भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव आयोग को निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र चुनाव संपन्न कराने का संवैधानिक दायित्व मिला हुआ है। चुनावी नियमों में अनुशासन लाने, धांधली रोकने या मतदाता सूची में संशोधन करने के किसी भी कड़े कदम को जहां आम नागरिक निष्पक्षता की दिशा में उठाया गया कदम मानते हैं, वहीं राजनीतिक दल अक्सर इसे अपने नफा-नुकसान के चश्मे से देखते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मौजूदा दौर में विपक्षी दलों का तीखा रुख इसी लंबे ऐतिहासिक सिलसिले की ताजा कड़ी है। विपक्षी गठबंधन से जुड़े दल राजधानी दिल्ली में सड़क पर उतरकर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी इस आंदोलन का नेतृत्व करते हुए ज्ञानेश कुमार के त्यागपत्र की मांग पर अड़े हैं। इस विरोध प्रदर्शन के केंद्र में गहन मतदाता पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया है, जिसे विपक्षी खेमा मतदाता सूची में गड़बड़ी करार दे रहा है।
चुनावी सख्ती और राजनीतिक टकराव का पुराना ढर्रा
संवैधानिक प्रावधानों के तहत कार्य करने वाले आयोग के प्रमुख या पर्यवेक्षक जब भी व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव करने उतरते हैं, तो सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, कोई न कोई खेमा उनके खिलाफ मोर्चा खोल ही देता है। बदलाव का एक पहलू यह है कि जो पार्टी सत्ता में होती है या जिसे नियमों से तात्कालिक नुकसान दिखता है, वह संस्था पर पक्षपात के आरोप मढ़ने लगती है। यही स्थिति कभी मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टीएन शेषन के दौर में भी देखी गई थी। शेषन के निर्णयों को असंवैधानिक करार देने के लिए राजनीतिक हलकों में हर मुमकिन कोशिश की गई थी। हालांकि उस समय आज की तरह सोशल मीडिया, रील्स, मीम और डीप फेक का दौर नहीं था। आज के समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI ने ऐसी सूचनाओं और अभियानों को अत्यधिक तेज और आक्रामक बना दिया है। इसके बावजूद बुनियादी सच्चाई यही है कि जब भी नियमों में क्रांतिकारी कदम उठाए गए, प्रभावित दलों ने पुरजोर विरोध दर्ज कराया।
बिहार में केजे राव का ऐतिहासिक हस्तक्षेप और विरोध
चुनाव आयोग के सलाहकार और विशेष पर्यवेक्षक रहे कोम्माजोसयुला जगन्नाथ राव, जिन्हें देश केजे राव के नाम से जानता है, का चुनावी इतिहास में बड़ा योगदान रहा है। वर्ष 2005 में जब बिहार में विधानसभा चुनाव की बारी आई, तो उस समय का बिहार बाहुबलियों के प्रभाव, चुनावी हिंसा और बड़े पैमाने पर बूथ कैप्चरिंग के लिए कुख्यात था। आयोग ने केजे राव को बिहार का विशेष पर्यवेक्षक नियुक्त किया। राव ने कमान संभालते ही पूरी सुरक्षा व्यवस्था की कार्यशैली पलट दी। उन्होंने संवेदनशील मतदान केंद्रों की पहचान कराई और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को बैरकों में आराम फरमाने के बजाय सीधे मतदान केंद्रों के आसपास तैनात करने का कड़ा फैसला लिया।
केजे राव ने यह सख्त नियम बनाया कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम का वितरण तभी होगा जब पेट्रोलिंग अधिकारी पूरी तरह संतुष्ट होंगे। इसके अलावा मतदान प्रतिशत में अचानक आने वाले उछाल या गिरावट की बारीकी से जांच करने का प्रावधान लागू किया गया। चुनावों के दौरान दबंगई करने वाले बाहुबली नेताओं को चिन्हित करके जेलों में स्थानांतरित किया गया। आचार संहिता का कठोरता से पालन कराने के लिए राव खुद किसी लाव-लश्कर के बिना मोटरसाइकिल पर बैठकर सुदूर ग्रामीण इलाकों के बूथों का जायजा लेते थे। उनकी इसी सख्ती का नतीजा रहा कि वर्ष 2005 का बिहार विधानसभा चुनाव अभूतपूर्व रूप से शांतिपूर्ण और निष्पक्ष संपन्न हुआ।
मतदाता सूची की छंटाई पर सत्ताधारी राजद से तकरार
केजे राव की चुनावी सख्ती का असर केवल मतदान के दिन तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने बिहार में मतदाता सूची का व्यापक सर्वे कराकर फर्जी नामों की बड़े पैमाने पर सफाई की। उस वक्त बिहार की सत्ता पर काबिज राष्ट्रीय जनता दल यानी राजद और अन्य संबंधित दलों ने केजे राव की इस मुहिम का जबरदस्त विरोध किया था। सत्ताधारी खेमे को लगा कि यह कार्रवाई उनके पारंपरिक वोट बैंक पर चोट पहुंचा रही है। हालांकि राव के अडिग रवैये के चलते ही बिहार में मतपेटियों की लूट और बूथों पर कब्जा करने की पुरानी कुप्रथा पर हमेशा के लिए लगाम लगी। इसके बाद राव ने पश्चिम बंगाल में भी फर्जी मतदाताओं को चिन्हित करने में अहम भूमिका निभाई थी।
केजे राव के इन सुधारों का राजनीतिक परिणाम यह निकला कि बिहार में लगातार 15 वर्षों से कायम राजद की सत्ता का अंत हुआ और नीतीश कुमार भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से राज्य के मुख्यमंत्री बने। जिस तरह आज ज्ञानेश कुमार के मतदाता पुनरीक्षण कार्यक्रम को विपक्षी दल वोट चोरी बता रहे हैं और उनके इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली में धरने दे रहे हैं, ठीक उसी तरह का प्रचंड राजनीतिक आक्रोश और विरोध कभी केजे राव को भी झेलना पड़ा था।
टीएन शेषन और आचार संहिता का कठोर युग
देश में चुनाव आयोग की साख और अधिकारों को नए सिरे से स्थापित करने का श्रेय पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन को जाता है, जो 1990 से 1996 तक इस पद पर रहे। शेषन ने निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक भावना को जमीन पर उतारने के लिए मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट यानी आदर्श आचार संहिता को कागजों से निकालकर एक अचूक हथियार बना दिया। उन्होंने सार्वजनिक और निजी दीवारों पर राजनीतिक नारे लिखने तथा लाउडस्पीकरों के अनियंत्रित इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। चुनावी रैलियों और सभाओं में सरकारी गाड़ियों व मशीनरी के खुले दुरुपयोग पर नकेल कसी और चुनावी हिंसा के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार किया।
टीएन शेषन ने चुनावी खर्च की सख्त निगरानी शुरू कराई और जहां भी नियमों के उल्लंघन या गड़बड़ी के पुख्ता प्रमाण मिले, वहां बेझिझक चुनाव रद्द किए अथवा दोबारा मतदान के आदेश दिए। शेषन का सबसे युगांतरकारी फैसला मतदाताओं के लिए फोटो युक्त पहचान पत्र को अनिवार्य बनाना था। उन्होंने केंद्र सरकार के सामने स्पष्ट शर्त रख दी थी कि जब तक मतदाताओं को फोटो पहचान पत्र जारी नहीं किए जाएंगे, तब तक वे देश में चुनाव नहीं कराएंगे। उनके इस अडिग फैसले का कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने तीखा विरोध किया था।
संस्थागत स्वायत्तता की लड़ाई और कानूनी खींचतान
टीएन शेषन ने चुनाव आयोग की स्वायत्तता को अक्षुण्ण रखने के लिए आयोग के आधिकारिक पत्राचार और दस्तावेजों से 'भारत सरकार' शब्द तक हटवा दिया था, ताकि यह साफ रहे कि आयोग किसी मंत्रालय का विभाग नहीं बल्कि एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। इसी स्वायत्तता और शेषन के कड़े मिजाज को संतुलित करने के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 1993 में आयोग को तीन सदस्यीय निकाय बना दिया। शेषन इस फैसले के खिलाफ सीधे सुप्रीम कोर्ट चले गए। हालांकि देश की शीर्ष अदालत ने आयोग की बहुसदस्यीय व्यवस्था को वैध ठहराया।
फोटो युक्त वोटर आईडी की अनिवार्यता के दौरान बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के साथ टीएन शेषन का टकराव चरम पर पहुंच गया था। लालू प्रसाद यादव ने शेषन के इस कदम का कड़ा विरोध करते हुए खुली चेतावनी दी थी कि यदि फोटो पहचान पत्र के आधार पर चुनाव टाले गए तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। उस दौर में भी राजनेताओं को लगता था कि कड़े नियम उनके चुनावी समीकरणों को बिगाड़ देंगे। इतिहास गवाह है कि टीएन शेषन से लेकर केजे राव और अब ज्ञानेश कुमार तक, जब भी किसी चुनाव आयुक्त ने मतदाता सूची या मतदान प्रणाली में सुधार का बीड़ा उठाया, राजनीतिक दलों ने उसे निष्पक्ष सुधार मानने के बजाय अपनी सुविधा के अनुसार पक्षपात का तमगा थमाने की कोशिश की।



















