राजस्थान के जंगलों में वन्यजीव प्रेमियों की हलचल एक बार फिर लौटने वाली है। हर साल की तरह इस बार भी बारिश के मौसम में तीन महीने के लिए बंद किए गए प्रदेश के प्रमुख राष्ट्रीय उद्यानों और बाघ अभयारण्यों के द्वार 1 अक्टूबर से आम जनता और पर्यटकों के लिए खोल दिए जाएंगे। सरिस्का, रणथंभौर, मुकुंदरा और रामगढ़ विषधारी जैसे जाने-माने जंगलों में पर्यटन गतिविधियों को पटरी पर लाने की कवायद अंतिम दौर में पहुंच चुकी है। वन महकमा सफारी ट्रैकों को संवारने से लेकर पर्यटकों से जुड़ी हर बुनियादी सहूलियत को चाक-चौबंद करने में जुटा हुआ है ताकि आने वाले दिनों में सैलानियों को जंगल भ्रमण के दौरान किसी तरह की असुविधा न उठानी पड़े।
मानसून के दौरान जंगलों को क्यों रखा जाता है बंद
राजस्थान भर के तमाम बाघ अभयारण्यों और राष्ट्रीय पार्कों में 1 जुलाई से 30 सितंबर तक नियमित सफारी का संचालन पूरी तरह थमा रहता है। इस तय अवधि में जंगल के मुख्य यानी कोर इलाकों में किसी भी तरह की बाहरी आवाजाही और पर्यटन गतिविधियों पर सख्त पाबंदी लागू रहती है, हालांकि कुछ चुनिंदा स्थानों पर बफर जोन में भ्रमण की सीमित छूट जरूर बनी रहती है। तीन महीने के इस ठहराव का उपयोग जंगल के अंदर बारिश से खराब हुए कच्चे मार्गों के पुनर्निर्माण, रास्तों की मरम्मत और व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के लिए किया जाता है।
नया पर्यटन सत्र शुरू करने की तैयारियों के तहत इस बार भी मैदानी स्तर पर व्यापक काम हुआ है। जंगल के आंतरिक रास्तों को ठीक करने के अलावा पर्यटकों के बैठने के लिए प्रतीक्षालय, स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति और प्रसाधनों जैसी जरूरी सुविधाओं का रखरखाव पूरा किया गया है। इसके साथ ही जंगल में पर्यटकों को ले जाने वाली जिप्सियों के औपचारिक पंजीकरण और परमिट की कागजी प्रक्रिया को भी पूरा किया जा रहा है ताकि वाहनों के संचालन में कोई कानूनी या तकनीकी अड़चन न आए।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के सैलानियों की पहली पसंद सरिस्का
अलवर स्थित सरिस्का बाघ अभयारण्य की भौगोलिक स्थिति इसे दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के पर्यटकों के बीच बेहद लोकप्रिय बनाती है। दिल्ली तथा गुरुग्राम से महज दो से ढाई घंटे की सड़क यात्रा कर पर्यटक आसानी से यहां पहुंच जाते हैं, यही वजह है कि सामान्य दिनों के अलावा सप्ताहांत और अन्य छुट्टियों के दौरान यहां पर्यटकों की भारी भीड़ उमड़ती है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार सरिस्का में बाघों की कुल संख्या 56 दर्ज है, जिसमें 28 वयस्क बाघ-बाघिन और 28 छोटे शावक शामिल हैं।
सरिस्का के कोर क्षेत्र में सफारी संचालन के लिए तीन अलग-अलग मार्ग निर्धारित किए गए हैं, जबकि बफर क्षेत्र में दो रास्तों पर वाहनों को जाने की इजाजत दी गई है। 1 अक्टूबर से जब पर्यटक इन रास्तों पर निकलेंगे तो उनकी सबसे बड़ी उम्मीद बाघों के दीदार करने की होगी। पर्यटकों के भ्रमण के अनुभव को समृद्ध करने और वन्यजीव संरक्षण के प्रति समझ बढ़ाने के उद्देश्य से सरिस्का में एक नया सभागार और व्याख्या केंद्र भी तैयार किया जा रहा है। इस केंद्र पर सरिस्का के इतिहास और परिवेश पर आधारित विशेष लघु फिल्में दिखाई जाएंगी। इसके साथ ही स्कूली छात्र-छात्राओं, महिलाओं और अन्य आगंतुकों के विश्राम व बैठने की समुचित व्यवस्था भी की जा रही है।
रणथंभौर का विशाल दायरा और सफारी का व्यापक ढांचा
सवाई माधोपुर में स्थित रणथंभौर देश और दुनिया के सबसे चर्चित वन्यजीव गंतव्यों में गिना जाता है। तकरीबन 1334 वर्ग किलोमीटर के विस्तृत क्षेत्रफल में फैले इस अभयारण्य में वर्तमान में 84 बाघ मौजूद हैं। बाघों की मजबूत मौजूदगी के अलावा यह जंगल कई अन्य दुर्लभ वन्यजीवों का भी प्राकृतिक वास है। यहां आने वाले सैलानियों को सांभर, चीतल, हिरण, लकड़बग्घा, भालू और बारहसिंगा जैसे जानवर सहजता से देखने को मिलते हैं। पक्षी प्रेमियों के लिए भी यह जगह किसी स्वर्ग से कम नहीं है क्योंकि यहां परिंदों की 300 से ज्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं।
सैलानियों को सुरक्षित रूप से जंगल के भीतर ले जाने के लिए 150 से अधिक जिप्सियों और बड़े कैंटर वाहनों का बेड़ा तैनात रहता है। सफारी की सुगम आवाजाही और वन्यजीवों पर दबाव घटाने के लिए पूरे जंगल को 10 अलग-अलग जोनों में विभाजित किया गया है। रणथंभौर में सफारी सीटों की भारी मांग रहती है, जिसे देखते हुए प्रशासन बुकिंग का पोर्टल बहुत पहले ही खोल देता है।
अक्टूबर की कई तारीखों पर पहले ही लग चुका है हाउसफुल
दोनों बड़े जंगलों में सफारी स्लॉट हासिल करने के लिए पर्यटकों में गजब की होड़ देखने को मिलती है। रणथंभौर के लिए जिप्सी की अग्रिम बुकिंग का सिलसिला 1 अगस्त से ही आरंभ कर दिया जाता है, जबकि सरिस्का में यह खिड़की 1 सितंबर से खुलती है। इस साल भी पर्यटकों ने जंगल खुलने की तारीख से पहले ही बड़े पैमाने पर सीटें सुरक्षित कर ली हैं।
अधिकारियों की तरफ से दी गई जानकारी के मुताबिक दोनों ही उद्यानों में अक्टूबर के कई दिनों की सफारी सीटें पूरी तरह से आरक्षित हो चुकी हैं। ऐसे में जो लोग अचानक या मौके पर पहुंचकर सफारी की योजना बना रहे हैं, उन्हें मनचाही तारीख, उपयुक्त समय या पसंदीदा वाहन मिलना काफी कठिन साबित हो सकता है। 1 अक्टूबर से जैसे ही जिप्सियां और कैंटर धूल भरी पगडंडियों पर रफ्तार भरेंगे, राजस्थान का वन्य पर्यटन एक बार फिर अपनी पूरी चमक के साथ लौट आएगा।



















