही में इस चरण के लिए मास्टर ट्रेनर्स के तीन दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। यह कदम 17 अगस्त से शुरू होने वाले सेल्फ-एन्यूमरेशन यानी स्व-गणना चरण से ठीक पहले मैदानी तैयारियों का एक बेहद अहम हिस्सा है। चीफ प्रिंसिपल सेंसस ऑफिसर अमित शर्मा के अनुसार, इस तीन दिवसीय प्रशिक्षण सत्र के दौरान जनगणना से जुड़े सभी पहलुओं पर विस्तार से जानकारी दी गई, जिसमें जनसांख्यिकीय डेटा संग्रह, डिजिटल टूल्स का उपयोग, इंटरव्यू लेने की तकनीक और मोबाइल एप्लिकेशन का व्यावहारिक प्रशिक्षण शामिल था।
लद्दाख की स्थिति थोड़ी भिन्न और अनूठी है क्योंकि यह उन 16 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में शामिल नहीं था जहाँ जुलाई के दौरान दूसरे चरण के संभावित प्रश्नों का पूर्वाभ्यास किया गया था। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बताया कि प्री-टेस्ट न होने के कारण वर्तमान में मास्टर ट्रेनर्स को लगभग 40 संभावित और टेंटेटिव प्रश्नों के आधार पर प्रशिक्षित किया जा रहा है, जिन्हें लेकर इस हफ्ते के भीतर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी जाएगी।
अधिकारी ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि उन्हें इस संबंध में निर्देश मिल चुके हैं। इस बार पूछे जाने वाले तमाम सवाल विवरणात्मक यानी डिस्क्रिप्टिव होंगे और इनमें जाति का बिंदु भी प्रमुखता से शामिल किया जाएगा। जाति के लिए निर्धारित यह कॉलम ओपन-एंडेड यानी खुला हुआ होगा, जिसमें गणनाकार सीधे तौर पर जवाब देने वाले व्यक्ति द्वारा बताए गए जाति के नाम को ही अपने रिकॉर्ड में दर्ज करेंगे। अधिकारी ने आगे यह भी जोड़ा कि चूंकि इस जनगणना अभियान में क्षेत्र की हर एक इमारत और संरचना की गिनती करने की योजना है, इसलिए मैदानी कर्मचारियों को पूरी सावधानी बरतने और वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी के पास मौजूद ढाँचों की सुरक्षा से जुड़े विवरणों को पेपर शेड्यूल पर स्पेशल चार्ज के तौर पर दर्ज करने के निर्देश दिए गए हैं।
ओपन-कॉलम पद्धति के इस्तेमाल के कारण ही वर्ष 2011 में हुए सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना के दौरान देश भर में 46 लाख से भी अधिक अलग-अलग जातियों के नाम सामने आए थे, जिसकी मुख्य वजह लोगों द्वारा अपनी जातियों के उच्चारण और अर्थ में बताए गए अंतर थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पिछले एक दशक से लगातार यह बात कहती आई है कि डेटा संग्रहण के दौरान हुई तकनीकी त्रुटियों और कमियों की वजह से वर्ष 2011 का वह जातिगत डेटा विश्वसनीयता के पैमाने पर खरा नहीं उतरा था। ऐतिहासिक रूप से देखें तो वर्ष 1931 की जनगणना के दौरान दर्ज की जाने वाली जातियों की कुल संख्या 4,147 थी। वर्ष 2011 का वह अभियान मुख्य रूप से एक सर्वेक्षण के रूप में संचालित किया गया था और वह जनगणना अधिनियम 1948 के दायरे से पूरी तरह बाहर था, जिसके चलते उसका कोई ठोस कानूनी आधार नहीं बन पाया था और सरकार ने कभी उस डेटा को सार्वजनिक नहीं किया था।
हाल ही में 3 अगस्त को भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त ने आधिकारिक गजट में यह अधिसूचना जारी की है कि लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बर्फ से ढके हुए गैर-समकालिक क्षेत्रों में आबादी की यह विशेष जनगणना 1 सितंबर 2026 से 30 सितंबर 2026 के बीच आयोजित की जाएगी। इसके तुरंत बाद 1 अक्टूबर 2026 से 5 अक्टूबर 2026 तक एक रिविजनल राउंड भी चलाया जाएगा। इस आधिकारिक नोटिफिकेशन में स्पष्ट किया गया है कि घर-घर जाकर आबादी की आधिकारिक गिनती का कार्य शुरू होने से पहले, नागरिकों को 17 अगस्त से 31 अगस्त के बीच खुद से अपनी गणना करने का खुला विकल्प भी उपलब्ध कराया जाएगा।



















