मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार इन दिनों एक बड़े विवाद के केंद्र में हैं। उनके नेतृत्व वाले निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर हाल ही में सामने आए गंभीर दावों ने राजनीतिक और कानूनी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। मीडिया में आई खबरों में मतदाता सूची से जुड़े दस्तावेजों (SIR) में कथित हेरफेर और चुनाव आयुक्तों के बीच गंभीर मतभेदों की बात कही गई है। इस खुलासे के बाद से जहां कांग्रेस सहित विभिन्न विपक्षी पार्टियां मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आई हैं, वहीं अब यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर भी पहुंच गया है। दिल्ली में वकालत करने वाले प्रसिद्ध वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है। इस कानूनी कदम ने चुनाव आयोग की स्वायत्तता और उसकी निष्पक्षता पर जारी बहस को और अधिक गरमा दिया है।
निर्वाचन आयोग में अंदरूनी कलह और गंभीर आरोप
शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर की गई इस ताजा याचिका में सीधे तौर पर चुनाव आयोग के कामकाज के तरीकों और फैसलों पर उंगली उठाई गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मतदाता सूची की समीक्षा और उसके संशोधन की प्रक्रिया में नियमों की बड़े पैमाने पर अनदेखी की गई है। सबसे चौंकाने वाला दावा यह है कि मतदाता सूची से लगभग 13 करोड़ लोगों के नाम हटा दिए गए हैं, जिसकी गहन जांच की जानी चाहिए। इसके अतिरिक्त, Form 6 में किए गए कथित अवैध बदलावों को निरस्त करने और इस पूरी अनियमितता के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने की मांग भी इस याचिका में उठाई गई है।
यह अदालती मामला उस वक्त और भी गंभीर हो जाता है जब हम चुनाव आयोग के भीतर चल रहे कथित मतभेदों पर नजर डालते हैं। कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह दावा किया गया था कि पिछले 10 महीनों के दौरान चुनाव आयोग के दो आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, ने आयोग के कई नीतिगत और प्रशासनिक फैसलों पर अपनी लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इन आपत्तियों में मतदाताओं के पंजीकरण, उनके नाम हटाए जाने और दोबारा जोड़े जाने से जुड़ी प्रक्रियाएं भी शामिल थीं। हालांकि, इस पूरे विवाद पर निर्वाचन आयोग ने अपना रुख साफ करते हुए कहा है कि किसी भी लोकतांत्रिक संस्था में अलग-अलग विचारों का होना एक सामान्य बात है। आयोग के अनुसार, इस तरह की असहमतियों को संस्थागत मतभेद या बिखराव नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि यह स्वस्थ विचार-विमर्श का एक हिस्सा है।
अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी का कानूनी सफरनामा
सुप्रीम कोर्ट में इस संवेदनशील याचिका को दायर करने वाले शैलेंद्र मणि त्रिपाठी कोई नया नाम नहीं हैं। वह दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबे समय से वकालत कर रहे हैं और देश के कानूनी परिदृश्य में एक सक्रिय चेहरा हैं। त्रिपाठी केवल राजनीतिक या चुनावी मामलों तक ही सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि उन्होंने लगातार जनहित से जुड़े कई बड़े मुद्दों को अदालत के सामने पेश किया है। उनके कानूनी करियर में कई ऐसे मामले रहे हैं जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक बदलाव की बहस को जन्म दिया है।
त्रिपाठी के करियर का सबसे चर्चित मुद्दा महिलाओं और छात्राओं के लिए मासिक धर्म अवकाश (पीरियड लीव) से जुड़ा रहा है। इस संवेदनशील विषय को लेकर उन्होंने सबसे पहले साल 2023 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी। इसके बाद भी वह इस मांग को लेकर लगातार सक्रिय रहे और उन्होंने साल 2024 तथा साल 2026 में भी इसी विषय पर अदालत का दरवाजा खटखटाया। इस मामले पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इसे एक महत्वपूर्ण सामाजिक और नीतिगत मुद्दा माना। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह कामकाजी महिलाओं और छात्राओं की भलाई के लिए इस विषय पर विचार करे और एक उचित नीति तैयार करे।
सामाजिक और व्यावसायिक सुधारों के लिए संघर्ष
मासिक धर्म अवकाश के अलावा शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने वकीलों के कामकाजी माहौल में सुधार के लिए भी प्रयास किए हैं। साल 2022 में उन्होंने एक बेहद व्यावहारिक समस्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। उन्होंने अपनी याचिका में मांग की थी कि भीषण गर्मी के महीनों के दौरान वकीलों को अदालती कार्यवाही के समय भारी-भरकम काले कोट और गाउन पहनने की अनिवार्यता से राहत दी होनी चाहिए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उस समय इस याचिका को सुनवाई के योग्य नहीं माना था, लेकिन इस याचिका ने अदालतों के भीतर वकीलों की कामकाजी परिस्थितियों पर एक गंभीर चर्चा अवश्य शुरू कर दी थी।
वह दिल्ली के कानूनी हलकों में एक सम्मानित नाम हैं और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन से भी सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। उनकी हालिया जनहित याचिका ने उन्हें एक बार फिर से देश के प्रमुख समाचारों और कानूनी विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है।
एक अन्य समांतर कानूनी कदम
इस पूरे चुनावी विवाद के बीच एक और स्वतंत्र कानूनी पहल भी देखने को मिली है, जिसे शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की याचिका से अलग देखा जाना चाहिए। 24 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य अधिवक्ता बृजेश सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की मांग की थी। इसके लिए उन्होंने देश के अटॉर्नी जनरल से वैधानिक सहमति देने का अनुरोध किया है।
बृजेश सिंह ने भी चुनाव आयोग के भीतर चल रहे कथित मतभेदों और निर्णयों को लेकर हालिया मीडिया रिपोर्टों का हवाला दिया था। अपनी याचिका में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों, जैसे टीएन शेषन बनाम भारत संघ और अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ के दिशानिर्देशों का विशेष रूप से उल्लेख किया है। इन फैसलों में चुनाव आयोग की निष्पक्षता और स्वतंत्रता को बनाए रखने पर जोर दिया गया था। यद्यपि बृजेश सिंह और शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की कानूनी याचिकाएं एक ही मुख्य मुद्दे यानी चुनाव आयोग की विश्वसनीयता से जुड़ी हैं, परंतु दोनों कानूनी रूप से पूरी तरह भिन्न और स्वतंत्र प्रक्रियाएं हैं।


















